ज्यादातर नौकरीपेशा लोगों के साथ एक आम समस्या होती है सैलरी महीने की शुरुआत में आती तो है, लेकिन हफ्ते-दस दिन में ही गायब हो जाती है। अगर आपको भी ऐसा महसूस होता है कि आपकी जेब हमेशा खाली रहती है, तो इसके पीछे का मुख्य कारण आपके 'फिक्स खर्चे' (Fixed Expenses) हो सकते हैं। फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स का मानना है कि जब आपकी कुल आय का 60% से ज्यादा हिस्सा मकान के किराए, ईएमआई (EMI), बीमा प्रीमियम और बिजली-पानी जैसे बिलों में जाने लगता है, तो समझ लीजिए कि आपके लिए खतरे की घंटी बज चुकी है। यह स्थिति न केवल आपके वर्तमान बजट को बिगाड़ती है, बल्कि आपको भविष्य में एक बड़े कर्ज के जाल में धकेल सकती है।
क्या होते हैं फिक्स खर्चे और क्यों हैं ये खतरनाक?
फिक्स खर्चे वे होते हैं जिन्हें आप चाहकर भी टाल नहीं सकते। इनमें होम लोन या कार लोन की किस्त, बच्चों की स्कूल फीस, घर का किराया और जरूरी यूटिलिटी बिल शामिल हैं। जब ये खर्चे आपकी सैलरी का 60% पार कर जाते हैं, तो आपके पास 'डिस्क्रिशनरी स्पेंडिंग' (Discretionary Spending) यानी अपनी मर्जी से खर्च करने और बचत करने के लिए बहुत कम पैसा बचता है। इसका सबसे बुरा असर आपकी मानसिक शांति और आर्थिक सुरक्षा पर पड़ता है। ऐसे में अगर कोई अचानक मेडिकल इमरजेंसी आ जाए या घर में कोई छोटी-मोटी मरम्मत की जरूरत पड़े, तो आपके पास फंड की कमी हो जाती है और अंततः आप क्रेडिट कार्ड या पर्सनल लोन का सहारा लेने पर मजबूर हो जाते हैं।
खतरे की घंटी कैसे बजती है?
बजट बिगड़ने के संकेत धीरे-धीरे मिलते हैं। सबसे पहला संकेत यह है कि आप अपनी बचत (Savings) में कटौती करने लगते हैं। अगर आप अपनी एसआईपी (SIP) बंद कर रहे हैं या भविष्य के लिए पैसे नहीं जोड़ पा रहे हैं, तो यह रेड फ्लैग है। दूसरा संकेत तब मिलता है जब आप महीने के आखिरी हफ्ते में बुनियादी जरूरतों के लिए भी संघर्ष करने लगते हैं। जब आपकी सैलरी का बड़ा हिस्सा बैंक की किस्तों में चला जाता है, तो आपके पास निवेश के लिए 'लिक्विडिटी' यानी नकदी नहीं बचती। धीरे-धीरे आप 'सैलरी-टू-सैलरी' जीने लगते हैं, जहां आप बस अगले महीने की सैलरी का इंतज़ार करते हैं ताकि पिछले बिल चुका सकें।
बजट को पटरी पर लाने का 50/30/20 नियम
फाइनेंशियल हेल्थ को ठीक करने के लिए दुनिया भर में मशहूर '50/30/20 नियम' का पालन करना चाहिए। इस नियम के मुताबिक, आपकी सैलरी का 50% हिस्सा 'जरूरतों' (Needs) यानी फिक्स खर्चों में जाना चाहिए, 30% हिस्सा 'इच्छाओं' (Wants) यानी घूमना-फिरना या बाहर खाना और बाकी का 20% हिस्सा हर हाल में 'बचत और निवेश' (Savings) में जाना चाहिए। अगर आपके फिक्स खर्चे 60% या उससे ज्यादा हैं, तो आपको अपनी लाइफस्टाइल की समीक्षा करनी होगी। हो सकता है कि आप अपनी क्षमता से महंगा घर या गाड़ी इस्तेमाल कर रहे हों जिसकी ईएमआई आपके बजट पर बोझ बन रही है।
कर्ज के जाल से बचने के उपाय
अगर आप पहले से ही इस स्थिति में हैं, तो सबसे पहले अपने छोटे-छोटे खर्चों की लिस्ट बनाएं। देखें कि कौन से ऐसे फिक्स खर्चे हैं जिन्हें कम किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, जिम की महंगी मेंबरशिप या ओटीटी सब्सक्रिप्शन जो आप इस्तेमाल नहीं करते, उन्हें बंद करें। अगर आपकी ईएमआई बहुत ज्यादा है, तो उसे री-फाइनेंस (Re-finance) कराने या किसी बोनस या एक्स्ट्रा इनकम से लोन का कुछ हिस्सा चुकाने की कोशिश करें। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अपनी आय बढ़ने के साथ अपने फिक्स खर्चों को न बढ़ाएं। लोग अक्सर सैलरी बढ़ते ही बड़ी ईएमआई वाला फोन या कार ले लेते हैं, जिससे वे हमेशा उसी '60% वाले जाल' में फंसे रहते हैं।
