ईरान के साथ जारी तनाव के बीच संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने एक बड़ा कदम उठाते हुए तेल निर्यातक देशों के संगठन ओपेक (OPEC) और ओपेक प्लस (OPEC+) से अलग होने का निर्णय लिया है। यह फैसला खाड़ी परिषद (GCC) में चल रही खींचतान के दौरान आया है, जिससे समूह के प्रमुख देश सऊदी अरब को बड़ा राजनीतिक और आर्थिक झटका लग सकता है। ओपेक के पुराने और महत्वपूर्ण सदस्य यूएई के इस फैसले से संगठन के भीतर अस्थिरता पैदा हो सकती है और इसकी ताकत कम हो सकती है, जबकि यह ग्रुप अब तक उत्पादन कोटे और भू-राजनीतिक मतभेदों के बावजूद दुनिया के सामने अपनी एकजुटता बनाए रखने का प्रयास करता रहा है। ऐसे में आइए जानते हैं OPEC और OPEC+ में कौन कौन से देश शामिल हैं?
ओपेक यानी 'ऑर्गेनाइजेशन ऑफ द पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज' दुनिया के उन देशों का एक शक्तिशाली समूह है, जिनके पास कच्चे तेल (Crude Oil) का विशाल भंडार है। इसकी स्थापना 1960 में बगदाद में हुई थी। इस संगठन का मुख्य उद्देश्य दुनिया भर में तेल की सप्लाई और कीमतों को नियंत्रित करना है ताकि उत्पादक देशों को उनके तेल की सही कीमत मिल सके और बाजार में स्थिरता बनी रहे। ओपेक का मुख्यालय ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना में स्थित है।
ओपेक के सदस्य देश
वर्तमान में ओपेक में मुख्य रूप से 12 देश शामिल हैं। इनमें अल्जीरिया, कांगो, इक्वेटोरियल गिनी, गैबॉन, ईरान, इराक, कुवैत, लीबिया, नाइजीरिया, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और वेनेजुएला शामिल हैं। (नोट: यूएई ने हाल ही में अलग होने के संकेत दिए हैं या प्रक्रिया में है, जैसा कि हालिया खबरों में चर्चा रही है)। सऊदी अरब इस समूह का सबसे शक्तिशाली सदस्य और अनौपचारिक लीडर माना जाता है, क्योंकि उसके पास सबसे ज्यादा उत्पादन क्षमता है।
OPEC+ क्या है और इसमें कौन शामिल है?
जब ओपेक देशों ने महसूस किया कि केवल वे ही अकेले वैश्विक बाजार को पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर सकते, तो उन्होंने कुछ अन्य बड़े तेल उत्पादक देशों के साथ हाथ मिलाया। इसी गठबंधन को 'ओपेक प्लस' (OPEC+) कहा जाता है। इसमें ओपेक के 12 सदस्यों के अलावा 10 और गैर-ओपेक देश शामिल हैं। इनमें सबसे प्रमुख रूस है। रूस के अलावा इसमें अजरबैजान, बहरीन, ब्रुनेई, कजाकिस्तान, मलेशिया, मैक्सिको, ओमान, सूडान और दक्षिण सूडान शामिल हैं। ओपेक प्लस के आने से तेल बाजार पर इस समूह की पकड़ और भी ज्यादा मजबूत हो गई है।
तेल की कीमतें कैसे तय होती हैं?
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें मुख्य रूप से 'मांग और आपूर्ति' (Demand and Supply) के सिद्धांत पर काम करती हैं। ओपेक देश इसी सिद्धांत का फायदा उठाते हैं। जब दुनिया में तेल की मांग ज्यादा होती है लेकिन सप्लाई कम, तो कीमतें बढ़ने लगती हैं। इसके विपरीत, जब सप्लाई बहुत ज्यादा हो जाती है और मांग कम, तो कीमतें गिरने लगती हैं।
ओपेक देश हर कुछ महीनों में बैठक करते हैं और तय करते हैं कि उन्हें कितना तेल निकालना है। इसे 'प्रोडक्शन कोटा' कहा जाता है। अगर उन्हें लगता है कि कीमतें बहुत गिर रही हैं, तो वे सभी मिलकर उत्पादन घटा देते हैं (Production Cut)। सप्लाई कम होते ही बाजार में तेल की कमी महसूस होती है और कीमतें फिर से बढ़ जाती हैं। वहीं, अगर वे चाहते हैं कि कीमतें कम हों या बाजार में उनका हिस्सा बढ़े, तो वे उत्पादन बढ़ा देते हैं।
सिर्फ मांग और आपूर्ति ही नहीं, बल्कि जियोपॉलिटिक्स भी तेल की कीमतों पर बड़ा असर डालती है। मध्य-पूर्व में तनाव, युद्ध (जैसे रूस-यूक्रेन युद्ध) या किसी बड़े तेल उत्पादक देश पर प्रतिबंध लगने से सप्लाई चेन प्रभावित होती है, जिससे कीमतें अचानक बढ़ जाती हैं। ओपेक देश इन स्थितियों का इस्तेमाल अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और वैश्विक राजनीति में अपना दबदबा बनाए रखने के लिए करते हैं। भारत जैसे देशों के लिए, जो अपनी जरूरत का अधिकांश तेल आयात करते हैं, ओपेक के फैसले सीधे तौर पर पेट्रोल-डीजल की महंगाई तय करते हैं।
