हाल ही में केंद्र सरकार और नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) ने UPI मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) को लेकर स्थिति साफ कर दी है। इस फैसले के बाद यह सवाल उठने लगा था कि क्या UPI के जरिए लोन की मासिक किश्त (EMI) चुकाने वाले ग्राहकों पर इसका असर पड़ेगा और क्या छोटे लोन महंगे हो जाएंगे? NPCI के ताजा स्पष्टीकरण से यह साफ हो गया है कि बैंकों और वित्तीय संस्थानों पर इसका कितना असर पड़ेगा और ग्राहकों के लिए भुगतान के कौन-से तरीके सबसे बेहतर रहेंगे।
क्या लोन ग्राहकों की जेब पर पड़ेगा सीधा असर?
सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि व्यापारी या बैंक MDR का खर्च सीधे ग्राहकों पर नहीं डाल सकते। बैंकों को सख्त निर्देश दिए गए हैं कि वे इस बात को सुनिश्चित करें कि किसी भी स्थिति में यह शुल्क लोन लेने वाले व्यक्ति से न वसूला जाए। इसका मतलब यह है कि जब आप अपने लोन की EMI चुकाते हैं, तो आपकी किस्त राशि में कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं जोड़ा जाएगा। अगर आपकी EMI 2,000 रुपये से अधिक है और आप उसका भुगतान UPI के जरिये से मैनुअल तरीके से (खुद ऐप खोलकर क्यूआर कोड स्कैन करके या UPI ID डालकर) करते हैं, तब यह MDR शुल्क लोन देने वाली संस्था या बैंक के खाते में जाएगा। यह शुल्क बैंकों और पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स के बीच आपस में बांटा जाता है, ग्राहकों से इसका कोई लेना-देना नहीं है।
ऑटोपे (AutoPay) और UPI मैंडेट पर कोई शुल्क नहीं
15 सितंबर 2026 को NPCI द्वारा जारी किए गए स्पष्टीकरण के अनुसार, अगर आपने अपनी EMI के लिए ऑटोमेटेड रिकरिंग पेमेंट यानी 'UPI मैंडेट' या 'ऑटोपे' सेट किया हुआ है, तो इस पर किसी भी तरह का MDR शुल्क नहीं लगेगा। यह छूट केवल लोन की किस्तों तक सीमित नहीं है, बल्कि हर महीने कटने वाले बिजली-पानी के बिल, ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के सब्सक्रिप्शन और नियमित रूप से किए जाने वाले म्यूचुअल फंड निवेश पर भी लागू होती है। इसका सीधा मतलब यह है कि अगर आपकी किस्त हर महीने आपके खाते से अपने आप कटती है, तो बैंक या फिनटेक कंपनियों को भी उस पर कोई MDR शुल्क नहीं देना होगा।
बैंकों के मार्जिन और लोन की लागत पर प्रभाव
चूंकि बैंक इस शुल्क को ग्राहकों से सीधे तौर पर नहीं ले सकते, इसलिए अगर कोई ग्राहक हर महीने 2,000 रुपये से अधिक की EMI खुद मैनुअल तरीके से UPI के जरिए चुकाता है, तो बैंक को अपनी जेब से यह ट्रांजैक्शन कॉस्ट देनी होगी। इससे लोन देने वाली कंपनियों और बैंकों के ऑपरेटिंग मार्जिन पर मामूली असर पड़ सकता है। हालांकि, इस स्थिति से बचने का रास्ता भी बेहद आसान है। बैंक और फाइनेंस कंपनियां अब अपने ग्राहकों को ऑटोपे या स्थायी निर्देश (Standing Instructions) सेट करने के लिए प्रोत्साहित करेंगी। इससे न केवल बैंकों का लेनदेन शुल्क बचेगा, बल्कि ग्राहकों को भी हर महीने मैन्युअल रूप से किस्त भरने की झंझट से मुक्ति मिलेगी।
कौन-से ग्राहक होंगे प्रभावित और क्या है आगे की राह?
इस नियम का असर मुख्य रूप से उन ग्राहकों पर पड़ता दिख सकता है जिनकी EMI 2,000 रुपये से ज्यादा है और जो हर महीने खुद UPI ऐप के जरिए भुगतान करते हैं। जिन लोगों की EMI 2,000 रुपये या उससे कम है, उन पर लोन के प्रकार या अवधि से परे, इस नियम का कोई असर नहीं पड़ेगा। फिलहाल इस बात का कोई आधिकारिक डेटा उपलब्ध नहीं है कि किस सेक्टर में कितने लोग मैनुअल भुगतान करते हैं, लेकिन यह तय है कि इस कदम से देश में ऑटोमेटेड डिजिटल भुगतानों को और ज्यादा बढ़ावा मिलेगा। लोन लेने वालों के लिए सलाह यही है कि वे अपनी EMI के लिए ऑटोपे सेट करें, ताकि बिना किसी रुकावट और अतिरिक्त लागत के उनका भुगतान समय पर होता रहे।
