कमर्शियल गैस सिलेंडर और हवाई ईंधन (ATF) के दाम बढ़ने के बाद अब सीएनजी की कीमतों में भी बढ़ोतरी शुरू हो गई है। इस बार टॉरेंट गैस ने सीएनजी के दाम बढ़ा दिए हैं। इससे पहले निजी कंपनी नायरा ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों में इजाफा किया था, हालांकि सरकारी तेल कंपनियों ने फिलहाल पेट्रोल-डीजल के रेट्स में कोई बदलाव नहीं किया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें अब 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं। इस फैसले ने न केवल निजी वाहन मालिकों, बल्कि ऑटो-रिक्शा चालकों और टैक्सी ऑपरेटरों की भी चिंता बढ़ा दी है। आइए जानते हैं कि टॉरेंट गैस ने सीएनजी की कीमतों में कितनी बढ़ोतरी की है।
आम जनता और ऑटो चालकों पर पड़ा सीधा असर
टॉरेंट गैस द्वारा की गई इस बढ़ोतरी का सीधा असर लोगों की जेब पर पड़ने लगा है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि सीएनजी के दाम बढ़ने से उनके मासिक बजट पर दबाव बढ़ेगा। सबसे ज्यादा परेशान ऑटो-रिक्शा चालक हैं, जिनका मुनाफा पहले ही कम होता जा रहा था। चालकों का कहना है कि गैस महंगी होने से उनकी दैनिक कमाई का बड़ा हिस्सा ईंधन में चला जाएगा, जिससे परिवार का खर्च चलाना मुश्किल होगा। इससे आने वाले दिनों में शहर के भीतर सार्वजनिक परिवहन और कैब के किरायों में भी बढ़ोतरी की संभावना प्रबल हो गई है।
कमर्शियल सिलेंडर और अन्य ईंधनों का हाल
महंगाई की यह मार केवल सीएनजी तक सीमित नहीं है। 1 अप्रैल 2026 से ही देश में कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की दरों में भारी इजाफा किया गया है। दिल्ली जैसे बड़े शहरों में 19 किलोग्राम वाला कमर्शियल सिलेंडर अब 195.50 रुपये महंगा होकर 2,078.50 रुपये का मिल रहा है। इसके साथ ही एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) यानी हवाई जहाज के ईंधन की कीमतों में भी तेजी आई है, जिससे हवाई यात्रा भी महंगी हो सकती है। हालांकि, राहत की बात यह है कि सरकारी तेल कंपनियों ने फिलहाल घरेलू रसोई गैस और पेट्रोल-डीजल की कीमतों को स्थिर रखा है, लेकिन निजी कंपनी 'नायरा' ने पहले ही पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाकर संकेत दे दिए हैं कि दबाव बढ़ रहा है।
आखिर क्यों बढ़ रहे हैं दाम?
ईंधन की कीमतों में इस आग के पीछे वैश्विक कारण सबसे प्रमुख हैं। पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में जारी युद्ध और तनाव के कारण कच्चे तेल की सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई है। विशेष रूप से 'होर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) जैसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों में आई बाधाओं ने ऊर्जा की लागत को आसमान पर पहुँचा दिया है। कच्चे तेल का 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँचना भारतीय बाजार के लिए एक बड़ा झटका है, क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। इसी वैश्विक अस्थिरता का असर अब परिवहन से लेकर हॉस्पिटैलिटी सेक्टर तक हर जगह महसूस किया जा रहा है।
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