बिजनेस

Tata और RBI में चल रहा 'शह-मात' का खेल, मिलेगी IPO से छूट या टाटा संस की जबरन होगी लिस्टिंग?

Tata समूह को नियंत्रित करने वाली कंपनी Tata Sons और RBI के बीच लंबे समय से शह-मात का खेल चल रहा है। रिजर्व बैंक चाहता है कि कंपनी की लिस्टिंग हो वहीं कंपनी IPO लाने से कतरा रही है।

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टाटा और रिजर्व बैंक के बीच खींचतान

Tata Sons IPO RBI Final Decision : देश के सबसे बड़े बिजनेस घराने 'टाटा ग्रुप' और बैंकिंग रेगुलेटर RBI (Reserve Bank of India) के बीच इस समय भारतीय कॉरपोरेट इतिहास की सबसे बड़ी कानूनी और रेगुलेटरी जंग चल रही है। इस कहानी का सबसे दिलचस्प मोड़ यह है कि जहां देश की हर कंपनी शेयर बाजार में लिस्ट होने के लिए तरसती है, वहीं टाटा संस (Tata Sons) बाजार में आने से बचने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा रही है। हाल ही में आए RBI के ताजा सर्कुलर और कड़े रुख ने टाटा की इस 'नो-लिस्टिंग' प्लानिंग पर लगभग पानी फेर दिया है। आइए इस पूरी कॉरपोरेट ड्रामे को आसान भाषा में समझते हैं।

विवाद की असली जड़ क्या है?

साल 2022 में RBI ने टाटा संस को 'अपर लेयर' (Upper Layer) NBFC की कैटेगरी में डाल दिया था। नियम के मुताबिक, इस लिस्ट में आने वाली किसी भी नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी को 3 साल के भीतर शेयर बाजार में लिस्ट होना अनिवार्य होता है। टाटा संस के लिए यह डेडलाइन सिर पर है, लेकिन टाटा ग्रुप अपनी इस मुख्य होल्डिंग कंपनी को पब्लिक नहीं करना चाहता। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि लिस्टिंग होने से टाटा ट्रस्ट्स का मालिकाना कंट्रोल कम हो सकता है और उन्हें जनता व रेगुलेटर्स की भारी स्क्रूटनी (जांच-परख) का सामना करना पड़ेगा।

टाटा संस की रणनीति

टाटा संस का दावा है कि उसने 2024 में अपना सारा कर्ज चुका दिया। इस तरह उनके पास अब कोई 'पब्लिक फंड' (जनता का पैसा) सीधे तौर पर नहीं है। लेकिन, RBI ने साफ कर दिया कि अगर टाटा स्टील या टाटा मोटर्स जैसी लिस्टेड कंपनियों का टाटा संस में स्टेक है, तो इसे 'इनडायरेक्ट पब्लिक फंड' माना जाएगा। लिहाजा, टाटा संस इस लूपहोल का फायदा उठाकर अब तकनीकी रूप से बच नहीं सकती।

लाइसेंस सरेंडर की अर्जी

टाटा संस ने खुद को NBFC के दायरे से बाहर करने के लिए अपना Core Investment Company (CIC) का लाइसेंस सरेंडर करने की अर्जी दी। लेकिन, इसे लेकर RBI ने कहा कि सिर्फ कागजात सौंपने से लाइसेंस रद्द नहीं होता। अंतिम फैसला लेने का अधिकार पूरी तरह RBI के पास सुरक्षित है। जब तक RBI मंजूरी नहीं देता, तब तक टाटा संस पर अपर लेयर के कड़े नियम और लिस्टिंग की शर्त लागू रहेगी।

एसेट साइज का तर्क

टाटा ग्रुप को उम्मीद थी कि शायद एसेट साइज की सीमा को बढ़ा दिया जाएगा, जिससे वे इस नियम से बाहर हो जाएंगे। लेकिन, RBI ने साफ कर दिया कि ₹1 लाख करोड़ या उससे अधिक के एसेट साइज वाली हर प्राइवेट NBFC अपर लेयर में आएगी। टाटा संस की एसेट वैल्यू करीब ₹1.75 लाख करोड़ से ज्यादा है। लिहाजा, टाटा संस पूरी तरह से कड़े रेगुलेशन के दायरे में फिट बैठती है।

इनडायरेक्ट पब्लिक फंड क्या है?

इस तरह भले ही टाटा संस ने सीधे बैंकों या आम जनता से कोई नया कर्ज न लिया हो, लेकिन उसकी हिस्सेदार कंपनियां जैसे टाटा स्टील, टाटा केमिकल्स या टाटा पावर तो पब्लिक मार्केट से पैसा उठाती हैं। चूंकि इन कंपनियों का पैसा टाटा संस में लगा है, इसलिए रेगुलेटर इसे 'पब्लिक फंड का परोक्ष इस्तेमाल' मानता है।

अब आगे क्या होगा?

इस समय पूरा मामला पूरी तरह से RBI के पाले में है। टाटा संस के सामने अब केवल दो ही रास्ते बचते दिखाई दे रहे हैं। पहला, अगर RBI उनकी दलीलों को स्वीकार कर लेता है और उनके CIC लाइसेंस को रद्द करने की मंजूरी दे देता है, तो टाटा संस लिस्टिंग के इस चक्रव्यूह से बच जाएगी। हालांकि, केंद्रीय बैंक के हालिया कड़े रुख को देखते हुए इसकी उम्मीद कम ही लग रही है। अगर अगले कुछ महीनों में RBI ने टाटा संस की अर्जी ठुकरा दी, तो टाटा ग्रुप को न चाहते हुए भी भारतीय शेयर बाजार के इतिहास का सबसे बड़ा और सबसे चर्चित IPO (Initial Public Offering) बाजार में उतारना ही होगा।

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Yateendra Lawaniya
यतींद्र लवानिया author

प्रिंट और डिजिटल मीडिया में बिजनेस एवं इकोनॉमी कैटेगरी में 10 वर्षों से अधिक का अनुभव। पिछले 7 वर्षों से शेयर बाजार, कॉरपोरेट सेक्टर और आर्थिक नीतियों... और देखें

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