India-Japan Trade In Yen-Rupee : भारत और जापान के रिश्ते सिर्फ कारोबार तक सीमित नहीं हैं। बल्कि, दोनों गहरे कूटनीतिक या रक्षा सहयोगी भी हैं। दोनों देश अपनी इस साझेदारी को और व्यापक बनाना चाहते हैं। इसके लिए जापानी प्रधानमंत्री सनाए तकाइची की भारत यात्रा के दौरान स्थानीय मुद्रा यानी येन और रुपये में सीधे व्यापार (Direct Yen-Rupee Settlement) का प्रस्ताव चर्चा में है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर भारत और जापान के बीच कितना व्यापार होता है, कौन किसे क्या बेचता है, किसका कितना निवेश है और आने वाले वर्षों में दोनों देशों की आर्थिक साझेदारी कितनी बड़ी हो सकती है? आइए आसान भाषा में समझते हैं।
भारत-जापान के बीच कितना बड़ा है कारोबार?
वित्त वर्ष 2025-26 में भारत और जापान के बीच द्विपक्षीय कारोबार 27.47 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। हालांकि, यह आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है, लेकिन दोनों देशों की अर्थव्यवस्था के आकार को देखते हुए इसे काफी छोटा माना जाता है। इस व्यापार में जापान से भारत का आयात 21.43 अरब डॉलर रहा, जबकि भारत का जापान को निर्यात केवल 6.04 अरब डॉलर रहा। यानी जापान के साथ भारत करीब 15.39 अरब डॉलर के व्यापार घाटे में रहा। इसका मतलब साफ है कि भारत जापान से कहीं ज्यादा सामान खरीदता है, जबकि जापान को अपेक्षाकृत कम निर्यात करता है।
जापान को क्या-क्या बेचता है भारत?
भारत का निर्यात मुख्य रूप से ऐसे उत्पादों पर आधारित है, जिनमें देश की लागत प्रतिस्पर्धा मजबूत है। भारत जापान को पेट्रोलियम उत्पाद, ऑर्गेनिक केमिकल्स, स्टील, एल्युमीनियम, ऑटो पार्ट्स, फार्मास्यूटिकल्स, कृषि उत्पाद, समुद्री उत्पाद और टेक्सटाइल का निर्यात करता है। पिछले कुछ वर्षों में ऑटो कंपोनेंट्स, इंजीनियरिंग उत्पाद और विशेष रसायनों की हिस्सेदारी भी लगातार बढ़ रही है। भारत की कोशिश अब केवल कच्चा माल नहीं बल्कि ज्यादा वैल्यू एडेड उत्पादों का निर्यात बढ़ाने की है। खासतौर पर मारुति सुजुकी की तरफ से भारत में बनी कारों का जापान को निर्यात तेजी से बढ़ा है।
भारत को क्या बेचता है जापान?
जापान से भारत मुख्य रूप से हाई-टेक और कैपिटल गुड्स आयात करता है। इनमें मशीनरी, औद्योगिक उपकरण, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, ऑटो पार्ट्स, विशेष स्टील, तांबा, इंजीनियरिंग उपकरण और उन्नत मैन्युफैक्चरिंग मशीनें शामिल हैं। यही वजह है कि भारत का आयात बिल लगातार बढ़ रहा है। भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर, ऑटोमोबाइल और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में जापानी तकनीक की बड़ी भूमिका है।
क्यों बढ़ रहा है भारत का व्यापार घाटा?
पिछले 6 वर्षों में जापान से भारत का आयात लगभग दोगुना हो गया है, जबकि भारतीय निर्यात उसी गति से नहीं बढ़ पाया। इसके पीछे कई कारण हैं। एक बड़ा कारण जापानी येन की कमजोरी है। येन कमजोर होने से जापानी सामान अंतरराष्ट्रीय बाजार में सस्ता हो गया, जिससे भारत ने ज्यादा आयात किया। वहीं, भारतीय निर्यातकों को वैसा फायदा नहीं मिल पाया। दूसरी ओर, जापान के कड़े गुणवत्ता मानक, गैर-टैरिफ बाधाएं और कृषि व खाद्य उत्पादों पर सख्त नियम भी भारतीय निर्यात बढ़ाने में बड़ी चुनौती बने हुए हैं।
CEPA से कितना फायदा हुआ?
भारत और जापान के बीच 2011 में कॉम्प्रेहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट (CEPA) लागू हुआ था। इसका मकसद व्यापार बढ़ाना और दोनों देशों के बाजारों को एक-दूसरे के लिए खोलना था। हालांकि, इस समझौते से कई उत्पादों पर शुल्क कम हुए, लेकिन भारतीय निर्यात में अपेक्षित तेजी नहीं आ सकी। विशेषज्ञों का मानना है कि अब CEPA की समीक्षा जरूरी है, ताकि गैर-टैरिफ बाधाएं कम हों और भारतीय फार्मा, कृषि, फूड प्रोसेसिंग तथा टेक्सटाइल सेक्टर को ज्यादा बाजार मिल सके।
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भारत में जापान का कितना निवेश है?
व्यापार के लिहाज से भले ही भारत घाटे में है। लेकिन, जापान निवेश के मामले में भारत का सबसे भरोसेमंद साझेदार है। साल 2000 से जून 2025 तक जापान ने भारत में करीब 45 अरब डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) किया है। जापान भारत में 5वां सबसे बड़ा विदेशी निवेशक है। ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, वित्तीय सेवाएं, इंफ्रास्ट्रक्चर, दूरसंचार और फार्मा जैसे क्षेत्रों में जापानी कंपनियों की बड़ी मौजूदगी है। देशभर में करीब 1,400 जापानी कंपनियां और 5,000 से ज्यादा उनकी कारोबारी इकाइयां काम कर रही हैं।
बुलेट ट्रेन से लेकर AI तक बढ़ रहा सहयोग
भारत-जापान साझेदारी अब केवल व्यापार तक सीमित नहीं है। मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना दोनों देशों के सहयोग का सबसे बड़ा उदाहरण है। इसके अलावा सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्रिटिकल मिनरल्स, ग्रीन एनर्जी और सप्लाई चेन जैसे नए क्षेत्रों में भी सहयोग तेजी से बढ़ रहा है। दोनों देश अमेरिका और पश्चिमी देशों की "चाइना प्लस वन" रणनीति के तहत वैश्विक विनिर्माण और सप्लाई चेन को मजबूत करने पर भी साथ काम कर रहे हैं।
येन-रुपया सेटलमेंट क्यों है अहम?
फिलहाल, इसके संबंध में दोनों देशों ने कोई आधिकारिक जानकारी नहीं दी है। लेकिन, यदि दोनों देश स्थानीय मुद्रा यानी येन और रुपये में सीधे व्यापार करते हैं, तो अमेरिकी डॉलर पर कम निर्भरता घटेगी। इससे करेंसी एक्सचेंज की लागत घटेगी, भुगतान तेजी से होगा और डॉलर में उतार-चढ़ाव का जोखिम भी कम होगा। भारत में निवेश कर रही जापानी कंपनियों और जापान को निर्यात करने वाले भारतीय उद्योगों को इसका सीधा फायदा मिलेगा। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह कदम भविष्य में दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश को नई रफ्तार दे सकता है।
आगे क्या है प्लान?
भारत और जापान ने आने वाले वर्षों के लिए कई बड़े लक्ष्य तय किए हैं। इनमें 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 50 अरब डॉलर तक पहुंचाने की कोशिश, भारत में 10 ट्रिलियन येन के निवेश का रोडमैप, ईवी बैटरी निर्माण, सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन, ग्रीन हाइड्रोजन, डिजिटल टेक्नोलॉजी और कुशल भारतीय पेशेवरों की संख्या बढ़ाना शामिल है। यदि CEPA की समीक्षा सफल रहती है, स्थानीय मुद्रा में व्यापार शुरू होता है और निवेश की रफ्तार बनी रहती है, तो आने वाले दशक में भारत-जापान आर्थिक साझेदारी एशिया की सबसे मजबूत रणनीतिक साझेदारियों में शामिल हो सकती है।
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