Bonds vs Bond Mutual Funds: जब बात सुरक्षित निवेश और फिक्स्ड इनकम की आती है, तो 'बॉन्ड्स' (Bonds) हमेशा से भारतीय निवेशकों की पहली पसंद रहे हैं। लेकिन आज के समय में निवेशकों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि वे सीधे (Direct) बाजार से बॉन्ड खरीदें या फिर बॉन्ड म्यूचुअल फंड का रास्ता अपनाएं। इन दोनों ही रास्तों के अपने ही बेनिफिट और ड्राबैक हैं। ऐसे में आइए आपको बताते हैं दोनों का मतलब क्या है और आपके लिए क्या बेस्ट ऑप्शन रहेगा।
क्या है दोनों का मतलब?
सीधे बॉन्ड खरीदने का मतलब है कि आप किसी कंपनी या सरकार को एक निश्चित समय के लिए पैसा उधार दे रहे हैं, जिसके बदले आपको तय ब्याज मिलता है। वहीं, बॉन्ड म्यूचुअल फंड में आपका पैसा एक प्रोफेशनल फंड मैनेजर द्वारा कई अलग-अलग बॉन्ड्स में फैला दिया जाता है। आपके पोर्टफोलियो की मजबूती इस बात पर निर्भर करती है कि आप अपनी जरूरतों के हिसाब से सही चुनाव कैसे करते हैं।
सीधे बॉन्ड में निवेश करने का सबसे बड़ा फायदा इसकी निश्चितता (Predictability) है। अगर आप किसी बॉन्ड को उसकी मैच्योरिटी (परिपक्वता) तक अपने पास रखते हैं, तो आपको पता होता है कि हर साल कितना ब्याज मिलेगा और अंत में आपका मूलधन कब वापस आएगा। इसमें बाजार में होने वाले उतार-चढ़ाव का आपके रिटर्न पर कोई असर नहीं पड़ता। साथ ही, इसमें आपको म्यूचुअल फंड की तरह कोई सालाना 'एक्सपेंस रेशियो' या मैनेजमेंट फीस भी नहीं देनी पड़ती। हालांकि, इसका एक नकारात्मक पहलू यह है कि अच्छे बॉन्ड्स में निवेश की न्यूनतम राशि अक्सर बहुत ज्यादा होती है और एक सामान्य निवेशक के लिए अलग-अलग कंपनियों के बॉन्ड्स खरीदकर अपना जोखिम कम करना (Diversification) काफी मुश्किल हो जाता है।
म्यूचुअल फंड के जरिए बॉन्ड का फ़ायदा
दूसरी ओर, बॉन्ड म्यूचुअल फंड उन लोगों के लिए बेहतरीन विकल्प हैं जो कम जोखिम और सुविधा चाहते हैं। यहां आपका निवेश एक ही जगह न होकर दर्जनों सरकारी और कॉर्पोरेट पेपर्स में फैला होता है, जिससे अगर एक कंपनी डिफॉल्ट भी कर जाए, तो आपके पूरे पोर्टफोलियो पर बहुत बड़ा असर नहीं पड़ता। सबसे बड़ी सुविधा इसकी तरलता (Liquidity) है; आप जब चाहें अपने फंड की यूनिट्स बेचकर पैसा निकाल सकते हैं, जबकि व्यक्तिगत बॉन्ड्स को मैच्योरिटी से पहले बाजार में बेचना कभी-कभी मुश्किल हो सकता है। इसके अलावा, आप महज ₹500 की छोटी SIP से भी इसकी शुरुआत कर सकते हैं। हालांकि, यहां आपको फंड मैनेजर की फीस देनी पड़ती है और आपके रिटर्न बाजार की ब्याज दरों के साथ ऊपर-नीचे होते रहते हैं।
आपके लिए क्या है बेहतर?
अगर टैक्स के नजरिए से देखें, तो अप्रैल 2023 के बाद से नियमों में बड़े बदलाव हुए हैं। अब बॉन्ड म्यूचुअल फंड से होने वाली कमाई पर आपको अपने इनकम टैक्स स्लैब के अनुसार टैक्स देना होता है। सीधे बॉन्ड्स से मिलने वाले ब्याज पर भी टैक्स स्लैब के हिसाब से ही कर लगता है। निवेश का फैसला आपकी पूंजी और समझ पर निर्भर करना चाहिए। यदि आप एक अनुभवी निवेशक हैं और आपके पास बड़ी पूंजी है, तो आप 'RBI रिटेल डायरेक्ट' जैसे प्लेटफॉर्म के जरिए सीधे सरकारी बॉन्ड (G-Secs) चुन सकते हैं। लेकिन यदि आप छोटे निवेश से शुरुआत करना चाहते हैं और खुद रिसर्च करने के झंझट से बचना चाहते हैं, तो बॉन्ड म्यूचुअल फंड ही आपके लिए सबसे सटीक और आसान विकल्प है।
