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क्या आपको पता है तेल की दुनिया की 'Seven Sisters' के नाम? इनकी मर्जी के बिना दुनिया में नहीं हिलता एक भी पत्ता

एक वक्त ऐसा था जब दुनिया के सारे क्रूड ऑयल पर सिर्फ सात कंपनियों का राज था। तब, इन कंपनीज को सेवन सिस्टर्स कहा जाता था। ऐसे में आइए आपको तेल कंपनियों की Seven Sisters के नाम बताते ।

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Seven Sisters

आज की दुनिया में जब हम पेट्रोल-डीजल की कीमतों में उतार-चढ़ाव देखते हैं, तो हमारी नजरें ओपेक (OPEC) देशों या रूस-अमेरिका के तनाव पर टिकी होती हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि 20वीं सदी के मध्य तक दुनिया के तेल के कुओं से लेकर आपके वाहन की टंकी तक, सब कुछ सिर्फ सात कंपनियों के हाथों में था? इन कंपनियों को 'सेवन सिस्टर्स' (The Seven Sisters) के नाम से जाना जाता था। यह कोई आधिकारिक नाम नहीं था, बल्कि इतालवी तेल कंपनी ENI के प्रमुख एनरिको मैटेई ने इन कंपनियों के एकाधिकार (Monopoly) को दर्शाने के लिए यह शब्द दिया था।

कौन थीं ये सात बहनें?

ये वो सात दिग्गज कंपनियां थीं जिन्होंने 1940 के दशक से लेकर 1970 के दशक तक दुनिया के लगभग 85% तेल भंडार पर कब्जा कर रखा था।

  • स्टैंडर्ड ऑयल ऑफ न्यू जर्सी (Esso): जिसे आज हम Exxon के नाम से जानते हैं।
  • रॉयल डच शेल: एक डच-ब्रिटिश कंपनी जो आज भी दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनियों में से एक है।
  • एंग्लो-पर्शियन ऑयल कंपनी (APOC): जिसे आज हम BP (British Petroleum) कहते हैं।
  • स्टैंडर्ड ऑयल ऑफ न्यूयॉर्क (Socony): जिसे बाद में Mobil कहा गया (अब यह Exxon के साथ मिलकर ExxonMobil बन चुकी है)।
  • स्टैंडर्ड ऑयल ऑफ कैलिफोर्निया (Socal): जिसे आज हम Chevron के नाम से जानते हैं।
  • गल्फ ऑयल: जिसका बाद में शेवरॉन में विलय हो गया।
  • टेक्साको: इसका भी बाद में शेवरॉन में विलय हो गया।

कैसे चलता था इनका राज?

'सेवन सिस्टर्स' की ताकत का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि ये कंपनियां सिर्फ तेल निकालती नहीं थीं, बल्कि ये खुद ही तय करती थीं कि किस देश से कितना तेल निकाला जाएगा और उसकी कीमत क्या होगी। खाड़ी देशों (Middle East) के पास तेल तो था, लेकिन उसे निकालने की तकनीक और वैश्विक बाजार तक पहुंचाने के संसाधन सिर्फ इन सात कंपनियों के पास थे। इन कंपनियों ने आपस में हाथ मिला रखा था ताकि कोई नई कंपनी इस क्षेत्र में न आ सके। उस समय कहा जाता था कि दुनिया में पत्ता भी इन कंपनियों की मर्जी के बिना नहीं हिलता, क्योंकि पूरी दुनिया की परिवहन व्यवस्था और सेनाएं इनके तेल पर निर्भर थीं।

ओपेक (OPEC) का उदय और 'सात बहनों' का अंत

इन कंपनियों की मनमानी और खाड़ी देशों को मिलने वाले कम मुनाफे ने धीरे-धीरे असंतोष पैदा किया। इसी गुस्से के परिणामस्वरूप 1960 में OPEC (Organization of the Petroleum Exporting Countries) का गठन हुआ। सऊदी अरब, ईरान, इराक, कुवैत और वेनेजुएला जैसे देशों ने महसूस किया कि उनके संसाधन पर उनका खुद का हक होना चाहिए। 1973 के तेल संकट (Oil Crisis) के दौरान जब इन देशों ने तेल की सप्लाई पर नियंत्रण किया और कीमतों में भारी उछाल आया, तब 'सेवन सिस्टर्स' का एकाधिकार टूटना शुरू हुआ। देशों ने अपनी राष्ट्रीय तेल कंपनियां (जैसे सऊदी अरामको) बनाना शुरू कर दिया।

आज 'सेवन सिस्टर्स' का वह पुराना स्वरूप नहीं रहा। इनमें से कई कंपनियों का आपस में विलय (Merger) हो चुका है। उदाहरण के लिए, अब एक्सॉन और मोबिल एक हैं, और शेवरॉन ने गल्फ ऑयल व टेक्साको को खरीद लिया है। हालांकि आज भी ये कंपनियां बहुत शक्तिशाली हैं, लेकिन अब बाजार में इनका मुकाबला चीन की सिनोपेक, सऊदी अरामको और रूस की रोज़नेफ्ट जैसी सरकारी कंपनियों से है।

Richa Tripathi
रिचा त्रिपाठीauthor

रिचा त्रिपाठी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में बिजनेस डेस्क पर सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। मीडिया इंडस्ट्री में 7 वर्षों के अनुभव के साथ रिचा, पर्सनल फाइनेंस, स्टॉक मार्केट, टैक्स प्लानिंग और अर्थव्यवस्था से जुड़े विषयों पर मजबूत पकड़ रखती हैं। अब तक 8,000 से अधिक कंटेंट लिख चुकी रिचा की विशेषता है—जटिल वित्तीय जानकारियों को सरल, स्पष्ट और भरोसेमंद तरीके से पाठकों तक पहुंचाना। वह ऐसी स्टोरीज तैयार करती हैं जो न केवल जानकारीपूर्ण होती हैं, बल्कि आम पाठक की वित्तीय समझ को बेहतर बनाने में भी मदद करती हैं।

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