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दूध, अंडे और चिकन के बढ़े दाम से जल्द नहीं मिलेगी राहत, जानिए क्यों जेब होती रहेगी ढीली?

अगर मक्का, सोयाबीन मील और दूसरी फीड सामग्री की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं तो पोल्ट्री और डेयरी किसानों की उत्पादन लागत कम होना मुश्किल है। मतलब यह है कि दूध, अंडे और चिकन के दाम नहीं घटेंगे।

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खाद्य महंगाई

महंगाई की चौतरफा मार से आम आदमी परेशान है। चीनी, तेल, सब्जी से लेकर दूध, अंडे और चिकन के बढ़े दाम से रसोई का बजट काफी बढ़ चुका है। आम लोगों को समझ में नहीं आ रहा है कि इसे बढ़े खर्च को कैसे मैनेज करें। इस बीच एक और बुरी खबर है। दूध, अंडे और चिकन के बढ़े दाम से जल्द राहत नहीं मिलने वाली हे। दरअसल, पशुओं और मुर्गियों के चारे में इस्तेमाल होने वाले मक्का, सोयाबीन मील और दूसरी तिलहन खली की कीमतें तेजी से बढ़ी है। इसचे चलते इन खाने-पीने के सामान के दाम घटने की संभावना नहीं है।

चारा महंगा होने से दूध-अंडा-चिकन महंगा

बता दें कि पोल्ट्री और डेयरी फार्मिंग में उत्पादन लागत का करीब 65-70% हिस्सा चारे का होता है। मुर्गियों और पशुओं के लिए चारे में मक्का ऊर्जा का प्रमुख स्रोत है, जबकि प्रोटीन की जरूरत मुख्य रूप से सोयाबीन मील और दूसरी तिलहन खली से पूरी होती है। ब्रॉयलर मुर्गियों के चारे में करीब 55-65% मक्का होता है। अंडे देने वाली मुर्गियों यानी लेयर के चारे में मक्के की हिस्सेदारी करीब 50-60% रहती है। वहीं, मवेशियों के चारे में यह हिस्सा लगभग 15-20% है। प्रोटीन के लिए ब्रॉयलर फीड में करीब 25-30% सोयाबीन मील और लेयर फीड में 18-20% सोयाबीन मील इस्तेमाल होता है। मवेशियों के कंपाउंड फीड में तिलहन की खली और मील की हिस्सेदारी करीब 40-50% तक हो सकती है। इसलिए इन कच्चे माल की कीमत बढ़ने का सीधा असर दूध, अंडे और चिकन की उत्पादन लागत पर होता है।

मक्का और सोयाबीन ने बढ़ाई चिंता

तमिलनाडु के इरोड जिले की अलंगेयम मंडी में मक्के की औसत कीमत अगस्त 2025 में करीब ₹2,537 प्रति क्विंटल थी, जो अगस्त 2026 में बढ़कर करीब ₹2,759 प्रति क्विंटल हो गई। सोयाबीन मील की कीमतों में भी तेज उछाल देखने को मिला। NCDEX के भावों के मुताबिक मध्य प्रदेश के इंदौर में 50% प्रोटीन वाले सोयाबीन मील की कीमत अगस्त 2025 में करीब ₹38,186 प्रति टन थी, जो अगस्त 2026 में बढ़कर ₹58,156 प्रति टन तक पहुंच गई। सिर्फ सोयाबीन ही नहीं, मूंगफली, रेपसीड, कॉटनसीड और राइस ब्रान से मिलने वाली खली की कीमतें भी पिछले साल की तुलना में ऊंची हैं।

अल नीनो ने भी बढ़ाई परेशानी

पोल्ट्री उद्योग के मुताबिक लंबी गर्मी, मॉनसून में देरी और पानी की कमी ने मुर्गियों में हीट स्ट्रेस बढ़ाया। इससे पक्षियों की मृत्यु दर बढ़ी और उत्पादन पर असर पड़ा। दूसरी ओर, महंगे फीड ने किसानों की लागत और बढ़ा दी। पिछले चार महीनों में लेयर फीड की कीमत करीब ₹24-26 प्रति किलो से बढ़कर ₹30-32 प्रति किलो हो गई है। ब्रॉयलर फीड की कीमत भी इसी अवधि में करीब ₹40 से बढ़कर ₹46 प्रति किलो हो गई। इससे ब्रॉयलर चिकन की कुल उत्पादन लागत करीब ₹110 प्रति किलो तक पहुंच गई है।

आगे मक्के की कीमत बन सकती है चुनौती

सोयाबीन को लेकर फिलहाल कुछ राहत की उम्मीद है। खरीफ सीजन में सोयाबीन की बुआई पिछले साल के आसपास रही है और फसल की स्थिति भी अब तक सामान्य से बेहतर बताई जा रही है। बड़ी चिंता मक्के को लेकर है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार खरीफ सीजन में मक्के का रकबा करीब 4.1% घटा है। अमेरिका के कृषि विभाग ने 2026-27 में भारत का मक्का उत्पादन करीब 50 मिलियन टन रहने का अनुमान लगाया है, जबकि 2025-26 में उत्पादन करीब 55.1 मिलियन टन था। अगर उत्पादन घटता है और मांग मजबूत रहती है तो मक्के की कीमत पर दबाव बढ़ सकता है।

एथेनॉल ने भी बढ़ाई मक्के की मांग

मक्के का इस्तेमाल सिर्फ पशु चारे में नहीं होता। एथेनॉल उत्पादन के लिए भी मक्के की मांग बढ़ रही है। अगर मक्के की कीमत लगातार बढ़ती है तो सरकार के सामने यह संतुलन बनाने की चुनौती होगी कि मक्के का इस्तेमाल पशु चारे, खाद्य जरूरतों और एथेनॉल उत्पादन के बीच कैसे बांटा जाए। चीनी की कीमतों में तेजी के बीच सरकार गन्ने के रस और B-Heavy Molasses से एथेनॉल उत्पादन को लेकर भी नीतिगत बदलाव कर सकती है। वहीं, अगर मक्के की कीमतों में तेज वृद्धि जारी रहती है तो फीड ग्रेन से एथेनॉल बनाने की नीति पर भी दोबारा विचार की जरूरत पड़ सकती है।

Alok Kumar
आलोक कुमार author

आलोक कुमार टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में एसोसिएट एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। इलेक्ट्रॉनिक, डिजिटल और प्रिंट मीडिया में 17 वर्षों से अधिक का व्यापक अनुभव रखने वाले आलोक ने अपने पत्रकारिता करियर में कई प्रमुख कॉर्पोरेट इवेंट्स और चर्चित स्टोरीज कवर की हैं। वह बिजनेस, बैंकिंग, शेयर मार्केट और पर्सनल फाइनेंस पर गहरी समझ रखते हैं और जटिल वित्तीय जानकारियों को सरल, स्पष्ट और पाठक-केंद्रित तरीके से प्रस्तुत करने में माहिर हैं। अब तक आलोक ने लगभग 18,000 स्टोरीज लिखी हैं। उनकी लेखन शैली भरोसेमंद, विश्लेषणात्मक और व्यावहारिक जानकारी देने वाली होती है।

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