दुनिया की दिग्गज टेक कंपनियों में इस वक्त बड़े बदलावों का दौर चल रहा है। एक तरफ मेटा (Meta) ने अपनी वर्कफोर्स का 10 प्रतिशत हिस्सा यानी करीब 8,000 कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया है, तो दूसरी तरफ माइक्रोसॉफ्ट (Microsoft) ने अपने कर्मचारियों को Voluntary Buyout का एक बड़ा ऑफर दिया है। इन फैसलों ने पूरी दुनिया के टेक प्रोफेशनल्स की नींद उड़ा दी है और एक बार फिर चर्चा शुरू हो गई है कि क्या टेक सेक्टर में नौकरियों का सुनहरा दौर अब खत्म हो रहा है?
माइक्रोसॉफ्ट का 'बायआउट' ऑफर
माइक्रोसॉफ्ट ने अपने इतिहास में पहली बार इतने बड़े पैमाने पर स्वैच्छिक रिटायरमेंट का प्रस्ताव रखा है। रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका में कंपनी के लगभग 7 प्रतिशत कर्मचारी यानी करीब 8,750 लोग इस योजना के दायरे में आ सकते हैं। यह ऑफर उन कर्मचारियों के लिए है, जिनकी उम्र और कंपनी में बिताए गए साल का योग 70 या उससे ज्यादा है। कंपनी इन कर्मचारियों को एकमुश्त मोटी रकम और आर्थिक सहायता देकर खुद से नौकरी छोड़ने का मौका दे रही है। कंपनी का मानना है कि इससे कर्मचारी अपनी शर्तों पर सम्मानजनक तरीके से करियर का अगला पड़ाव चुन सकेंगे।
AI की दौड़ और खर्चों का दबाव
सवाल यह है कि इतनी बड़ी और अमीर कंपनी माइक्रोसॉफ्ट को आखिर छंटनी या बायआउट की जरूरत क्यों पड़ी? इसका सबसे बड़ा जवाब है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की रेस। माइक्रोसॉफ्ट इस समय AI और डेटा सेंटर इंफ्रास्ट्रक्चर पर अरबों डॉलर निवेश कर रही है। भारी-भरकम खर्चों को संतुलित करने और अपनी वर्कफोर्स को AI युग के हिसाब से ढालने के लिए कंपनी अपनी लागत कम करना चाहती है। यह केवल माइक्रोसॉफ्ट की कहानी नहीं है, बल्कि पूरी इंडस्ट्री का ट्रेंड है, जहां कंपनियां पुरानी भूमिकाओं को कम करके AI पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं।
मेटा के 8,000 कर्मचारियों पर गाज
वहीं, दूसरी ओर फेसबुक की पैरेंट कंपनी मेटा ने अपनी लागत कम करने के लिए बड़े पैमाने पर छंटनी का रास्ता अपनाया है। मेटा ने अपनी वर्कफोर्स के 10 प्रतिशत यानी 8,000 कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया है। मेटा के लिए भी यह साल काफी चुनौतीपूर्ण रहा है, जहां विज्ञापन से मिलने वाली कमाई में कमी और मेटावर्स (Metaverse) पर भारी निवेश के कारण कंपनी पर वित्तीय दबाव बढ़ा है। ओरेकल जैसी अन्य बड़ी टेक कंपनियों ने भी पिछले कुछ समय में कर्मचारियों की संख्या में कटौती की है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, कंपनी ने कहा है कि वह यह छंटनी एफिशिएंसी बढ़ाने और अपने बिजनेस के नए क्षेत्रों में निवेश करने के लिए कर रही है। साथ ही, कंपनी लगभग 6,000 खाली पदों को अब नहीं भरेगी।
टेक कंपनियों के ये कदम बताते हैं कि अब 'ग्रोथ एट एनी कॉस्ट' (हर कीमत पर विकास) का दौर बीत चुका है। अब कंपनियां 'एफिशिएंसी' यानी कुशलता पर ध्यान दे रही हैं। इन छंटनियों और बायआउट का असर केवल उन कर्मचारियों पर नहीं पड़ रहा जो कंपनी छोड़ रहे हैं, बल्कि उन पर भी पड़ रहा है जो अभी काम कर रहे हैं, क्योंकि काम का बोझ बढ़ रहा है और भविष्य की सुरक्षा को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।
