India Rice Exports: ईरान पर अमेरिका और इजराइल के साझा हमले के बाद पैदा हुए संकट का असर अब भारतीय चावल निर्यात पर भी साफ दिखाई देने लगा है। देश के चावल निर्यातकों ने सरकार से तुरंत राहत देने की मांग की है। उनका कहना है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और समुद्री रास्तों पर अस्थिरता के कारण निर्यात से जुड़े कामकाज में बड़ी दिक्कतें आ रही हैं। भारतीय चावल निर्यातक महासंघ ने सरकार से अपील की है कि इस स्थिति को देखते हुए निर्यातकों को कुछ तात्कालिक राहत दी जाए ताकि उन्हें आर्थिक नुकसान से बचाया जा सके।
बंदरगाह शुल्क में छूट की मांग
न्यूज एजेंसी पीटीआई-भाषा के मुताबिक निर्यातकों का कहना है कि कई जहाजों के रद्द होने की वजह से बंदरगाहों पर भेजा गया माल वापस लौट रहा है। ऐसी स्थिति में स्टोरेज, डेमरेज और दूसरे बंदरगाह शुल्क का बोझ काफी बढ़ गया है। इसलिए उन्होंने सरकार से इन शुल्कों में छूट देने की मांग की है। उनका कहना है कि अगर जहाज रद्द हो जाते हैं और कार्गो को वापस लाना पड़ता है या उसका रास्ता बदलना पड़ता है, तो उससे जुड़े दस्तावेजी और भुगतान संबंधी काम भी मुश्किल हो जाते हैं। ऐसे मामलों में सीमा शुल्क विभाग और भारतीय रिजर्व बैंक से सहयोग की भी मांग की गई है ताकि भुगतान समायोजन और दस्तावेजी प्रक्रियाएं आसान हो सकें।
अपरिहार्य स्थिति घोषित करने की मांग
चावल निर्यातकों ने सरकार से यह भी कहा है कि इस संकट को एक ‘अपरिहार्य स्थिति’ यानी ऐसी परिस्थिति के रूप में माना जाए जिस पर किसी का नियंत्रण नहीं होता। उनका तर्क है कि यदि सरकार ऐसा परामर्श जारी करती है तो निर्यातकों पर गलत तरीके से जुर्माना लगाने से बचा जा सकेगा। इसके अलावा उन्होंने कोविड-19 महामारी के समय दी गई राहत की तरह अस्थायी वित्तीय मदद देने की भी मांग की है। इसमें बैंकों द्वारा कार्यशील पूंजी की सीमा बढ़ाना और ऋण अवधि में विस्तार करना शामिल है, ताकि निर्यातकों को तत्काल नकदी संकट से राहत मिल सके।
लॉजिस्टिक्स और कंटेनर की बड़ी समस्या
महासंघ का कहना है कि ईरान संकट के बाद निर्यातकों को लॉजिस्टिक्स से जुड़ी गंभीर परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। पश्चिम एशिया के लिए कंटेनरों की भारी कमी हो गई है और कई शिपिंग कंपनियां जहाजों की आवाजाही को सीमित कर रही हैं या यात्राएं रद्द कर रही हैं। इसके कारण निर्यातकों को समय पर माल भेजने में दिक्कत आ रही है। इतना ही नहीं, कंटेनर की कमी अब दूसरे देशों के लिए भेजे जाने वाले माल को भी प्रभावित करने लगी है।
मालभाड़ा और बीमा लागत में तेज बढ़ोतरी
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर माल ढुलाई की लागत भी तेजी से बढ़ी है। निर्यातकों के मुताबिक पिछले कुछ समय में अंतरराष्ट्रीय मालभाड़ा करीब 15 से 20 प्रतिशत तक बढ़ गया है। इसके अलावा खाड़ी देशों के लिए जहाज भेजने पर युद्ध जोखिम शुल्क और बीमा प्रीमियम भी काफी बढ़ गए हैं। इससे निर्यात की कुल लागत में बड़ा इजाफा हुआ है और पहले से किए गए निर्यात अनुबंधों पर दबाव बढ़ गया है।
जहाज ईंधन महंगा, कीमतों पर असर
समुद्री जहाजों में इस्तेमाल होने वाले बंकर ईंधन की कीमतों में भी तेज उछाल आया है। महासंघ के अनुसार जहाजों में इस्तेमाल होने वाला ईंधन तेल पहले करीब 520 डॉलर प्रति टन था, जो अब बढ़कर करीब 700 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गया है। इससे शिपिंग कंपनियों की लागत बढ़ी है और उसका असर निर्यातकों पर भी पड़ रहा है।
घरेलू बाजार में बासमती की कीमत गिरी
इस बीच घरेलू बाजार में भी स्थिति निर्यातकों के लिए आसान नहीं है। पिछले 72 घंटों में बासमती चावल की कीमतों में करीब 7 से 10 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई है। कीमतों में यह गिरावट कार्यशील पूंजी पर अतिरिक्त दबाव बना रही है। निर्यातकों का कहना है कि जब माल की खेप में देरी होती है या उसे आगे के लिए टालना पड़ता है, तो अचानक बढ़े मालभाड़े, ईंधन और बीमा लागत का बोझ उठाना उनके लिए बेहद मुश्किल हो जाता है।
सरकार से जल्द राहत की उम्मीद
निर्यातकों का कहना है कि अगर जल्द राहत नहीं दी गई तो चावल निर्यात कारोबार को बड़ा नुकसान हो सकता है। इसलिए उन्होंने सरकार से अपील की है कि मौजूदा हालात को देखते हुए तुरंत राहत पैकेज, शुल्क में छूट और बैंकिंग सहायता जैसी व्यवस्था की जाए। उनका मानना है कि इससे न सिर्फ निर्यातकों को मौजूदा संकट से उबरने में मदद मिलेगी, बल्कि भारत के चावल निर्यात को भी स्थिर बनाए रखने में सहायता मिलेगी।
