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BRICS समिट के बीच भारत-चीन व्यापार में बड़ा उछाल, पहुंचा 127 अरब डॉलर के पार, लेकिन भारत के लिए चिंता की बात

India-China Trade: 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान भारत-चीन व्यापार बढ़कर 127.7 अरब डॉलर पहुंचा। हालांकि, मैन्युफैक्चरिंग के लिए जरूरी चीनी कच्चे माल और इलेक्ट्रॉनिक्स पर निर्भरता के कारण भारत का व्यापार घाटा रिकॉर्ड 99.19 अरब डॉलर हो गया।

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18वें ब्रिक्स सम्मेलन के बीच भारत-चीन व्यापार ने पकड़ी रफ्तार: चीनी कच्चे माल और तकनीक पर बढ़ी भारतीय उद्योग की निर्भरता (तस्वीर-X)

India-China Trade : भारत मंडपम में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के अवसर पर एक महत्वपूर्ण आर्थिक तस्वीर सामने आई है। इस सम्मेलन में भाग लेने के लिए चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग सात साल के लंबे अंतराल के बाद नई दिल्ली पहुंचे हैं, जहां उनकी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ द्विपक्षीय बातचीत भी प्रस्तावित है। इस बैठक और सम्मेलन के बीच आए आंकड़े दर्शाते हैं कि रणनीतिक चिंताओं के बावजूद दोनों पड़ोसियों के बीच आर्थिक निर्भरता और व्यापार लगातार मजबूत हो रहा है। वित्त वर्ष 2025-26 के आंकड़ों के मुताबिक, चीन भारत का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बना हुआ है।

द्विपक्षीय व्यापार और बढ़ता व्यापार घाटा

न्यूज एजेंसी पीटीआई-भाषा के मुताबिक भारत और चीन के बीच द्विपक्षीय व्यापार में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। वित्त वर्ष 2025-26 में दोनों देशों के बीच कुल व्यापार 7.9 प्रतिशत बढ़कर 127.7 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो 2024-25 में 118.39 अरब डॉलर था। हालांकि, इस व्यापार वृद्धि के साथ भारत का व्यापार घाटा चिंताजनक स्तर पर पहुंच गया है। पिछले वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का व्यापार घाटा बढ़कर 99.19 अरब डॉलर दर्ज किया गया। अगर ऐतिहासिक आंकड़ों पर नजर डालें, तो व्यापार घाटे का यह आंकड़ा 2024-25 में 85 अरब डॉलर, 2023-24 में 83.2 अरब डॉलर, 2022-23 में 73.3 अरब डॉलर, 2021-22 में 44 अरब डॉलर, 2020-21 में 48.64 अरब डॉलर और 2019-20 में 53.56 अरब डॉलर रहा था। यह लगातार बढ़ता घाटा दोनों देशों के व्यापार संतुलन में एक बड़ी असमानता को दर्शाता है।

आयात और निर्यात की वर्तमान स्थिति

व्यापार के कुल आंकड़ों में भारत के निर्यात और आयात दोनों में बढ़ोतरी देखी गई है। 2025-26 में चीन को भारत का निर्यात 36.62 प्रतिशत बढ़कर 19.47 अरब डॉलर हो गया, जो इससे पिछले वित्त वर्ष (2024-25) में 14.25 अरब डॉलर था। वहीं दूसरी तरफ, चीन से भारत का आयात भी 16 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़कर 131.62 अरब डॉलर के स्तर पर पहुंच गया, जो 2024-25 में 113.44 अरब डॉलर था। प्रतिशत हिस्सेदारी के मामले में, भारत के कुल वस्तु आयात में चीन की हिस्सेदारी बढ़कर करीब 17 प्रतिशत हो गई है (जो 2024-25 में 15.7 प्रतिशत थी)। वहीं, भारत के कुल निर्यात में चीन की हिस्सेदारी 3.2 प्रतिशत से बढ़कर 4.4 प्रतिशत दर्ज की गई है।

चीनी औद्योगिकी उत्पादों पर भारत की निर्भरता

भारत द्वारा चीन से किए जाने वाले आयात का ढांचा दर्शाता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था चीनी औद्योगिक सामानों पर कितनी गहराई से निर्भर है। वर्ष 2025 में चीन से आए कुल आयात का 98.5 प्रतिशत हिस्सा केवल औद्योगिक उत्पादों का था। इसके विपरीत कृषि, ईंधन, रत्न और आभूषणों की संयुक्त हिस्सेदारी 1.5 प्रतिशत से भी कम रही। आंकड़ों के अनुसार, भारत के कुल चीनी आयात का करीब 66 प्रतिशत (जिसका मूल्य 82.6 अरब डॉलर है) केवल चार प्रमुख श्रेणियों इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, कंप्यूटर और कार्बनिक रसायनों तक सीमित है। विशिष्ट क्षेत्रों की बात करें तो भारत अपने कुल इलेक्ट्रॉनिक्स आयात का 43 प्रतिशत, मशीनरी और कंप्यूटर आयात का 40 प्रतिशत तथा कार्बनिक रसायनों के आयात का 44 प्रतिशत हिस्सा सीधे चीन से मंगवाता है।

सप्लाई चेन और विनिर्माण क्षेत्र की मजबूरियां

आर्थिक शोध संस्थान 'ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव' (जीटीआरआई) के विश्लेषण के अनुसार, चीन से आने वाले ये उत्पाद ऐसे नहीं हैं जिन्हें आसानी से नजरअंदाज किया जा सके या जिनकी खरीदारी टाली जा सके। ये भारतीय विनिर्माण क्षेत्र के लिए अनिवार्य कच्चे माल हैं, जो देश के मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम को संचालित करते हैं। भारतीय उद्योग चीनी इलेक्ट्रॉनिक कलपुर्जों, इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) बैटरियों, सोलर मॉड्युल्स, एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स (एपीआई) और विशेष रसायनों पर अत्यधिक निर्भर हैं। इन सामानों का कोई त्वरित या आसान विकल्प उपलब्ध नहीं है। वाणिज्य मंत्रालय का भी यही मानना है कि व्यापार घाटे की मुख्य वजह कच्चे माल, मध्यवर्ती वस्तुओं और पूंजीगत सामान (जैसे ऑटो पार्ट्स, असेंबली उपकरण, मोबाइल घटकों) का आयात है। इन सभी का उपयोग भारत में तैयार उत्पाद बनाने और फिर उन्हें आगे निर्यात करने में होता है।

चीनी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) और कड़े नियम

व्यापार के अलावा अगर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की बात करें, तो अप्रैल 2000 से मार्च 2026 की अवधि के दौरान भारत को चीन से केवल 2.51 अरब डॉलर का एफडीआई प्राप्त हुआ है। भारत ने सीमावर्ती देशों से आने वाले निवेश को लेकर सख्त रुख अपनाया हुआ है। हाल ही में मार्च महीने में भारत सरकार ने उन देशों की कंपनियों के लिए एफडीआई नियमों में ढील दी है जो भारत के साथ जमीनी सीमा साझा नहीं करते हैं, बशर्ते सीमा साझा करने वाले देशों के लाभकारी स्वामियों की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत से कम और गैर-नियंत्रणकारी हो। हालांकि, सरकार ने स्पष्ट किया है कि एफडीआई नियमों में दी गई यह छूट चीन, हांगकांग या भारत के साथ जमीनी सीमा साझा करने वाले किसी भी अन्य देश में पंजीकृत संस्थाओं पर लागू नहीं होगी।

वैश्विक मंच पर ब्रिक्स का बढ़ता प्रभाव

द्विपक्षीय संबंधों के इस आर्थिक परिदृश्य के बीच ब्रिक्स एक बेहद मजबूत वैश्विक समूह के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है। वर्तमान में ब्रिक्स दुनिया की 11 प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं का प्रतिनिधित्व करता है। यह मंच वैश्विक स्तर पर कितना महत्वपूर्ण है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ब्रिक्स देशों की हिस्सेदारी दुनिया की कुल आबादी में लगभग 49.5 प्रतिशत है। इसके अलावा, वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में इस समूह का योगदान करीब 40 प्रतिशत है और यह वैश्विक व्यापार के लगभग 26 प्रतिशत हिस्से को नियंत्रित करता है। ऐसे शक्तिशाली मंच पर भारत और चीन का एक साथ होना वैश्विक अर्थव्यवस्था के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

Ramanuj Singh
रामानुज सिंहauthor

रामानुज सिंह पत्रकारिता में दो दशकों का व्यापक और समृद्ध अनुभव रखते हैं। उन्होंने टीवी और डिजिटल—दोनों ही प्लेटफॉर्म्स पर काम करते हुए बिजनेस, पर्सनल फाइनेंस, शेयर बाजार, इनकम टैक्स, बैंकिंग, बुलियन और कमोडिटी मार्केट जैसे विषयों पर गहरी विशेषज्ञता विकसित की है। जर्नलिज्म में एमए की डिग्री और वर्षों के अनुभव से विकसित विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के साथ, रामानुज जटिल वित्तीय विषयों को सरल, विश्वसनीय और प्रभावी तरीके से पाठकों तक पहुंचाने के लिए जाने जाते हैं। अब तक वे 22,000 से अधिक स्टोरीज लिख चुके हैं।

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