Old Jewellery Tax : घर में रखी पुरानी ज्वेलरी बेचना सिर्फ पैसा पाने का जरिया नहीं है, बल्कि इस पर सरकार को टैक्स भी चुकाना पड़ता है। इसके अलावा, अगर आप किसी बुजुर्ग कल्याण संस्था को दान (डोनेशन) देते हैं, तो उस पर टैक्स छूट पाने के भी खास नियम हैं। आइए, इन दोनों मामलों से जुड़े इनकम टैक्स नियमों को विस्तार और सादगी से समझते हैं।
ज्वेलरी बेचने पर टैक्स का गणित
इनकम टैक्स नियमों के तहत ज्वेलरी को 'कैपिटल एसेट' (पूंजीगत संपत्ति) माना जाता है। इसलिए इसे बेचने से होने वाला कोई भी फायदा 'कैपिटल गेन्स' की कैटेगरी में आता है और उस पर टैक्स लगता है। टैक्स की दर इस बात पर निर्भर करती है कि आपने ज्वेलरी कितने समय तक अपने पास रखी।
- लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स (LTCG): अगर आपने ज्वेलरी को 24 महीने (2 साल) से ज्यादा समय तक रखने के बाद बेचा है, तो इससे होने वाले मुनाफे पर 12.5% की दर से टैक्स लगेगा। अब इसमें इंडेक्सेशन (महंगाई के हिसाब से लागत तय करने) का फायदा नहीं मिलता है।
- शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन्स (STCG): अगर ज्वेलरी 24 महीने या उससे कम समय तक रखने के बाद बेची जाती है, तो उस मुनाफे को आपकी कुल आय में जोड़ दिया जाएगा। इस पर आपके लागू इनकम टैक्स स्लैब रेट के हिसाब से टैक्स लगेगा।
कैपिटल गेन्स की गणना कैसे होती है?
मुनाफे यानी कैपिटल गेन्स का हिसाब लगाने के लिए ज्वेलरी की बिक्री राशि में से उसकी मूल खरीद लागत को घटाया जाता है। अगह आपने कोई ज्वेलरी 2 लाख रुपये में खरीदी थी और उसे 2.50 लाख रुपये में बेचा, तो आपका शुद्ध मुनाफा 50 हजार रुपये हुआ। इसी 50 हजार रुपये पर आपकी अवधि (24 महीने से कम या ज्यादा) के अनुसार टैक्स की गणना होगी।
- विरासत या गिफ्ट में मिली ज्वेलरी: अगर ज्वेलरी आपको माता-पिता या पूर्वजों से विरासत में मिली है, तो उसकी खरीद लागत वही मानी जाएगी जो मूल मालिक ने चुकाई थी।
- 1 अप्रैल 2001 से पहले की ज्वेलरी: अगर ज्वेलरी 1 अप्रैल 2001 से पहले खरीदी गई थी, तो आपके पास 1 अप्रैल 2001 की 'फेयर मार्केट वैल्यू' (उचित बाजार मूल्य) को अपनी खरीद लागत मानने का विकल्प होता है। इसके लिए रजिस्टर्ड वैल्यूअर की रिपोर्ट की आवश्यकता पड़ सकती है।
सीनियर सिटीजन संस्थाओं को डोनेशन पर टैक्स छूट के नियम
अगर आप बुजुर्गों की देखभाल करने वाली किसी चैरिटेबल संस्था को आर्थिक मदद या दान देते हैं, तो केवल संस्था के काम के आधार पर टैक्स छूट नहीं मिलती। इसके लिए संस्था का रजिस्टर्ड नॉन-प्रॉफिट होना और इनकम टैक्स विभाग से आवश्यक अप्रूवल (जैसे 80G सर्टिफिकेट) प्राप्त होना अनिवार्य है।
50% डिडक्शन और 10% लिमिट की शर्त
पात्र चैरिटेबल संस्थाओं को दिए गए दान पर इनकम टैक्स कानून के सेक्शन 80G के तहत 50% तक का टैक्स डिडक्शन मिलता है, लेकिन यह आपकी AGTI (Adjusted Gross Total Income) के 10% की सीमा के अधीन होता है। आपकी AGTI 40 लाख रुपये है, तो उसका 10% यानी 4 लाख रुपये ही दान की अधिकतम योग्य सीमा मानी जाएगी। इस 4 लाख रुपये के डोनेशन पर आपको 50% यानी अधिकतम 2 लाख रुपये की टैक्स छूट (डिक्शन) का फायदा मिल सकता है।
ध्यान रखने योग्य जरूरी बातें
डोनेशन पर टैक्स छूट का यह लाभ केवल पुरानी टैक्स व्यवस्था (Old Tax Regime) का चयन करने पर ही मिलता है। नई टैक्स व्यवस्था (New Tax Regime) में यह छूट उपलब्ध नहीं है। 200 रुपये से अधिक का कैश दान देने पर टैक्स डिडक्शन नहीं मिलता है। इसलिए टैक्स छूट का लाभ उठाने के लिए हमेशा चेक, यूपीआई, नेट बैंकिंग या अन्य ऑनलाइन माध्यमों से ही डोनेशन करें।
