जब भी दुनिया की सबसे बड़ी फास्ट-फूड कंपनियों का नाम लिया जाता है, तो मैकडॉनल्ड्स (McDonald's) का नाम सबसे पहले आता है। हर कोई यही सोचता है कि मैकडॉनल्ड्स दुनिया भर में अपने स्वादिष्ट बर्गर, क्रिस्पी फ्राइज़ और कमाल के शेक्स बेचकर अरबों रुपये की कमाई करता है। लेकिन आपको यह जानकर बेहद हैरानी होगी कि मैकडॉनल्ड्स का असली बिजनेस बर्गर बेचना है ही नहीं। बिजनेस और कॉर्पोरेट जगत के विशेषज्ञ मानते हैं कि मैकडॉनल्ड्स असल में एक फास्ट-फूड कंपनी नहीं, बल्कि दुनिया की सबसे बड़ी और चालाक रियल एस्टेट (Real Estate) कंपनियों में से एक है।
इसके पीछे कंपनी का एक बेहद अनोखा और मास्टरमाइंड 'फ्रैंचाइज़ी मॉडल' (Franchise Model) काम करता है, जिसके जरिए यह कंपनी बर्गर की बिक्री से कई गुना ज्यादा मुनाफा जमीनों और प्रॉपर्टी से कमा लेती है।
किसने की थी मैकडॉनल्ड्स की शुरुआत?
मैकडॉनल्ड्स के इस दिलचस्प बिजनेस मॉडल की नींव इसके पूर्व सीईओ हैरी जे. सोनेबॉर्न ने रखी थी। उन्होंने एक बार बहुत ही मशहूर बात कही थी कि "हम तकनीकी रूप से फूड बिजनेस में नहीं हैं। हम रियल एस्टेट बिजनेस में हैं। हम बर्गर सिर्फ इसलिए बेचते हैं क्योंकि वे हमारी खरीदी हुई जमीनों से किराया वसूलने का सबसे बेहतरीन जरिया हैं।" इस मॉडल के तहत, मैकडॉनल्ड्स जब भी किसी शहर या देश में अपना नया आउटलेट खोलना चाहता है, तो वह सबसे पहले उस शहर की सबसे मुख्य और प्रीमियम लोकेशन (जैसे चौराहे, बड़े मॉल या बिजी मार्केट) पर जमीन या पूरी बिल्डिंग खुद खरीद लेता है या फिर उसे बहुत लंबे समय के लिए लीज (किराए) पर ले लेता है।
रियल एस्टेट से कैसे होती है कमाई?
जमीन का मालिकाना हक अपने हाथ में लेने के बाद शुरू होता है मैकडॉनल्ड्स का असली कमाई का खेल। कंपनी इस चुनिंदा लोकेशन पर अपनी पूरी दुकान (आउटलेट) सेटअप करती है और फिर किसी अन्य व्यक्ति (फ्रैंचाइज़ी ओनर) को इसे चलाने के लिए सौंप देती है। अब जो व्यक्ति मैकडॉनल्ड्स की फ्रैंचाइज़ी लेता है, उसे कंपनी को दो तरह से भुगतान करना पड़ता है। पहला, उसे बर्गर और अन्य सामानों की कुल बिक्री (Sales) का एक निश्चित हिस्सा यानी रॉयल्टी फीस देनी होती है। दूसरा, और जो सबसे बड़ा जरिया है, उसे उस प्रीमियम लोकेशन का एक बहुत मोटा और तय किराया (Rent) हर महीने मैकडॉनल्ड्स कंपनी को चुकाना पड़ता है।
असली कमाई का राज
यह रेंटल इनकम ही मैकडॉनल्ड्स की असली ताकत है। चौंकाने वाली बात यह है कि बाजार के सामान्य नियमों के मुकाबले मैकडॉनल्ड्स अपने फ्रैंचाइज़ी मालिकों से काफी ज्यादा किराया वसूलता है। भले ही किसी महीने आउटलेट पर बर्गर की बिक्री कम हो या ज्यादा, फ्रैंचाइज़ी ओनर को तयशुदा किराया हर हाल में कंपनी को देना ही पड़ता है। इसका मतलब यह हुआ कि बिजनेस में होने वाले उतार-चढ़ाव और घाटे का पूरा जोखिम फ्रैंचाइज़ी चलाने वाले का होता है, जबकि मैकडॉनल्ड्स के पास बिना किसी रिस्क के हर महीने करोड़ों डॉलर का फिक्स्ड रेंट पहुंच जाता है।
समय के साथ जैसे-जैसे दुनिया भर में जमीनों की कीमतें बढ़ती हैं, वैसे-वैसे मैकडॉनल्ड्स की संपत्ति और उसकी रेंटल इनकम भी लगातार बढ़ती जाती है। यही वह अनोखा रेवेन्यू फॉर्मूला है जो मैकडॉनल्ड्स को सिर्फ एक रेस्टोरेंट चेन नहीं, बल्कि रियल एस्टेट का एक वैश्विक बादशाह बनाता है।
