आज के दौर में जब महंगाई लगातार बढ़ रही है, तब हर कोई खरीदारी करते समय थोड़े पैसे बचाने की कोशिश करता है। ऐसे में 'डीमार्ट' (DMart) एक ऐसा नाम बन चुका है, जहां पैर रखते ही ग्राहकों को भारी डिस्काउंट और सस्ते सामान की गारंटी मिलती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जो कंपनी अपने हर प्रोडक्ट पर एमआरपी (MRP) से बहुत कम दाम लगाती है, वह खुद कैसे अरबों रुपये का मुनाफा कमा लेती है? बिजनेस की दुनिया में डीमार्ट की यह सफलता किसी चमत्कार से कम नहीं लगती।
इसके पीछे कोई जादू नहीं, बल्कि इसके फाउंडर राधाकिशन दमानी का एक बेहद सटीक और मजबूत बिजनेस मॉडल है। डीमार्ट की इस 'लो-प्राइस' स्ट्रेटेजी और बंपर प्रॉफिट के पीछे छिपे गुप्त फॉर्मूले को समझना हर उस इंसान के लिए दिलचस्प है जो बिजनेस की बारीकियों को जानना चाहता है।
कैसे सफल है Dmart का बिजनेस?
डीमार्ट के मुनाफे का सबसे पहला और बड़ा राज है उसकी 'लैंड ओनरशिप पॉलिसी' (Land Ownership Policy)। जहां देश-विदेश के बड़े-बड़े रिटेल स्टोर्स मॉल या महंगी जगहों पर भारी-भरकम किराया देकर जगह लीज पर लेते हैं, वहीं डीमार्ट ज्यादातर अपने स्टोर्स की जमीन और बिल्डिंग को खुद खरीदता है। ऐसा करने से कंपनी का हर महीने होने वाला करोड़ों रुपये का किराए का खर्च बच जाता है। रेंटल कॉस्ट न होने की वजह से जो मोटी रकम बचती है, डीमार्ट उसे सीधे अपने ग्राहकों को बड़े डिस्काउंट के रूप में पास-ऑन कर देता है।
इसके अलावा, डीमार्ट के स्टोर्स कभी भी बहुत आलीशान या तड़क-भड़क वाले नहीं होते। वे अपनी इंटीरियर डिजाइनिंग और सजावट को बेहद साधारण रखते हैं, जिससे उनका ऑपरेशनल और मेंटेनेंस खर्च भी न्यूनतम स्तर पर आ जाता है।
वॉल्यूम गेम और सप्लायर्स के साथ डील
इसके मुनाफे की दूसरी सबसे बड़ी ताकत है इसका 'वॉल्यूम गेम' और सप्लायर्स के साथ कड़क डील। डीमार्ट किसी भी सामान को छोटी मात्रा में नहीं, बल्कि सीधे मैन्युफैक्चरर्स (उत्पादकों) से भारी मात्रा (Bulk) में खरीदता है। जब आप इतनी बड़ी क्वांटिटी में खरीदारी करते हैं, तो कंपनियां आपको बहुत ज्यादा मार्जिन और डिस्काउंट देती हैं। इसके साथ ही, डीमार्ट एफएमसीजी (FMCG) सेक्टर के एक बहुत ही महत्वपूर्ण नियम का फायदा उठाता है, जिसे क्रेडिट पीरियड (उधारी की अवधि) कहा जाता है। आमतौर पर अन्य रिटेल चेन सप्लायर्स से सामान लेने के बाद उनका भुगतान करने में 30 से 60 दिनों का समय लेती हैं।
लेकिन डीमार्ट अपने वेंडर्स और सप्लायर्स को महज 7 से 10 दिनों के भीतर या कई बार एडवांस में ही कैश पेमेंट कर देता है। इस क्विक पेमेंट साइकिल के बदले में सप्लायर्स खुशी-खुशी डीमार्ट को अन्य कंपनियों के मुकाबले 2 से 3 फीसदी का एक्स्ट्रा डिस्काउंट देते हैं। यही वजह है कि डीमार्ट को सामान बेहद सस्ता मिलता है और वह उसे आसानी से सस्ते में बेच पाता है।
हाई वॉल्यूम, लो मार्जिन
डीमार्ट का पूरा बिजनेस 'हाई वॉल्यूम, लो मार्जिन' (High Volume, Low Margin) के सिद्धांत पर काम करता है। इसका मतलब है कि कंपनी एक सिंगल प्रोडक्ट पर ज्यादा मुनाफा कमाने के बजाय, बहुत सारा सामान बेचकर थोड़ा-थोड़ा मुनाफा जोड़ती है। उनके स्टोर्स में उन्हीं सामानों को जगह दी जाती है जिनकी रोजमर्रा के जीवन में सबसे ज्यादा जरूरत होती है, जैसे दाल, चावल, तेल, मसाले और टॉयलेट्रीज।
ऐसी चीजों का स्टॉक दुकानों में ज्यादा दिनों तक डंप नहीं रहता और बहुत तेजी से बिकता है (High Inventory Turnover)। सामान जितनी तेजी से बिकेगा, कंपनी के पास कैश का फ्लो उतनी ही तेजी से बढ़ेगा। राधाकिशन दमानी का यह मास्टरस्ट्रोक दिखाता है कि बिना किसी तामझाम और भारी-भरकम विज्ञापनों के भी, सिर्फ ग्राहकों की जेब का ख्याल रखकर और अपने खर्चों को कंट्रोल में रखकर एक बेहद सफल और मुनाफे वाला साम्राज्य खड़ा किया जा सकता है।
