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सोने में बड़ा उछाल अब भूल जाइए! बदल गया तेजी का फॉर्मूला, जानें कब बढ़ेगी कीमत?

सोने की कीमतों में आने वाली तेजी का तरीका अब पहले जैसा नहीं रहा। मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज की रिपोर्ट के मुताबिक, अब सिर्फ दो देशों के बीच युद्ध या तनाव की खबरों से सोने के दाम लगातार नहीं भागेंगे।

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सोने की कीमत

दुनियाभर में सोने की कीमतें साल 2024 और 2025 में तेजी से बढ़ी। इसकी वजह रूस-रूस-यूक्रेन युद्ध, इजरायल-फिलिस्तीन युद्ध और अमेरिका-ईरान रही। इन युद्धों से शेयर बाजारों में अनिश्चितता बनी रही और निवेशकों ने सेफ हेवन के लिए सोने में निवेश बढ़ाया। इसके अलावा दुनियाभर में अनिश्चितता के चलते दुनियाभर के केंद्रीय बैंकों ने रिकॉर्ड खरीदारी की। इन कारणों के चलते दो सालों में सोने की कीमत 30% से 32% बढ़ गई थी। हालांकि, अब ऐसा दौर लौटने की उम्मीद नहीं है। 2026 में ईरान और अमेरिका युद्ध के बावजूद सोने की कीमत गिरी है। मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड (एमओएफएसएल)) की ’एच1 2026 प्रेशियस मेटल्स रिपोर्ट’ के अनुसार, आने वाले दिनों में सोने की कीमतों और भू-राजनीतिक संघर्षों के बीच पारंपरिक संबंध बदल रहा है। भविष्य में सोने की कीमत महंगाई, ब्याज दरें और केंद्रीय बैंकों की मौद्रिक नीति से तय होगी। यानी अगर महंगाई बढ़ेगी और केंद्रीय बैंक अपनी पॉलिसी में बदलाव करेंगे तो ही सोने की कीमत में तेजी देखने को मिलेगी। हालांकि, एकतरफा तेजी लौटने की संभावना बहुत ही कम है।

सोने की कीमत अब परिस्थितियों पर निर्भर हो गया

चालू वर्ष की पहली छमाही में यह स्पष्ट हुआ कि केवल भू-राजनीतिक जोखिम सोने में तेजी बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। निवेशक अब संघर्षों का आकलन इस आधार पर अधिक कर रहे हैं कि उनका महंगाई और ब्याज दरों पर क्या असर पड़ता है। एमओएफएसएल में जिंस शोध प्रमुख नवनीत दमानी ने कहा, "2026 की पहली छमाही ने दिखाया कि युद्ध और सोने के बीच संबंध अब पहले की तुलना में अधिक परिस्थितियों पर निर्भर हो गया है।" उन्होंने कहा कि बाजार अब केवल भू-राजनीतिक घटनाक्रमों पर ध्यान नहीं दे रहा, बल्कि यह देख रहा है कि उनका मुद्रास्फीति, वास्तविक ब्याज दरों और मौद्रिक नीति की अपेक्षाओं पर क्या प्रभाव पड़ता है।

बॉन्ड यील्ड और लंबी ब्याज दरें तेजी में रोड़ा

दमानी ने कहा कि ऊंचे बॉन्ड प्रतिफल (यील्ड) सोने के लिए सबसे बड़ी बाधा बनकर उभरी। इससे सुरक्षित निवेश के रूप में सोने की पारंपरिक मांग पर भी असर पड़ा, जबकि भू-राजनीतिक तनाव ऊंचे स्तर पर बने रहे। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष की शुरुआत में नीतिगत अनिश्चितता, एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ईटीएफ) में निवेश, केंद्रीय बैंकों की खरीदारी और अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में कटौती की उम्मीदों से सोने की कीमतों को मजबूती मिली। रिपोर्ट में कहा गया कि बाद में शुल्क बढ़ने से उत्पादन लागत और मुद्रास्फीति की अपेक्षाएं बढ़ीं। इससे लंबे समय तक ऊंची ब्याज दरें बने रहने की आशंका मजबूत हुई और अमेरिकी ट्रेजरी प्रतिभूतियों की वास्तविक प्रतिफल तथा डॉलर में तेजी आई।

अमेरिका-ईरान तनाव और भविष्य में सोने की चाल का गणित

रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका-ईरान संघर्ष भी इस बदलते रुख का उदाहरण है। संघर्ष बढ़ने पर शुरुआती दौर में सोने की मांग बढ़ी, लेकिन कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से मुद्रास्फीति की चिंता बढ़ी और मौद्रिक नीति में ढील की उम्मीद कमजोर हुई। इससे सोने की तेजी सीमित रही और बाद में कीमतों में सुधार आया।

रिपोर्ट में कहा गया, "शुल्क अब केवल आर्थिक वृद्धि के लिए जोखिम नहीं रह गए हैं, बल्कि वे मुद्रास्फीति बढ़ाने वाली ताकत बन गए हैं।" रिपोर्ट के अनुसार, आगे भी मुद्रास्फीति का रुख, फेडरल रिजर्व के संकेत, वैश्विक नकदी की उपलब्धता, केंद्रीय बैंकों की खरीदारी, ईटीएफ में निवेश और सट्टा निवेश सोने और चांदी की कीमतों के प्रमुख चालक बने रहेंगे।

Alok Kumar
आलोक कुमार author

आलोक कुमार टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में एसोसिएट एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। इलेक्ट्रॉनिक, डिजिटल और प्रिंट मीडिया में 17 वर्षों से अधिक का व्यापक अनुभव रखने वाले आलोक ने अपने पत्रकारिता करियर में कई प्रमुख कॉर्पोरेट इवेंट्स और चर्चित स्टोरीज कवर की हैं। वह बिजनेस, बैंकिंग, शेयर मार्केट और पर्सनल फाइनेंस पर गहरी समझ रखते हैं और जटिल वित्तीय जानकारियों को सरल, स्पष्ट और पाठक-केंद्रित तरीके से प्रस्तुत करने में माहिर हैं। अब तक आलोक ने लगभग 18,000 स्टोरीज लिखी हैं। उनकी लेखन शैली भरोसेमंद, विश्लेषणात्मक और व्यावहारिक जानकारी देने वाली होती है।

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