Times Now Navbharat
live-tv
Premium

Explainer: डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर क्या है? इस पर 3 गुना तेज स्पीड से दौड़ती हैं ट्रेन, क्या हैं फायदे, जानिए सबकुछ

Dedicated Freight Corridor Explained: आप अक्सर डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (DFC) के बारे में सुनते-पढ़ते होंगे। क्या आपने कभी सोचा? यह हमें और देश की अर्थव्यवस्था को कितना और कैसे फायदा पहुंचाता है।

Image
DFC घटाएगा लॉजिस्टिक्स कॉस्ट और बढ़ाएगा निर्यात (तस्वीर-istock/AI)
Authored by: रामानुज सिंह
Updated Sep 26, 2026, 14:57 IST
Follow on Google News

Dedicated Freight Corridor Explained : भारत में जब भी आप ट्रेन से यात्रा करते हैं, तो अक्सर आपने देखा होगा कि आपकी पैसेंजर ट्रेन को किसी स्टेशन या आउटर पर रोक दिया जाता है और बगल से कोई लंबी मालगाड़ी धड़धड़ाती हुई निकल जाती है। इससे यात्रियों की ट्रेन तो लेट होती ही है, साथ ही मालगाड़ी भी बहुत धीमी गति से अपने ठिकाने तक पहुंच पाती है। लेकिन सोचिए, अगर मालगाड़ियों के लिए एक अलग ही 'स्पेशल हाईवे' यानी पटरी बना दी जाए, जिस पर केवल और केवल मालगाड़ियां ही दौड़ें। भारत सरकार का डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (Dedicated Freight Corridor - DFC) बिल्कुल यही काम करता है। आइए समझते हैं कि यह डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर क्या है, यह कितना खास है और यह देश के विकास में कैसे मददगार साबित हो रहा है।

क्या है डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (DFC)?

'डेडिकेटेड' का मतलब होता है 'विशेष रूप से समर्पित' और 'फ्रेट' का अर्थ होता है 'माल या सामान'। यानी डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (DFC) विशेष रूप से मालगाड़ियों के संचालन के लिए बनाई गई ब्रॉड-गेज रेलवे लाइनों का एक अलग नेटवर्क है। साधारण शब्दों में कहें तो यह मालगाड़ियों के लिए बनाया गया एक अलग 'ट्रेन एक्सप्रेसवे' है। पहले जिस पटरी पर पैसेंजर ट्रेनें और सामान ढोने वाली मालगाड़ियां एक साथ चलती थीं, अब DFC बनने से मालगाड़ियों को अपना अलग रास्ता मिल गया है। इससे आम यात्रियों की ट्रेनें भी समय पर चल पाती हैं और मालगाड़ियां भी बिना किसी रुकावट के तेज गति से सामान पहुंचा पाती हैं।

कितनी स्पीड से दौड़ती हैं DFC पर मालगाड़ियां?

पुरानी और आम रेल पटरियों पर मालगाड़ियों की औसतन स्पीड बहुत कम होती है। करीब 25 किलोमीटर प्रति घंटा। इतनी धीमी गति के कारण सामान को एक शहर से दूसरे शहर पहुंचाने में कई दिन लग जाते थे। लेकिन DFC के नए और आधुनिक ट्रैक पर मालगाड़ियां 100 किलोमीटर प्रति घंटा की अधिकतम रफ्तार से दौड़ सकती हैं। वहीं अगर इनकी औसत स्पीड की बात करें, तो यह 70 से 75 किलोमीटर प्रति घंटा रहती है। यानी पुरानी रफ्तार के मुकाबले DFC पर मालगाड़ियां करीब तीन गुना तेजी से चलती हैं। इससे जो सामान पहले 3-4 दिन में पहुंचता था, वह अब महज 24 से 36 घंटे में पहुंच जाता है।

DFC को कौन चलाता है?

इस पूरे विशाल नेटवर्क को बनाने, चलाने और इसकी देखरेख करने की जिम्मेदारी DFCCIL (Dedicated Freight Corridor Corporation of India Limited) नाम की संस्था की है। यह संस्था भारत सरकार के रेल मंत्रालय के अंतर्गत काम करने वाला एक सार्वजनिक उपक्रम (Public Sector Undertaking) है। इसकी स्थापना कंपनी अधिनियम, 1956 के तहत एक विशेष कंपनी के रूप में की गई है। इसका मुख्य काम देश भर में हाई-स्पीड माल परिवहन की योजना बनाना, उसे बनाना और उसका रखरखाव करना है।

भारत में कहां-कहां बने हैं ये कॉरिडोर?

भारत में मुख्य रूप से 2,843 किलोमीटर लंबा पूर्ण नेटवर्क दो बड़े हिस्सों (कॉरिडोर) में बंटा हुआ है:-

वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (WDFC)

यह कॉरिडोर देश के पश्चिमी हिस्से को जोड़ता है। इसकी कुल लंबाई 1,506 किलोमीटर है। यह उत्तर प्रदेश के दादरी से शुरू होकर महाराष्ट्र में मुंबई स्थित जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट (JNPT) तक जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य उत्तर भारत के कारखानों और बाजारों को सीधे समुद्र तट और बंदरगाहों से जोड़ना है।

ईस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (EDFC)

यह कॉरिडोर देश के पूर्वी और उत्तरी हिस्से को जोड़ता है। इसकी निर्मित लंबाई 1,337 किलोमीटर है। यह पंजाब के लुधियाना से शुरू होकर बिहार के सोननगर तक जाता है। मूल योजना के तहत सोननगर से आगे पश्चिम बंगाल के दानकुनी तक 519 किलोमीटर का एक और खंड प्रस्तावित है, जिसे भविष्य में सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल के तहत बनाया जाएगा।

अब 25 नहीं 75 की रफ्तार से दौड़ेंगी मालगाड़ियां (तस्वीर-istock)

अब 25 नहीं 75 की रफ्तार से दौड़ेंगी मालगाड़ियां (तस्वीर-istock)

भविष्य के लिए प्रस्तावित नए कॉरिडोर

पूर्वी और पश्चिमी कॉरिडोर की सफलता को देखते हुए सरकार ने देश के अन्य हिस्सों को जोड़ने के लिए तीन नए कॉरिडोर की योजना भी बनाई है:-

  • ईस्ट-वेस्ट कॉरिडोर:- यह पश्चिम बंगाल के दानकुनी से शुरू होकर गुजरात/महाराष्ट्र के सूरत या पालघर तक जाएगा। यह पूर्व के कोयला और खनिज क्षेत्रों को पश्चिम के बंदरगाहों से जोड़ेगा।
  • ईस्ट कोस्ट कॉरिडोर:- यह पश्चिम बंगाल के खड़गपुर से आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा तक समुद्र तटीय इलाके में बनेगा।
  • नॉर्थ-साउथ कॉरिडोर:- यह मध्य प्रदेश के इटारसी से शुरू होकर नागपुर होते हुए आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा तक जाएगा।

देश की अन्य बड़ी योजनाओं से कैसे जुड़ा है DFC?

डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर भारत सरकार की कई बड़ी और महत्वपूर्ण नीतियों की रीढ़ की हड्डी की तरह काम करता है:-

  • PM गतिशक्ति योजना:- यह एक ऐसा डिजिटल प्लेटफॉर्म है जो देश के सभी परिवहन साधनों को एक साथ जोड़ता है। DFC इस योजना का मुख्य हिस्सा है, जो बंदरगाहों, औद्योगिक पार्कों और फैक्ट्रियों को आपस में जोड़ता है।
  • राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स नीति (NLP) 2022:- भारत में किसी सामान को एक जगह से दूसरी जगह भेजने की लागत (लॉजिस्टिक्स कॉस्ट) बहुत ज्यादा है। इस नीति का उद्देश्य वर्ष 2030 तक लॉजिस्टिक्स लागत को कम करके 8–9% तक लाना है, जिसमें DFC बहुत बड़ी भूमिका निभा रहा है।
  • सागरमाला परियोजना:- बंदरगाहों तक माल तेजी से पहुंचाने के लिए DFC को समुद्री तटों और बंदरगाहों से सीधे जोड़ा गया है।
  • राष्ट्रीय रेल योजना 2030:- इस योजना का लक्ष्य है कि वर्ष 2030 तक देश के कुल माल परिवहन में रेलवे की हिस्सेदारी को 27% से बढ़ाकर 45% किया जाए।

भारतीय अर्थव्यवस्था और आम लोगों के लिए क्यों खास है DFC?

DFC सिर्फ ट्रेन चलाने का रास्ता नहीं है, यह देश की अर्थव्यवस्था को नई ताकत दे रहा है। इसके कई बड़े फायदे हैं:-

सामान की ढुलाई सस्ती और तेज होना

DFC के ट्रैक इतने मजबूत बनाए गए हैं कि इन पर डबल-स्टैक कंटेनर (एक के ऊपर एक रखे गए दो कंटेनर) आसानी से चल सकते हैं। साथ ही ये ट्रेनें 25 टन तक का भारी वजन (एक्सल लोड) उठा सकती हैं। एक ही बार में ज्यादा सामान जाने से माल ढुलाई का खर्च बहुत कम हो जाता है।

सामान्य पटरियों पर भीड़ कम होना

जब 70% भारी मालगाड़ियां DFC के अलग ट्रैक पर चली जाती हैं, तो पुरानी रेल पटरियां खाली हो जाती हैं। इसका फायदा यह होता है कि आपकी और हमारी यात्री ट्रेनें (जैसे वंदे भारत, राजधानी) बिना किसी रुकावट के समय पर और तेज गति से चल पाती हैं।

नए उद्योगों और रोजगार का विकास

DFC जिन रास्तों से होकर गुजरता है, उनके आसपास बड़े-बड़े औद्योगिक शहर, टेक्सटाइल पार्क और गोदाम (MMLP) बनाए जा रहे हैं। इससे नए कारखाने खुल रहे हैं और लाखों युवाओं को रोजगार के नए अवसर मिल रहे हैं।

पर्यावरण की सुरक्षा (कम प्रदूषण)

DFC के सभी रूट पूरी तरह से बिजली (इलेक्ट्रिक) से चलते हैं। जब सामान ट्रकों के बजाय इन इलेक्ट्रिक मालगाड़ियों से जाता है, तो डीजल की खपत घटती है। अनुमान है कि अगले 30 सालों में इससे 450 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन रुकेगा, जिससे हवा साफ रहेगी।

विदेशों में भारतीय सामान की मांग बढ़ना

जब उत्तर भारत के कारखानों में बना सामान DFC के जरिए महज कुछ घंटों में मुंबई के बंदरगाहों तक पहुंच जाता है, तो विदेशों में सामान सही समय पर पहुंचता है। इससे भारतीय व्यापारियों का विदेशों में व्यापार बढ़ता है।

DFC के रास्ते में क्या हैं प्रमुख चुनौतियां?

इतनी बड़ी परियोजना को चलाने में कुछ व्यावहारिक दिक्कतें भी आती हैं:-

  • पुराने नेटवर्क से जुड़ने पर जाम (चोक पॉइंट):- DFC की मालगाड़ियां जब अपने अलग ट्रैक से निकलकर आम रेलवे नेटवर्क (HDN) पर प्रवेश करती हैं, तो वहां पहले से ही बहुत भीड़ होती है। इससे मालगाड़ियों को फिर से रुकना पड़ता है।
  • आखरी छोर तक कनेक्टिविटी की कमी:- DFC का मेन ट्रैक तो बन गया है, लेकिन कई फैक्ट्रियों या गोदामों से इस ट्रैक तक सामान पहुंचाने वाली छोटी सड़कें या लोकल रेल लाइनें अभी भी कमजोर हैं।
  • एक तरफा माल की समस्या:- अक्सर ट्रेनें उत्तर भारत से सामान भरकर बंदरगाहों की तरफ जाती हैं, लेकिन लौटते समय उन्हें उतना सामान नहीं मिलता और डिब्बे खाली वापस आते हैं। इससे रेलवे को नुकसान होता है।
  • जमीन अधिग्रहण और भारी लागत:- इतनी लंबी पटरी बिछाने के लिए जमीन का अधिग्रहण करना, कानूनी अड़चनें और परियोजना की लागत बढ़ना भी एक बड़ी चुनौती रही है।

क्या कदम उठाए जाने चाहिए?

DFC को पूरी तरह सफल बनाने के लिए कुछ महत्वपूर्ण सुधार जरूरी हैं:-

  • भीड़भाड़ वाले रास्तों को चौड़ा करना:- जहां DFC आम रेलवे ट्रैक से मिलता है, वहां अतिरिक्त पटरियां (Quadrupling) बिछाई जाएं ताकि ट्रेनों को रुकना न पड़े।
  • लास्ट-माइल कनेक्टिविटी मजबूत करना:- पीएम गतिशक्ति के जरिए DFC के स्टेशनों को सीधे औद्योगिक पार्कों, खेतों और फैक्ट्रियों से बेहतर सड़कों और रेल लाइनों से जोड़ा जाए।
  • डिजिटल ट्रैकिंग (IoT व RFID):- हर कंटेनर पर डिजिटल सेंसर लगाए जाएं ताकि व्यापारी अपने मोबाइल पर ही देख सकें कि उनका सामान इस समय कहां पहुंचा है।
  • Ro-Ro (रो-रो) सेवा को बढ़ावा देना:- 'रोल-ऑन/रोल-ऑफ' सेवा के तहत पूरे के पूरे ट्रकों को मालगाड़ी के ऊपर लादकर ले जाया जाता है। इससे हाईवे पर ट्रैफिक कम होगा और लौटती हुई ट्रेनों को भी माल मिल सकेगा।
  • प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP):- नए टर्मिनल और गोदाम बनाने के लिए निजी कंपनियों को साथ जोड़ा जाए ताकि सरकार पर पूरा आर्थिक बोझ न पड़े।

डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (DFC) आधुनिक भारत की प्रगति का एक ऐसा 'आयरन हाईवे' है जो देश के व्यापार और परिवहन की तस्वीर बदल रहा है। यह केवल मालगाड़ियों को तेज रफ्तार नहीं दे रहा, बल्कि आम यात्रियों के सफर को आसान बना रहा है, पर्यावरण को बचा रहा है और भारत को दुनिया के सामने एक मजबूत आर्थिक शक्ति के रूप में खड़ा कर रहा है।

End of Article