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यहां पितृपक्ष में सजती है गोबर से दीवार, कुंवारी लड़कियां गाती हैं खास गीत, सदियों पुरानी है परंपरा

संज्या की परंपरा भाद्रपद पूर्णिमा से शुरू होकर पितृपक्ष के दौरान करीब 16 दिनों तक चलती है। इस दौरान कुंवारी लड़कियां घर की दीवार पर गोबर से संज्या की आकृतियां बनाती हैं।

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क्या होती है संज्या और क्या है इसका पितृपक्ष से संबंध (AI generated and newsroom verified image)

पितृपक्ष शुरू हो चुके हैं। इन दिनों लोग श्राद्ध, तर्पण और पितरों को याद करते हैं। देश के कई अलग-अलग हिस्सों में पितृपक्ष पर अलग तरह की मान्यताएं भी हैं। मध्य प्रदेश के मालवा और निमाड़ इलाके में पितृपक्ष की कुछ शामें एक अलग ही रंग लेकर आती हैं। शाम होते ही घरों के आंगन और दीवारों के पास कुंवारी लड़कियां जुटती हैं। गोबर से लिपे दीवार पर खास आकृतियां बनाई जाती हैं। उसे फूल-पत्तियों से सजाया जाता है। फिर शुरू होता है एक खास तरह के लोकगीतों का सिलसिला। इन गीतों को कहा जाता है संज्या गीत।

इन संज्या लोकगीतों में स्थानीय लोककला, प्रकृति है के साथ ही कुंवारी लड़कियों की हंसी, मायके और ससुराल की कहानी के साथ ही उसके मन में आने वाले जीवन को लेकर पल रहे सपने भी होते हैं। पितृपक्ष के दौरान मनाई जाने वाली यह परंपरा मालवा-निमाड़ के अलावा राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र के कुछ इलाकों तक भी दिखाई देती है।

पितृपक्ष में आखिर संज्या क्यों?

संज्या की परंपरा भाद्रपद पूर्णिमा से शुरू होकर पितृपक्ष के दौरान करीब 16 दिनों तक चलती है। इस दौरान कुंवारी लड़कियां घर की दीवार पर गोबर से संज्या की आकृतियां बनाती हैं। फिर उन्हें फूल, पत्तियों और दूसरी प्राकृतिक चीजों से सजाया जाता है। हर दिन आकृति का रूप बदला जाता है। शाम को लड़कियां उसके सामने इकट्ठा होकर गीत गाती हैं।

वहां की पुरानी लोकमान्यता में संज्या को एक देवी स्वरूप माना गया है। कई जगह इसे देवी पार्वती से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि इन दिनों संज्या अपने मायके आती हैं और अपनी सहेलियों के साथ समय बिताती हैं। कुंवारी लड़कियां भी उन्हें अपनी सहेली की तरह मानकर गीत गाती हैं। इन गीतों में कहीं उनसे मजाक होता है, कहीं उनकी शादी की बात होती है तो कहीं अच्छे वर की इच्छा।

दीवार बन जाती है लड़कियों की अपनी दुनिया

संज्या की एक खास बात यह है कि इसमें दीवार को एक तरह के कैनवास मान लिया जाता है। इस दीवार को पहले गोबर से लीपा जाता है। फिर उसपर तरह तरह के चित्र उकेरे जाते हैं। इन आकृतियों को फूल, पत्तियों और रंगीन चीजों से सजाया जाता है। ये सजावट हर दिन बदलती है।

मजेदार बात ये है कि सजावट के साथ गीत भी बदलते हैं। इन गीतों में कभी किसी बेटी की कहानी गाई जाती है तो कभी किसी मां की तो कभी किसी नई नवेली दुल्हन की। ये गीत स्थानीय बोलचाल की आसान भाषा में होते हैं। ऐसा ही एक गीत है जिसमें में संज्या के ससुराल जाने का को कुछ यूं बयां किया गया है:

छोटी-सी गाड़ी लुढ़कती जाय,

जिसमें बैठी संज्या बाई सासरे जाय।

घाघरो चमकाती जाय,

लूगड़ो लटकाती जाय,

बिछिया बजाती जाय।

इसका मतलब है कि एक छोटी-सी गाड़ी आगे बढ़ रही है। उसमें संज्या बाई बैठी हैं और वह ससुराल जा रही हैं। घाघरा चमक रहा है, ओढ़नी लटक रही है और पैरों की बिछिया बज रही है। इस साधारण से गीत में लड़की की विदाई, सजना-संवरना और नए जीवन में जाने की पूरी तस्वीर दिखाई देती है। संज्या के गीतों में हंसी-मजाक भी खूब है। एक गीत में संजा बाई अपने पति से शिकायत करती हैं कि वह उनके लिए अच्छी किनारी वाली ओढ़नी क्यों नहीं लाए-

संजा बाई का लाड़ाजी,

लूगड़ो लाया जाड़ाजी।

असो कई लाया दारिका,

लाता गोट किनारी का।

यहां लड़की अपने पति से मन की बात कह रही है। उसे कपड़ा पसंद नहीं आया तो वह शिकायत भी कर रही है। आप समझ पा रहे होंगे कि इन गीतों में घरेलू जिंदगी, कपड़े, रिश्ते, पसंद-नापसंद और स्त्री की छोटी-छोटी इच्छाएं भी दर्ज हैं।

सदियों से चली आ रही है संज्या गीतों की परंपरा (AI Generated and newsroom verified image)

सदियों से चली आ रही है संज्या गीतों की परंपरा (AI Generated and newsroom verified image)

अच्छे वर की इच्छा से जुड़ी है परंपरा

संज्या के साथ एक और महत्वपूर्ण मान्यता जुड़ी है। कुंवारी लड़कियां संज्या के गीत गाते हुए अच्छे वर और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करती हैं। गीतों में लड़की की अपनी कल्पना भी है। वह कैसा जीवन चाहती है, ससुराल कैसा हो, पति कैसा व्यवहार करे, कपड़े कैसे हों, सहेलियों के साथ कैसा रिश्ता रहे..इन सबकी झलक इन लोकगीतों में मिलती है।

सोलह शामें, सोलह रंग

संज्या की परंपरा में 16 दिनों का खास महत्व माना जाता है। इन दिनों में रोज शाम लड़कियों का जुटना उनके सामाजिक जीवन का भी हिस्सा बन जाता है। वे साथ मिलकर आकृतियां बनाती हैं, उन्हें सजाती हैं, गीत याद करती हैं और सामूहिक रूप से गाती हैं।

पुराने समय में जब मनोरंजन के साधन बहुत सीमित थे, ऐसे लोकपर्व लड़कियों को अपनी सहेलियों के साथ मिलने का एक खास मौका देते थे। गीत पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाए जाते थे। एक लड़की अपनी मां, दादी या बड़ी बहन से गीत सीखती थी और फिर वही गीत अगली पीढ़ी तक पहुंचता था।

संज्या में इस्तेमाल होने वाली चीजें भी इस परंपरा को खास बनाती हैं। गोबर, फूल, पत्तियां और आसपास मिलने वाली दूसरी प्राकृतिक सामग्री से आकृतियां तैयार की जाती हैं। यानी लोककला सीधे प्रकृति से सामग्री लेती है और उसी प्रकृति को फिर दीवार पर एक नए रूप में उतार देती है।

समय के साथ बदलते संज्या गीत

तमाम लोककलाओं की तरह संज्या भी आधुनिकता से अछूती नहीं है। गांवों का शहरों में बदलना, बदलती जीवनशैली और लोगों के गांव छोड़ने ने इसे भी बुरी तरह प्रभावित किया है। हालांकि अब भी कई इलाकों में ये पूरी तरह से खोई नहीं है। ऐसी जगह पर ये आज भी मालवा की बेटियों की आवाज है। इसमें उनकी हंसी है, शादी के सपने हैं, ससुराल को लेकर उत्सुकता है, मायके का अपनापन है और प्रकृति के साथ उनका रिश्ता है।

Suneet Singh
सुनीत सिंहauthor

सुनीत सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में कार्यरत हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन में स्पेशल स्टोरीज प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहे हैं। टीवी और डिजिटल पत्रकारिता में 13 वर्षों के अनुभव के साथ, सुनीत उन बहुमुखी पत्रकारों में शामिल हैं जिन्होंने न्यूजरूम और फील्ड—दोनों मोर्चों पर खुद को साबित किया है। माइक, कैमरा और एडिटिंग डेस्क तीनों से उनकी सहज जुगलबंदी ने उन्हें एक संतुलित और विश्वसनीय मीडिया प्रोफेशनल के रूप में स्थापित किया है। पिछले 10 वर्षों से सुनीत लाइफस्टाइल, लिटरेचर, सिनेमा और संस्कृति से जुड़ी गहन व विश्लेषणात्मक स्टोरीज लिखते रहे हैं और अबतक 12,000 से अधिक आर्टिकल पब्लिश कर चुके हैं। उनकी लेखन शैली गहराई, मौलिक दृष्टिकोण और रिसर्च-आधारित प्रस्तुति से पहचानी जाती है। वे विषयों की बारीकियों को पकड़कर उन्हें सरल, प्रभावी और पाठकों से जुड़ने वाली भाषा में ढालने में दक्ष हैं।

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