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कच्चे तेल पर आ गई सबसे बड़ी खबर! कीमतों में भारी गिरावट! 6 हफ्ते के सबसे निचले स्तर पर पहुंचा क्रूड ऑयल

अमेरिका और ईरान के बीच समझौते की उम्मीद बढ़ने से कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी नरमी आई है, जिससे ब्रेंट क्रूड फिसलकर 91 डॉलर प्रति बैरल तक आ गया है।

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crude oil prices

अंतरराष्ट्रीय कमोडिटी मार्केट और वैश्विक अर्थव्यवस्था से आज एक बहुत बड़ी और राहत भरी खबर सामने आ रही है। पिछले काफी समय से कच्चे तेल की कीमतों में आग लगने के बाद अब ग्लोबल बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में एक बहुत बड़ी और अचानक गिरावट दर्ज की गई है। लगातार हो रही बिकवाली के कारण कच्चे तेल का भाव लुढ़ककर पिछले 6 हफ्तों के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। ब्रेंट क्रूड और डब्ल्यूटीआई (WTI) दोनों ही प्रमुख बेंचमार्क में आज भारी नरमी देखी जा रही है। ब्रेंट क्रूड ऑयल (Brent Crude Oil) 6 महीने के निचले स्तर पर गिरकर 91.12 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया है. तेल के बाजार में आई इस अचानक गिरावट ने दुनिया भर के आर्थिक विश्लेषकों और निवेशकों का ध्यान अपनी ओर खींचा है।

अमेरिका और ईरान के बीच डील और शांति की संभावना से कच्चे तेल की कीमतों में लगातार गिरावट आ रही है, जिससे क्रूड का दाम 100 डॉलर प्रति बैरल के नीचे बना हुआ है। शनिवार सुबह ब्रेंट क्रूड और गिरकर 91 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया, जबकि WTI क्रूड भी कमजोरी के साथ 87 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया है। तेल की सप्लाई बहाल होने की उम्मीद में आ रही इस गिरावट से आने वाले समय में आम आदमी को पेट्रोल-डीजल के दामों में बड़ी राहत मिलने की उम्मीद जताई जा सकती है।

आम तौर पर कच्चे तेल की कीमतों का सीधा असर किसी भी देश की अर्थव्यवस्था, महंगाई और आम जनता की जेब पर पड़ता है। भारत जैसे बड़े देश के लिए, जो अपनी जरूरत का लगभग 80 से 85 फीसदी कच्चा तेल विदेशों से आयात (Import) करता है, क्रूड ऑयल का सस्ता होना एक बेहद सकारात्मक संकेत माना जाता है। इस गिरावट के बाद अब बाजार में इस बात की चर्चा तेज हो गई है कि आखिर वैश्विक स्तर पर ऐसा क्या बड़ा बदलाव हुआ है, जिसने तेल के दामों को इतनी तेजी से नीचे धकेल दिया।

अमेरिका-ईरान के बीच समझौता है बड़ी वजह

इस बड़ी गिरावट के पीछे सबसे मुख्य और बड़ा कारण वैश्विक राजनीति (Global Politics) में आ रहा एक संभावित सकारात्मक मोड़ है। बाजार के बड़े-बड़े ट्रेडर्स और निवेशकों को यह पूरी उम्मीद है कि जल्द ही अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा पुराना तनाव खत्म हो सकता है और दोनों देशों के बीच एक शांति समझौता (US-Iran Truce) हो सकता है। पिछले लंबे समय से मिडल ईस्ट (मध्य पूर्व) में चल रहे युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव के कारण कच्चे तेल की सप्लाई बाधित होने का डर बना हुआ था, जिससे कीमतें लगातार बढ़ रही थीं।

लेकिन अब अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत और संभावित समझौते की सुगबुगाहट ने बाजार का मूड पूरी तरह बदल दिया है। ट्रेडर्स को लग रहा है कि अगर दोनों देशों के बीच समझौता हो जाता है, तो ईरान पर लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों में ढील मिल सकती है। ऐसा होने से ईरान से होने वाली कच्चे तेल की सप्लाई वैश्विक बाजार में काफी बढ़ जाएगी, जिससे बाजार में तेल की कोई कमी नहीं रहेगी। जब भी बाजार में किसी चीज की सप्लाई बढ़ने की उम्मीद होती है, तो उसके दाम अपने आप गिरने लगते हैं।

भारत पर क्या होगा असर?

इस बड़ी गिरावट का असर आने वाले समय में वैश्विक बाजार के साथ-साथ भारतीय बाजार पर भी देखने को मिल सकता है। अगर कच्चे तेल की कीमतें इसी तरह निचले स्तरों पर बनी रहती हैं, तो भारत सरकार और घरेलू तेल कंपनियों (जैसे IOCL, BPCL, HPCL) का इम्पोर्ट बिल काफी कम हो जाएगा। इससे देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम होगा और घरेलू स्तर पर महंगाई को काबू में करने में बड़ी मदद मिलेगी। हालांकि, आम जनता के लिए पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कटौती होगी या नहीं, यह पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करेगा कि तेल कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाजार की इस गिरावट का फायदा ग्राहकों तक कितनी जल्दी पहुंचाती हैं। संक्षेप में कहें तो, अमेरिका और ईरान के बीच शांति की उम्मीद ने कच्चे तेल के बाजार को बड़ा झटका दिया है, जो आने वाले दिनों में वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक अच्छा संकेत साबित हो सकता है।

Richa Tripathi
रिचा त्रिपाठीauthor

रिचा त्रिपाठी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में बिजनेस डेस्क पर सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। मीडिया इंडस्ट्री में 7 वर्षों के अनुभव के साथ रिचा, पर्सनल फाइनेंस, स्टॉक मार्केट, टैक्स प्लानिंग और अर्थव्यवस्था से जुड़े विषयों पर मजबूत पकड़ रखती हैं। अब तक 8,000 से अधिक कंटेंट लिख चुकी रिचा की विशेषता है—जटिल वित्तीय जानकारियों को सरल, स्पष्ट और भरोसेमंद तरीके से पाठकों तक पहुंचाना। वह ऐसी स्टोरीज तैयार करती हैं जो न केवल जानकारीपूर्ण होती हैं, बल्कि आम पाठक की वित्तीय समझ को बेहतर बनाने में भी मदद करती हैं।

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