मिडिल ईस्ट में छिड़ी जंग की वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों ने एक बार फिर दुनिया भर की सरकारों की नींद उड़ा दी है। ताजा रिपोर्टों के अनुसार, एशियाई बाजारों में कारोबार के दौरान कच्चे तेल की कीमतों में जबरदस्त उछाल देखा गया है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि अमेरिका और अन्य प्रमुख देशों द्वारा अपने 'इमरजेंसी ऑयल रिजर्व' (Emergency Petroleum Reserves) से लाखों बैरल तेल बाजार में छोड़ने के फैसले के बावजूद, कीमतों में कोई खास गिरावट नहीं आई है। आमतौर पर जब सप्लाई बढ़ाई जाती है, तो कीमतें कम होती हैं, लेकिन इस बार बाजार पर युद्ध के बादलों और सप्लाई चेन की बाधाओं का असर इतना गहरा है कि सरकार के ये सारे प्रयास बेअसर साबित हो रहे हैं।
कितना है कच्चे तेल का भाव?
WTI कच्चे तेल की कीमत 93.13 USD प्रति बैरल दर्ज की गई है। इसमें 5.88 डॉलर यानी करीब 6.68% की जबरदस्त बढ़त देखी गई है। यह कॉन्ट्रैक्ट अप्रैल 2026 की अवधि के लिए है। अंतरराष्ट्रीय मानक माना जाने वाला ब्रेंट क्रूड 98.13 USD प्रति बैरल पर पहुंच गया है। इसकी कीमत में भी 6.15 डॉलर का उछाल आया है, जो प्रतिशत के हिसाब से 6.69% की वृद्धि दिखाता है। यह डेटा मई 2026 के कॉन्ट्रैक्ट के लिए है।क्यों बढ़ रही हैं कीमतें?
इस तेजी के पीछे सबसे बड़ा कारण मिडिल-ईस्ट (Middle East) में बढ़ता तनाव और लाल सागर (Red Sea) में जहाजों पर होने वाले हमले हैं। जब दुनिया के प्रमुख तेल उत्पादक क्षेत्रों में युद्ध जैसी स्थिति बनती है, तो निवेशकों में डर पैदा हो जाता है। इसी डर के कारण सट्टेबाज और बड़े ट्रेडर्स भारी मात्रा में तेल खरीदना शुरू कर देते हैं, जिससे कीमतें आसमान छूने लगती हैं। वर्तमान में ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) की कीमतें $119 प्रति बैरल के खतरनाक स्तर के पास मंडरा रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इमरजेंसी रिजर्व से तेल रिलीज करना केवल एक 'बैंड-एड' लगाने जैसा है, जबकि बाजार को एक स्थायी समाधान और शांति की जरूरत है।
भारत के लिए झटका
भारत जैसे देशों के लिए यह खबर किसी बड़े झटके से कम नहीं है। हम अपनी तेल जरूरतों का 85% से अधिक हिस्सा विदेशों से आयात करते हैं। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल महंगा होता है, तो देश का आयात बिल (Import Bill) तेजी से बढ़ता है। इससे न केवल विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ता है, बल्कि घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ने का खतरा भी पैदा हो जाता है। हालांकि, सरकार ने फिलहाल रिटेल कीमतों में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया है, लेकिन यदि कच्चा तेल लंबे समय तक $115 के ऊपर बना रहता है, तो तेल कंपनियों (IOCL, BPCL, HPCL) का घाटा इतना बढ़ जाएगा कि कीमतों में बढ़ोतरी करना उनकी मजबूरी बन जाएगी।
इन चीजों पर भी पड़ेगा असर
इस संकट का असर केवल ईंधन तक ही सीमित नहीं रहता। कच्चे तेल का इस्तेमाल प्लास्टिक, खाद, पेंट और दवाइयों जैसे कई उद्योगों में कच्चे माल के रूप में होता है। तेल महंगा होने का मतलब है कि माल ढुलाई (Logistics) महंगी हो जाएगी, जिससे फल, सब्जियां और अन्य जरूरी सामानों के दाम भी बढ़ जाएंगे। यानी, कच्चे तेल की यह 'आग' सीधे तौर पर आम आदमी की रसोई के बजट को बिगाड़ने की ताकत रखती है। 12 मार्च 2026 के ताजा रेट्स के अनुसार, तेल की कीमतों में राहत के फिलहाल कोई आसार नहीं दिख रहे हैं, क्योंकि ओपेक (OPEC) देशों ने भी उत्पादन बढ़ाने से इनकार कर दिया है।
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