Oil Prices : हाल ही में अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। ब्रेंट क्रूड की कीमतें पहले तेजी से बढ़ीं और फिर अचानक गिर गईं। इस गिरावट से ऐसा लग सकता है कि तेल संकट (Oil crisis) खत्म हो गया है, लेकिन एक्सपर्ट्स का मानना है कि असल स्थिति अभी भी पूरी तरह सामान्य नहीं हुई है। अस्थिरता के पीछे भू-राजनीतिक तनाव, सप्लाई चेन की दिक्कतें और मांग-आपूर्ति का असंतुलन अभी भी मौजूद है।
कीमतें पहले क्यों बढ़ीं और फिर क्यों गिरीं?
तेल की हालिया तेजी का मुख्य कारण असली कमी नहीं, बल्कि डर था। जब होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में तनाव बढ़ा, तो बाजार में यह आशंका फैल गई कि दुनिया की बड़ी तेल सप्लाई रुक सकती है। यह समुद्री रास्ता वैश्विक तेल व्यापार का बेहद महत्वपूर्ण मार्ग है, जिससे प्रतिदिन करोड़ों बैरल तेल और गैस गुजरती है। इस तनाव के दौरान आशंका थी कि ईरान और अमेरिका के बीच टकराव बढ़ सकता है और यह रास्ता लंबे समय तक बंद रह सकता है। इसी डर के कारण ब्रेंट क्रूड की कीमतें करीब $150 प्रति बैरल तक पहुंचने की आशंका जताई जाने लगी थी। लेकिन जैसे ही 17 जून को अमेरिका और ईरान के बीच एक समझौता (MoU) हुआ, बाजार की चिंता कम हो गई। निवेशकों ने मान लिया कि सप्लाई धीरे-धीरे फिर से सामान्य हो जाएगी और कीमतें तेजी से नीचे आ गईं।
क्या तेल संकट सच में खत्म हो गया है?
एक्सपर्ट्स के अनुसार, संकट पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, बल्कि केवल उसका “डर वाला हिस्सा” कम हुआ है। वास्तविक सप्लाई अभी भी पूरी तरह सामान्य नहीं हुई है। कई शिपमेंट और उत्पादन प्रभावित क्षेत्रों से धीरे-धीरे वापस आ रहे हैं। ऊर्जा एक्सपर्ट्स के अनुमान के अनुसार, अगर हालात स्थिर रहते हैं तो करीब 70% बाधित उत्पादन तीन महीने में वापस आ सकता है, जबकि 90% उत्पादन छह महीने में सामान्य हो सकता है। इसका मतलब है कि बाजार में सुधार हो रहा है, लेकिन पूरी रिकवरी अभी बाकी है।
होर्मुज जलमार्ग अभी भी क्यों अहम है?
हालांकि तेल और गैस की आवाजाही फिर से शुरू हो गई है, लेकिन स्थिति पूरी तरह भरोसेमंद नहीं मानी जा रही। शिपिंग कंपनियां अभी भी सतर्क हैं और बीमा कंपनियां ज्यादा प्रीमियम वसूल रही हैं। होर्मुज जलमार्ग दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग है। यहां से बड़ी मात्रा में तेल और एलएनजी (LNG) का व्यापार होता है। हालिया तनाव के बाद भी कंपनियां यह सुनिश्चित नहीं हैं कि यह रास्ता लंबे समय तक पूरी तरह सुरक्षित रहेगा या नहीं। इसी कारण से बाजार में स्थिरता धीरे-धीरे लौट रही है, लेकिन पूरी तरह विश्वास बनने में समय लगेगा।
तेल भंडार और रिफाइनिंग मार्जिन का क्या संकेत है?
संकट के दौरान कई देशों ने अपने रणनीतिक तेल भंडार (strategic reserves) का इस्तेमाल किया था। अब इन भंडारों को दोबारा भरने की जरुरत है, जिससे अतिरिक्त मांग पैदा हो रही है। दूसरी तरफ, रिफाइनिंग मार्जिन अभी भी सामान्य से ज्यादा है, खासकर जेट फ्यूल जैसे उत्पादों में। इसका मतलब है कि कच्चे तेल की कीमतें भले ही गिर गई हों, लेकिन तैयार ईंधन की सप्लाई अभी भी पूरी तरह संतुलित नहीं हुई है। यह स्थिति दिखाती है कि बाजार ऊपर से शांत दिख रहा है, लेकिन अंदरूनी दबाव अभी भी मौजूद है।
भारत पर क्या असर पड़ेगा?
भारत अपनी जरुरत का 85% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय कीमतों का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। तेल की कीमतें बढ़ने से ट्रांसपोर्ट, महंगाई, उर्वरक सब्सिडी और इंपोर्ट बिल पर दबाव बढ़ता है। हालिया संकट ने भारत को यह भी सिखाया कि केवल सस्ता तेल नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा के लिए विविध स्रोत जरूरी हैं। इस दौरान भारतीय रिफाइनरियों ने अमेरिका, ओमान, नाइजीरिया और अंगोला जैसे देशों से अधिक तेल खरीदना शुरू किया, जिससे खाड़ी देशों पर निर्भरता थोड़ी कम हुई। आने वाले समय में भारत अपने रणनीतिक तेल भंडार बढ़ाने और अलग-अलग देशों से ऊर्जा खरीद बढ़ाने पर और ध्यान दे सकता है।
आगे क्या हो सकता है?
तेल बाजार का अगला रुख कई बातों पर निर्भर करेगा। इनमें ईरान का उत्पादन कितना तेजी से सामान्य होता है, होर्मुज जलमार्ग से शिपिंग कितनी सुरक्षित रहती है, वैश्विक तेल भंडार कितनी तेजी से भरे जाते हैं और भारत-चीन जैसे देशों की मांग कितनी बढ़ती है। ये प्रमुख कारक हैं। अगर सप्लाई सामान्य रहती है, तो ब्रेंट क्रूड की कीमतें धीरे-धीरे नरम हो सकती हैं। लेकिन एक्सपर्ट्स यह भी मानते हैं कि अगर कूटनीतिक बातचीत में कोई रुकावट आती है या मांग अचानक बढ़ती है, तो कीमतें फिर से ऊपर जा सकती हैं। कहा जा सकता है कि तेल बाजार से “डर की तेजी” तो खत्म हो गई है, लेकिन असली स्थिरता अभी भी दूर है। कीमतें गिरने का मतलब यह नहीं है कि संकट पूरी तरह खत्म हो गया है। असली स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि समुद्री रास्ते कितने सुरक्षित रहते हैं, सप्लाई कितनी जल्दी सामान्य होती है और वैश्विक मांग किस दिशा में जाती है।
