देश में 500 रुपये के नोटों का चलन वित्त वर्ष 2025-26 में 11.2 प्रतिशत बढ़ गया और मुद्रा प्रणाली में इनकी सर्वाधिक हिस्सेदारी बरकरार रही। हालांकि इस मूल्य वर्ग में नकली नोटों के मामले भी तेजी से बढ़े हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की वार्षिक रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है। शुक्रवार को जारी रिपोर्ट के मुताबिक, मार्च 2026 के अंत तक 500 रुपये के नोटों की संख्या बढ़कर 7,05,482 लाख हो गई, जो एक साल पहले 6,34,458 लाख थी। मूल्य के लिहाज से इन नोटों का कुल चलन 35.27 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो पिछले वित्त वर्ष में 31.72 लाख करोड़ रुपये था।
आरबीआई ने कहा कि चलन में मौजूद कुल नोटों की संख्या में 500 रुपये के नोटों की हिस्सेदारी 41.2 प्रतिशत रही, जो सबसे अधिक है। वहीं, मूल्य के आधार पर इनकी हिस्सेदारी 86 प्रतिशत से भी ज्यादा रही। हालांकि, इसी अवधि में 500 रुपये के नकली नोटों का पता चलने के मामलों में 20 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई। कुल मिलाकर, बैंकिंग प्रणाली में पकड़े गए नकली नोटों की संख्या 2025-26 में 5.7 प्रतिशत बढ़कर 2,29,746 हो गई, जो एक साल पहले 2,17,396 थी। इनमें 500 रुपये के नकली नोट सबसे अधिक रहे, जिनकी संख्या बढ़कर 1,41,907 हो गई।
नकली नोटों के मामलों में तेजी
रिपोर्ट में कहा गया है कि 20 रुपये के नकली नोटों में भी तेज वृद्धि देखी गई, जबकि 100, 50 और 200 रुपये के नकली नोटों में गिरावट दर्ज की गई। 2000 रुपये के नोटों के चलन से बाहर होने के कारण इस मूल्य वर्ग में नकली नोटों के मामले भी काफी कम हो गए। आरबीआई के अनुसार, 2025-26 के दौरान चलन में मौजूद नोट की मात्रा एवं मूल्य दोनों में क्रमशः 10.5 प्रतिशत एवं 11.9 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। यह अर्थव्यवस्था में नकदी की मजबूत मांग को दर्शाता है।
2000 के नोटों की वापसी इस वित्त वर्ष भी जारी
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि 2000 रुपये के नोटों को वापस लेने के लिए मई 2023 में शुरू की गई इस वित्त वर्ष में भी जारी रही। मार्च 2026 तक इस मूल्य वर्ग के कुल 98.45 प्रतिशत नोट बैंकिंग प्रणाली में वापस आ चुके थे। सिक्कों के मामले में भी वृद्धि दर्ज की गई है। वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान सिक्कों की कुल संख्या में 4.5 प्रतिशत और मूल्य में 11.4 प्रतिशत की बढ़त रही। एक, दो और पांच रुपये के सिक्के कुल संख्या का करीब 80 प्रतिशत हिस्सा रहे।
आरबीआई ने बताया कि 2025-26 में नोटों की छपाई के लिए मांग एक साल पहले की तुलना में कम रही, जिससे छपाई पर होने वाला खर्च एक साल पहले के 6,379 करोड़ रुपये से घटकर 4,875 करोड़ रुपये रह गया। उच्च मूल्य वर्ग के नोटों की छपाई मांग में कमी आई, जबकि 10 रुपये के नोटों की छपाई में बढ़ोतरी हुई। यह छोटे मूल्य के नोटों की बढ़ती जरूरत को दर्शाता है। इसके अलावा, खराब हो चुके नोटों के निपटान में भी करीब 28.6 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।
(इनपुट- भाषा)
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