आजकल रियल एस्टेट बाजार में ग्राहकों को लुभाने के लिए बिल्डर्स और डेवलपर्स कई तरह के आकर्षक ऑफर्स पेश करते हैं। इन्हीं में से एक सबसे लोकप्रिय और लोक-लुभावन ऑफर है पजेशन तक नो ईएमआई। इसका सीधा मतलब यह प्रचारित किया जाता है कि जब तक आपको आपके सपनों के घर की चाबी नहीं मिल जाती, तब तक आपको बैंक को कोई ईएमआई (EMI) नहीं चुकानी होगी। यह ऑफर उन लोगों को बहुत ज्यादा आकर्षित करता है जो वर्तमान में किराए के मकान में रह रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे वे हर महीने किराए और ईएमआई के दोहरे वित्तीय बोझ से बच जाएंगे। लेकिन क्या यह स्कीम वाकई उतनी ही फायदेमंद है जितनी दिखाई देती है?
क्या है ये ऑफर?
इस स्कीम के काम करने के तरीके को गहराई से समझें तो बिल्डर, बैंक और खरीदार के बीच का एक त्रिपक्षीय समझौता (Tripartite Agreement) होता है। इसके तहत बैंक खरीदार के नाम पर होम लोन मंजूर करता है और जैसे-जैसे निर्माण कार्य आगे बढ़ता है, बैंक बिल्डर को पैसा जारी करता जाता है। इस दौरान जो भी ब्याज (Pre-EMI) बनता है, उसका भुगतान खरीदार की जगह बिल्डर खुद बैंक को करता है। दिखने में यह व्यवस्था बहुत अच्छी लगती है, लेकिन हकीकत यह है कि बिल्डर इस ब्याज की रकम को पहले से ही प्रॉपर्टी की कुल कीमत में जोड़ देते हैं। यानी जो फ्लैट आपको सामान्य तौर पर थोड़ा सस्ता मिल सकता था, इस स्कीम के तहत उसकी प्रति वर्ग फुट की कीमत बढ़ा दी जाती है। इस तरह ग्राहक को घुमा-फिराकर उसी के पैसे का भुगतान करना पड़ता है।
क्या है सबसे बड़ा जोखिम?
इस स्कीम का सबसे बड़ा जोखिम तब सामने आता है जब प्रोजेक्ट में देरी (Project Delay) होने लगती है, जो कि भारतीय रियल एस्टेट में एक आम समस्या है। इस समझौते में एक निश्चित समय सीमा तय होती है, उदाहरण के लिए 2 या 3 साल, जिसके दौरान बिल्डर को ब्याज चुकाना होता है। अगर बिल्डर तय समय पर प्रोजेक्ट पूरा नहीं कर पाता है, तो उसके बाद बैंक को ब्याज या ईएमआई चुकाने की पूरी जिम्मेदारी कानूनी रूप से खरीदार पर आ जाती है। ऐसी स्थिति में खरीदार को अपने मौजूदा घर का किराया भी देना पड़ता है और अधूरे प्रोजेक्ट के लिए बैंक की ईएमआई भी भरनी पड़ती है, जिससे उनका मासिक बजट पूरी तरह बिगड़ जाता है।
इसके अलावा, खरीदार को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि इस पूरी प्रक्रिया में होम लोन उनके ही नाम और सिबिल स्कोर (CIBIL Score) पर लिया जाता है। यदि बिल्डर किसी वित्तीय संकट में फंस जाता है या जानबूझकर बैंक को समय पर ब्याज का भुगतान नहीं करता है, तो बैंक डिफॉल्टर के रूप में बिल्डर को नहीं बल्कि खरीदार को पकड़ेगा। बिल्डर की एक लापरवाही के कारण खरीदार का क्रेडिट स्कोर बुरी तरह खराब हो सकता है, जिससे भविष्य में उनके लिए किसी भी प्रकार का लोन लेना बेहद मुश्किल हो जाएगा। साथ ही, इस स्कीम में लोन की रकम निर्माण के चरणों के आधार पर जारी होने के बजाय कई बार शुरुआत में ही ज्यादा जारी हो जाती है, जिससे खरीदार का जोखिम और बढ़ जाता है।
इसलिए, इस तरह के आकर्षक ऑफर्स के जाल में फंसने से पहले खरीदारों को कुछ महत्वपूर्ण सावधानियां बरतनी चाहिए। सबसे पहले यह जांचें कि वह प्रोजेक्ट 'रेरा' (RERA) के तहत रजिस्टर्ड है या नहीं। इसके बाद, बिल्डर के पुराने रिकॉर्ड, उसकी साख और वित्तीय स्थिति की अच्छी तरह से पड़ताल कर लें कि क्या उसने अपने पिछले प्रोजेक्ट्स समय पर पूरे किए हैं। समझौते के दस्तावेजों (Loan and Property Documents) को साइन करने से पहले उनके सभी बारीक और छुपे हुए क्लॉज को ध्यान से पढ़ें और यह स्पष्ट करें कि प्रोजेक्ट लेट होने की स्थिति में वित्तीय नुकसान की भरपाई कौन करेगा। वित्तीय समझदारी इसी में है कि केवल 'नो ईएमआई' का बोर्ड देखकर फैसला न करें, बल्कि प्रॉपर्टी की वास्तविक बाजार कीमत से इसकी तुलना जरूर करें।
