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Explainer: समुद्र मंथन योजना क्या है? सरकार खर्च करेगी 84084 करोड़ रुपये, किन बड़ी मुश्किलों से निकलेगा देश

Samudra Manthan Scheme Explained: भारत सरकार ने समुद्र मंथन योजना के लिए 84084 करोड़ रुपये की मंजूरी दी है। आखिर यह योजना क्या है, इससे देश को क्या फायदा होगा। विस्तार से समझें।

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विस्तार से जानिए समुद्र मंथन योजना क्या है? (तस्वीर-AI)
Authored by: Ramanuj Singh
Updated Aug 1, 2026, 15:27 IST
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Samudra Manthan Scheme Explained : भारत सरकार ने देश की ऊर्जा जरुरतों को पूरा करने और विदेशी तेल पर निर्भरता घटाने के लिए एक ऐतिहासिक फैसला लिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट ने 84,084 करोड़ रुपये के बजटीय परिव्यय वाली 'समुद्र मंथन' राष्ट्रीय अपतटीय अन्वेषण (Offshore Exploration) योजना को मंजूरी दी है। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के नेतृत्व में चलने वाली यह योजना भारत के विशाल समुद्री क्षेत्रों में छिपे तेल और प्राकृतिक गैस के भंडारों को तलाशने का काम करेगी। वर्तमान में भारत अपनी जरुरत का 88% कच्चा तेल और करीब 50% प्राकृतिक गैस दूसरे देशों से आयात करता है। पिछले एक दशक में तेल आयात पर देश की निर्भरता 77% से बढ़कर 88% हो गई है, जिससे देश के खजाने पर भारी वित्तीय बोझ पड़ता है। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में तेल की कीमतें बढ़ने पर देश की अर्थव्यवस्था पर सीधा असर पड़ता है। 'समुद्र मंथन' योजना इसी गंभीर चुनौती का समाधान निकालने और भारत को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है।

समुद्र मंथन योजना क्या है और इसके मुख्य उद्देश्य क्या हैं?

'समुद्र मंथन योजना' भारत के समुद्री तटों से दूर गहरे और अत्यधिक गहरे पानी में हाइड्रोकार्बन (तेल और गैस) की खोज को बढ़ावा देने की एक व्यापक रणनीति है। इस योजना का नाम पौराणिक समुद्र मंथन से प्रेरित है, जहां समुद्र की गहराइयों से अमूल्य रत्न निकाले गए थे। ठीक उसी तरह, इस योजना के जरिए भारत अपने समुद्री आर्थिक क्षेत्र (EEZ) में मौजूद विशाल ऊर्जा संसाधनों का दोहन करेगा। इस योजना की रूपरेखा सबसे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2025 में स्वतंत्रता दिवस के अपने संबोधन के दौरान देश के सामने रखी थी। उन्होंने देश के अपतटीय ऊर्जा संसाधनों का पूरा इस्तेमाल करने के लिए एक आधुनिक 'समुद्र मंथन' की जरुरत पर जोर दिया था। इस योजना का प्राथमिक लक्ष्य अगले कुछ वर्षों में 60 करोड़ टन से अधिक तेल और गैस के नए भंडारों की खोज करना, घरेलू उत्पादन बढ़ाना और विदेशी तेल पर देश की निर्भरता को कम करना है।

84,084 करोड़ रुपये का बजट: कहां और कैसे खर्च होंगे पैसे?

गहरे समुद्र में तेल की खोज बेहद जटिल और खर्चीली प्रक्रिया है। इसी जोखिम को कम करने और प्राइवेट व सरकारी कंपनियों को निवेश के लिए प्रोत्साहित करने के लिए सरकार 84,084 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता दे रही है। इस बजट को मुख्य रूप से चार बड़े हिस्सों में बांटा गया है।

  1. ड्रिलिंग गतिविधियों के लिए 43,200 करोड़ रुपये: योजना के कुल बजट का सबसे बड़ा हिस्सा यानी 43,200 करोड़ रुपये वर्ष 2031 तक अगले 5 वर्षों के दौरान गहरे समुद्र में ड्रिलिंग (कुएं खोदने) के लिए आवंटित किए गए हैं। इसके तहत गहरे और अति-गहरे समुद्री क्षेत्रों में खोदे जाने वाले प्रति कुएं पर सरकार की तरफ से 650 करोड़ रुपये तक की आंशिक वित्तीय सहायता दी जाएगी।
  2. समुद्री डेटा जुटाने के लिए 28,534 करोड़ रुपये: समुद्र के भीतर कहां तेल या गैस छिपी हो सकती है, इसका सटीक पता लगाने के लिए उन्नत तकनीक और बड़े पैमाने पर मैपिंग या सर्वे की जरुरत होती है। डेटा एकत्र करने और मैपिंग कार्य के लिए 28,534 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।
  3. साझा बुनियादी ढांचा के लिए 10,000 करोड़ रुपये: जब समुद्र में तेल या गैस की नई खोज होती है, तो उसे किनारे तक लाने और प्रोसेस करने के लिए भारी इंफ्रास्ट्रक्चर की जरुरत होती है। नई खोजों को तुरंत उत्पादन में बदलने के लिए 10,000 करोड़ साझा इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने पर खर्च किए जाएंगे, जिससे कंपनियों की लागत घटेगी।
  4. मैनिफेक्चरिंग और सर्विसेज के लिए 2,000 करोड़ रुपये: देश के भीतर ही तेल व गैस निष्कर्षण से जुड़ी मशीनरी बनाने और सेवा क्षेत्रों को मजबूत करने के लिए 2,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं।
'समुद्र मंथन' योजना पर 84,084 करोड़ रुपये खर्च करेगी सरकार, जानिए किसे होगा फायदा

'समुद्र मंथन' योजना पर 84,084 करोड़ रुपये खर्च करेगी सरकार, जानिए किसे होगा फायदा

गहरे समुद्र में ड्रिलिंग: एक बेहद खर्चीला और जोखिम भरा काम

समुद्र में जहां पानी की गहराई 1,500 मीटर (करीब 5,000 फीट) से अधिक होती है, उसे अति-गहरा यानी अल्ट्रा डीपवाटर क्षेत्र माना जाता है। ऐसे चुनौतीपूर्ण इलाकों में एक भी कुआं खोदने पर 10 करोड़ डॉलर से लेकर 25 करोड़ डॉलर (करीब 830 करोड़ से 2,000 करोड़ रुपये) तक का भारी-भरकम खर्च आता है। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इतने भारी खर्च के बाद भी इस बात की कोई गारंटी नहीं होती कि वहां से तेल या गैस मिलेगी ही। इस उच्च वित्तीय जोखिम के कारण कंपनियां गहरे समुद्र में उतरने से कतराती थीं। 'समुद्र मंथन' योजना के तहत सरकार प्रति कुएं पर 650 करोड़ रुपये तक की मदद देकर कंपनियों के इस जोखिम को काफी हद तक कम कर रही है, जिससे वैश्विक और घरेलू निवेशक भारत के समुद्री क्षेत्रों में निवेश करने के लिए आकर्षित होंगे।

भारत की नीति में ऐतिहासिक बदलाव: 1997 से अब तक का सफर

भारत ने 1997 के बाद से अपनी तेल और गैस खोज नीति में समय-समय पर बड़े बदलाव किए हैं। पहले 'उत्पादन साझेदारी अनुबंध' (PSC) मॉडल चलता था, जिसमें कंपनियां तेल निकालने के बाद अपनी लागत वसूलती थीं और फिर सरकार के साथ मुनाफा बांटती थीं। अब भारत ने राजस्व साझेदारी और खोज प्रतिबद्धताओं पर आधारित एक पारदर्शी और आसान सिस्टम अपनाई है। 'समुद्र मंथन' योजना इस नीतिगत सुधार का ही अगला चरण है, जो न केवल खोज को गति देती है बल्कि आधुनिक तकनीक और बड़े पैमाने पर डेटा संग्रह को बढ़ावा देती है।

किन बड़ी मुश्किलों से निकलेगा देश?

'समुद्र मंथन' योजना सिर्फ एक बजटीय आवंटन नहीं है, बल्कि यह भारत के आर्थिक और रणनीतिक भविष्य को बदलने वाला कदम है। इस योजना से देश को निम्नलिखित बड़ी समस्याओं से राहत मिलेगी।

  • विदेशी मुद्रा की भारी बचत: भारत हर साल कच्चे तेल के आयात पर खरबों रुपये की विदेशी मुद्रा खर्च करता है। घरेलू उत्पादन बढ़ने से देश का चालू खाता घाटा (CAD) कम होगा और विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत होगा।
  • ऊर्जा सुरक्षा: वैश्विक युद्धों, भू-राजनीतिक तनावों और सप्लाई चेन में बाधाओं के समय महंगे तेल की मार से भारतीय उपभोक्ताओं को सुरक्षा मिलेगी।
  • रोजगार के नए अवसर: 84,000 करोड़ रुपये से अधिक के निवेश से देश में शिपिंग, इंजीनियरिंग, मैन्युफैक्चरिंग, जियोलॉजिकल रिसर्च और सर्विस सेक्टर में लाखों प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार पैदा होंगे।
  • घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा: 2,000 करोड़ रुपये का विशेष फंड घरेलू विनिर्माण (Make in India) को बढ़ावा देगा, जिससे भारत में ही समुद्री ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े उपकरण और तकनीक बनने लगेंगे।

'समुद्र मंथन' योजना भारत को एक आयातक देश से बदलकर अपनी ऊर्जा जरुरतों को खुद पूरा करने वाले एक मजबूत और आत्मनिर्भर राष्ट्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगी।

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