अमेरिका या चीन नहीं, माइक्रोसॉफ्ट के CEO सत्य नडेला ने बताया कौन जीतेगा AI की रेस
- Authored by: यतींद्र लवानिया
- Updated Jan 22, 2026, 03:46 PM IST
पूरी दुनिया फिलहाल तमाम बड़े देशों और कंपनियों को AI की रेस में दौड़ते देख रही है। AI बबल की वजह से चिप्स, सेमीकंडक्टर और आईटी कंपनियों के स्टॉक्स ऑल टाइम हाई पर ट्रेड कर रहे हैं। लेकिन, माइक्रोसॉफ्ट के CEO सत्य नडेला का कहना है कि एआई की रेस चिप्स से नहीं, बल्कि कई दूसरे पहलुओं के आधार पर जीती जाएगी।
WEF में बोलते हुए सत्य नडेला
वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के मंच से सत्य नडेला ने AI एडॉप्शन को लेकर कहा कि आने वाले दिनों में किसी भी देश की ग्रोथ का सीधा संबंध उसकी AI इस्तेमाल की क्षमता से जुड़ा होगा। नडेला का कहना है कि AI अब सोच-विचारकर किए जाने वाले टेक खर्च नहीं रह गया है। बल्कि, कोर इन्फ्रास्ट्रक्चर बनता जा रहा है। ऐसे में डाटा सेंटर्स और कंप्यूटर्स को चलाने वाली बिजली की लागत बेहद अहम होगी।
टोकन बने ग्लोबल कमोडिटी
नडेला ने ने AI प्रॉसेसिंग की बेसिक यूनिट को “टोकन” नई ग्लोबल कमोडिटी बताते हुए कहा, कि हर इकोनॉमी और हर कंपनी का काम इन टोकन्स को प्रोडक्टिविटी और ग्रोथ में बदलना है। नडेला के मुताबिक, अगर टोकन सस्ते होंगे, तो बिजनेस के लिए AI एडॉप्शन आसान होगा और इकोनॉमिक आउटपुट तेजी से बढ़ेगा।
डेटा सेंटर रेस दांव
AI इन्फ्रास्ट्रक्चर की रेस में हायपरस्केलर्स का खर्च लगातार बढ़ रहा है। माइक्रोसॉफ्ट ने 2025 की शुरुआत में संकेत दिया था कि कंपनी AI डेटा सेंटर निर्माण पर करीब 80 अरब डॉलर खर्च करने की तैयारी में है। नडेला ने यह भी कहा कि कंपनी का लगभग आधा खर्च अमेरिका के बाहर हो रहा है, जिससे यह साफ है कि AI कंप्यूटिंग कैपेसिटी का विस्तार अब ग्लोबल रेस बन चुका है।
नडेला की बड़ी चेतावनी
नडेला ने यह भी कहा कि ऊर्जा जैसे अहम संसाधनों को सिर्फ टोकन बनाने में झोंक देना लंबे समय में टिकाऊ नहीं होगा। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर AI का इस्तेमाल स्वास्थ्य, शिक्षा, पब्लिक सेक्टर एफिशिएंसी और प्राइवेट कंपटीटिवनेस जैसे क्षेत्रों में वास्तविक सुधार नहीं ला पाया, तो कंपनियां और इंडस्ट्री सामाजिक उपयोगिता नहीं होने की वजह से भरोसा खो सकती हैं। मतलब AI इन्फ्रा पर बढ़ते एनर्जी खर्च को जस्टिफाई करने के लिए उसके नतीजा दिखना जरूरी है।
कैसे मिलेगी जीत
नडेला ने कहा कि AI कंपटीटिवनेस सिर्फ एनर्जी या चिप्स के प्रोडक्शन तक सीमित नहीं है, बल्कि टोटल कॉस्ट ऑफ ऑनरशिप का पूरा समीकरण अहम है। इसमें यह भी शामिल है कि कोई देश डाटा सेंटर्स कितनी तेजी से बना सकता है, सिस्टम में सिलिकॉन यानी चिप्स की लागत का ट्रेंड क्या है और ओवरऑल कंप्यूटिंग कॉस्ट कर्व कितना नीचे जा सकता है। उनके मुताबिक, AI रेस में वही देश आगे रहेगा जो एनर्जी और इन्फ्रास्ट्रक्चर दोनों को एफिशिएंट तरीके से स्केल कर पाएगा।
यूरोप को बड़ा संदेश
यूरोप पर बात करते हुए नडेला ने कहा कि वहां बहस अक्सर यूरोप केंद्रित रह जाती है, जबकि असली प्रतिस्पर्धा वैश्विक आउटपुट से तय होती है। नडेला ने कहा कि पिछले 300 साल में यूरोप ने इसलिए तरक्की की, क्योंकि उसने दुनिया की जरूरत के हिसाब से उत्पाद बनाए। AI के दौर में भी यूरोप को एनर्जी और टोकन्स के लिए निवेश बढ़ाकर अपने आउटपुट को ग्लोबल बनाना होगा।
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