IMD Monsoon Forecast : भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने इस साल दक्षिण-पश्चिम मानसून को लेकर अपने अनुमान में बदलाव किया है। पहले जहां मानसून सामान्य से थोड़ा कम यानी 92 प्रतिशत रहने की संभावना जताई गई थी, अब इसे घटाकर करीब 90 प्रतिशत कर दिया गया है। इसका मतलब है कि इस बार बारिश औसत से कम रह सकती है। आईएमडी ने यह भी बताया है कि इस बार जून से सितंबर के बीच 60 प्रतिशत संभावना ऐसी है कि बारिश सामान्य से कम हो सकती है। साथ ही मानसून के आने में भी देरी हो रही है और जून महीने में देश के ज्यादातर हिस्सों में बारिश सामान्य से कम रहने का अनुमान है।
कृषि क्षेत्र पर संभावित असर
इस रिपोर्ट के अनुसार कमजोर मानसून का सबसे बड़ा असर कृषि क्षेत्र पर पड़ सकता है। खासकर उन फसलों पर जो पूरी तरह बारिश पर निर्भर होती हैं। जब बारिश कम होती है, तो बुवाई देर से शुरू होती है और कई बार फसल का उत्पादन भी प्रभावित होता है। इसके अलावा, लगातार गर्मी और लू जैसे हालात भी खेती की शुरुआती गतिविधियों को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इससे खरीफ सीजन की पैदावार पर दबाव बढ़ सकता है।
मानसून कोर जोन (MCZ) सबसे ज्यादा प्रभावित
रिपोर्ट में बताया गया है कि मानसून कोर जोन यानी MCZ में स्थिति ज्यादा गंभीर हो सकती है। इस क्षेत्र में गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, महाराष्ट्र और झारखंड शामिल हैं। यह क्षेत्र भारत के कुल खाद्यान्न उत्पादन का करीब 40 प्रतिशत हिस्सा देता है। लेकिन इस बार यहां बारिश सामान्य से कम रहने की आशंका है। अगर ऐसा होता है तो इसका सीधा असर फसल उत्पादन और किसानों की आय पर पड़ सकता है।
किन फसलों पर सबसे ज्यादा खतरा
रिपोर्ट के अनुसार बारिश पर निर्भर फसलें सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकती हैं। इनमें दालें, मोटे अनाज (coarse cereals), तिलहन और मसाले शामिल हैं। इन फसलों की खेती ऐसे इलाकों में ज्यादा होती है जहां सिंचाई की सुविधा सीमित है और पूरी तरह बारिश पर निर्भरता रहती है। दालों का उत्पादन मुख्य रूप से मध्य और उत्तर-पश्चिम भारत में होता है। वहीं मोटे अनाज की खेती उत्तर-पश्चिम, मध्य और दक्षिण भारत में ज्यादा होती है। इन क्षेत्रों में कम बारिश होने से उत्पादन घटने का खतरा बढ़ जाता है।
चावल और गेहूं अपेक्षाकृत सुरक्षित
हालांकि रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि चावल और गेहूं जैसी फसलें तुलनात्मक रूप से सुरक्षित रह सकती हैं। इसका कारण यह है कि इन फसलों की सिंचाई व्यवस्था बेहतर है और जलाशयों में पानी का स्तर भी पर्याप्त है। इस समय देश में जलाशयों की क्षमता का लगभग 31 प्रतिशत पानी उपलब्ध है, जो पिछले औसत 26 प्रतिशत से अधिक है। इससे कुछ हद तक राहत मिल सकती है।
खाद्य उत्पादन और भंडार की स्थिति
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि 2025-26 के फसल वर्ष में खाद्यान्न उत्पादन में 5.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यह बढ़ोतरी चावल, गेहूं, मोटे अनाज और दालों के अच्छे उत्पादन की वजह से हुई है। इसके अलावा सरकार के पास खाद्यान्न का अच्छा भंडार भी मौजूद है। चावल का स्टॉक लगभग 3.9 करोड़ टन और गेहूं का स्टॉक लगभग 4.28 करोड़ टन है। यह मात्रा तय न्यूनतम जरूरत से काफी ज्यादा है, जिससे किसी भी आपात स्थिति में आपूर्ति को संभाला जा सकता है।
महंगाई पर दबाव बढ़ने की संभावना
इन राहत भरे संकेतों के बावजूद रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि खाद्य महंगाई का खतरा अभी भी बना हुआ है। खासकर दालों, खाद्य तेलों और बारिश पर निर्भर अन्य फसलों की कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है। अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026-27 में खुदरा महंगाई दर लगभग 5 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। इसका कारण मौसम की अनिश्चितता, खाद्य और ऊर्जा की बढ़ती कीमतें और वैश्विक बाजार में कमोडिटी कीमतों का मजबूत रहना बताया गया है।
अल-नीनो का असर और आगे की स्थिति
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अगर मानसून के दौरान एल-नीनो जैसी स्थिति विकसित होती है, तो बारिश और भी प्रभावित हो सकती है। अल-नीनो आमतौर पर भारत में मानसून को कमजोर करता है और सूखे जैसी स्थिति पैदा कर सकता है। इसलिए आने वाले महीनों में मानसून की प्रगति, बारिश का वितरण और एल-नीनो की स्थिति बहुत महत्वपूर्ण होगी। यही तय करेगा कि खरीफ फसल का उत्पादन कितना होगा और देश की अर्थव्यवस्था पर इसका क्या असर पड़ेगा।
कुल मिलाकर, कमजोर मानसून का अनुमान कृषि क्षेत्र और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए चिंता बढ़ाने वाला है। हालांकि अच्छे जल भंडार, मजबूत खाद्यान्न स्टॉक और पिछले वर्ष का बेहतर उत्पादन कुछ राहत देते हैं, लेकिन बारिश कम होने पर दालों, तिलहन और मोटे अनाज की फसलों पर सबसे ज्यादा असर पड़ सकता है। आने वाले महीने देश की कृषि और महंगाई की दिशा तय करने में बेहद अहम होंगे।
