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ट्रंप के ट्रेड सलाहकार पीटर नवारो भारत पर क्यों साध रहे निशाना?

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की नीतियों के समर्थक पीटर नवारों इन दिनों भारत के खिलाफ बयान देने को लेकर चर्चा में है। उनकी भारत के खिलाफ की गई टिप्पणियां चर्चा की विषय बनी है।

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नवारो का विवादों से पुराना नाता (PHOTO- AP)

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की नीतियों के समर्थक पीटर नवारों इन दिनों भारत के खिलाफ बयान देने को लेकर चर्चा में है। उनकी भारत के खिलाफ की गई टिप्पणियां चर्चा की विषय बनी है। पीटर नवारो जानेमाने अमेरिकी अर्थशास्त्री है जिन्होंने लंबे समय से टैरिफ को अमेरिकी व्यापार नीति की आधारशिला बताया है। हाल के हफ्तों में नवारो ने भारत के खिलाफ आलोचना करनी शुरु कर दी है। रूसी तेल की खरीद पर हमला बोला है और भारतीय वस्तुओं पर अमेरिका द्वारा लगाए गए 50 प्रतिशत टैरिफ को सही ठहराया है।

नवारो का यह आक्रामक रुख ऐसे समय में आया है जब भारत ने दोहराया है कि उसे रूस के यूक्रेन पर आक्रमण के बाद ग्लोबल कीमतों को स्थिर करने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा रूसी तेल खरीदने के लिए प्रोत्साहित किया गया था। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने नए टैरिफ को अनुचित बताते हुए यह तर्क दिया था कि इसे गलत तरीके से "तेल मुद्दे के रूप में पेश किया जा रहा है।

भारत के खिलाफ नवारो काफी हमलावर

नवारो ने हाल ही में फाइनेंशियल टाइम्स में एक लेख लिखा है और इस लेख में रूस से तेल खरीदने पर उन्होंने भारत की आलोचना की है। लेख में नवारो ने कहा कि 'रूस से भारत का तेल खरीदा जाना अवसरवादिता और पुतिन की युद्ध अर्थव्यवस्था को अलग-थलग करने के वैश्विक प्रयासों को नुकसान पहुंचाने वाला है।' नवारो ने कहा था कि हम भारत के साथ 50 अरब डॉलर का व्यापार घाटा चलाते हैं और वे हमारे डॉलर का उपयोग रूसी तेल खरीदने के लिए कर रहे हैं। 50% टैरिफ अनुचित व्यापार के लिए 25% और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए 25% एक सीधी प्रतिक्रिया है।

विवादों से पुराना नाता

ब्लूमबर्ग टीवी के साथ एक साक्षात्कार में उन्होंने घोषणा की कि (यूक्रेन में) शांति का रास्ता कम से कम आंशिक रूप से नई दिल्ली से होकर गुजरता है और ट्वीटर पर उन्होंने भारत पर रणनीतिक रूप से मुफ्तखोरी करने का आरोप लगाया। पोस्ट का अधिकांश भाग इस महीने की शुरुआत में फाइनेंशियल टाइम्स में प्रकाशित एक लेख से लिया गया था जिसमें उन्होंने लिखा था कि भारत का तेल लॉबी पुतिन के युद्ध मशीन को वित्त पोषित कर रहा है - इसे रोकना होगा।

अमेरिका के जानेमाने अर्थशास्त्री

नवारो, हार्वर्ड-शिक्षित अर्थशास्त्री और अमेरिकी राजनीति में टैरिफ के सबसे मजबूत समर्थकों में से एक रहे हैं। ट्रम्प प्रशासन में अपनी भूमिका से बहुत पहले उन्होंने विदेशी प्रतिस्पर्धा के खिलाफ चेतावनी दी थी और तर्क दिया था कि व्यापार घाटे से अमेरिकी समृद्धि कमजोर होती है। 2019 में द वॉल स्ट्रीट जर्नल में छपे एक कॉलम में नवारो ने कहा था कि "भारत 90% और चीन 85% अधिक टैरिफ लगाता है, जिससे कई अमेरिकी निर्यातकों को दुनिया की एक तिहाई से अधिक आबादी को प्रतिस्पर्धी कीमतों पर सामान बेचने से रोकने में मदद मिलती है"।

ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में नवारो ताकतवर बने

ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में नवारो पहले से ज्यादा ताकतवर बने। उन्होंने पहले ही दिन इस्पात और एल्युमीनियम पर 25% टैरिफ दोबारा लगाने और 'पारस्परिक टैरिफ' नीति का मसौदा तैयार किया। नवारो ने $800 से कम कीमत के पार्सलों पर शुल्क-मुक्ति भी खत्म कर दी। इस पहले से चीन के ई-कॉमर्स निर्यातकों को झटका लगा। नवारो के करियर का सबसे विचित्र विवाद 'रॉन वारा' नामक काल्पनिक विशेषज्ञ से जुड़ा है। नवारो ने अपनी छह किताबों में इस शख्स को उद्धृत किया, जो असल में मौजूद ही नहीं था। चीन ने भी इसका मजाक उड़ाते हुए नवारो की विश्वसनीयता पर सवाल उठाया।

Sanjeev Dubey
संजीव कुमार दुबेauthor

पत्रकारिता में मेरे सफर की शुरुआत 20 साल पहले हुई। 2002 अक्टूबर में टीवी की रुपहले दुनिया में दाखिल हुआ। शुरुआत टीवी की दुनिया के उस पहलू से हुई जहां हर खबर को उसके मुताबिक आकार दिया जाता है यानी उसे कसा जाता है। सहारा टीवी में मेरे कामकाज की शुरुआत पैकेजिंग से हुई जहां खबरों को अलग-अलग प्रारूपों में गढ़ने का काम होता है। फिर पीसीआर में आउटपुट एडिटर की भूमिका निभाने का मौका मिला जहां तुरंत निर्णय कर खबरों को ब्रेक करने की चुनौती रहती है। न्यूजरूम की गहमागमी के बीच रनडाउन तैयार करने की जिम्मेदारी भी बखूबी निभाई। यहां ब्रेकिंग, हार्ड कोर की खबरों और फीचर्ड प्रोग्रामिंग ने मेरे अनुभव का दायरा तो बढ़ाया ही उसमें गहराई एवं पैनापन भी दिया। 2011 में टेलिविजन न्यूज की दुनिया को अलविदा कहना पड़ा। अक्टूबर 2011 में Zee News की हिंदी वेबसाइट को अपनी अगवुाई में लॉन्च करने का मौका मिला। डिजिटल की दुनिया और टीवी की दुनिया में खबरें परोसने और खबरों को दिखाने का अंदाज बिल्कुल अलग था। मैं उस दौर में दस्तक दे चुका था जब टीवी भी स्मार्टफोन पर देखा जाने लगा था। डिजिटल पर भी ब्रेकिंग थी। अगर टीवी में प्रोग्रामिंग थी तो यहां भी बतौर फीचर, सॉफ्ट स्टोरीज का विशाल संसार था। एक नया मीडियम जो स्मार्टफोन पर बखूबी देखा और समझा जा सकता था। डिजिटल की इस दुनिया में टीवी और अखबार दोनों समाहित थे। यहां काम करते हुए डिजिटल न्यूज मीडिया की बारीकियां तो सीखी हीं। साथ ही जब जी न्यूज से विदाई ली तो उस समय 33 मिलियन यूजर्स के बीच 84 मिलियन पीवीज देखने की अपार खुशियां हासिल हुईं। जी न्यूज में एक लंबी पारी खेलने के बाद जुलाई 2017 में टाइम्स नाउ नेटवर्क से जुड़ने का अवसर मिला। 2017 में ही टाइम्स नाउ की हिंदी वेबसाइट की शुरुआत हुई। यह पहला मौका था जब टाइम्स नाउ की अगुवाई में कोई हिंदी न्यूज वेबसाइट लॉन्च हुई। यहां एक नई और युवा टीम बनी। यह टीम आक्रामक अंदाज में काम करते हुए कम समय में अपनी पहचान बनाई। डिजिटल की दुनिया के बदलते संसार में अब चुनौती पीवीज की नहीं बल्कि यूजर्स की थी, जिन्हें लाना इतना आसान नहीं थी। लेकिन टीम के जज्बे, हौसले ने असाधारण चुनौतियों को भी अपनी मेहनत एवं लगन से उसे सामान्य बनाया। डिजिटल न्यूज की दुनिया में हर पल चुनौतियों के बीच नया कुछ सीखने-समझने और कुछ कर गुजरने की प्रेरणा मिलती है। यह सिलसिला आज भी अनवरत जारी है-

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