Nirmohi Akhada: अयोध्या के राम मंदिर से जुड़े श्री रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को लेकर निर्मोही अखाsu एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) पहुंच गया है। अखाड़े ने शीर्ष अदालत में याचिका दायर कर आरोप लगाया है कि केंद्र सरकार ने 9 नवंबर 2019 के राम जन्मभूमि फैसले का वास्तविक अर्थों में पालन नहीं किया। याचिका में कहा गया है कि करीब सात साल बीत जाने के बावजूद फैसले की भावना के अनुरूप व्यवस्था लागू नहीं हो सकी है।
याचिका में कहा गया है कि केंद्र सरकार ने श्री रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट (Shri Ram Janmabhoomi Teerth Kshetra) का गठन तो किया, लेकिन यह एक "निजी ट्रस्ट" के रूप में काम कर रहा है। निर्मोही अखाड़े ने दावा किया है कि ट्रस्ट के कुछ सदस्य कथित तौर पर भ्रष्टाचार से जुड़े विवादों में रहे हैं, जिससे राम जन्मभूमि की गरिमा प्रभावित हुई है। हालांकि, इन आरोपों पर अभी सुप्रीम कोर्ट ने कोई टिप्पणी नहीं की है और न ही इनकी न्यायिक पुष्टि हुई है।
'मंदिर बिना शेबैत के नहीं हो सकता'
निर्मोही अखाड़े ने याचिका में कहा है कि किसी भी मंदिर का अस्तित्व शेबैत (मंदिर का पारंपरिक सेवायत और प्रबंधक) के बिना नहीं हो सकता। अखाड़े का कहना है कि वर्तमान ट्रस्ट में ऐसे लोगों को शामिल किया गया है जिनका श्री राम जन्मभूमि से कोई ऐतिहासिक, धार्मिक या कानूनी संबंध नहीं है। इसलिए ट्रस्ट का पुनर्गठन किया जाना चाहिए।
टाइम्स नाउ नवभारत पर ये भी पढ़ें: 'जो राम का नहीं, वो किसी काम का नहीं', उद्धव ठाकरे के नागपुर कार्यक्रम पर सीएम देवेंद्र फडणवीस का तंज
मंदिर में शेबैत व्यवस्था क्या होती है?
शेबैत हिंदू धार्मिक परंपरा और कानून में वह व्यक्ति, परिवार, संस्था या धार्मिक निकाय होता है, जिसे किसी मंदिर में स्थापित देवता का पारंपरिक संरक्षक, सेवायत और प्रबंधक माना जाता है। हिंदू कानून में देवता को एक कानूनी व्यक्तित्व का दर्जा प्राप्त है, इसलिए देवता की ओर से मंदिर की संपत्ति का प्रबंधन, पूजा-अर्चना, धार्मिक अनुष्ठानों की व्यवस्था और मंदिर के दैनिक संचालन की जिम्मेदारी शेबैत निभाता है। कई मामलों में यह अधिकार परंपरागत रूप से एक परिवार या अखाड़े को प्राप्त होता है, जबकि कुछ मंदिरों में यह जिम्मेदारी ट्रस्ट या अन्य प्रबंधन संस्थाओं के पास भी होती है।
सुप्रीम कोर्ट से क्या-क्या मांग की गई?
याचिका में सुप्रीम कोर्ट से श्री रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को सार्वजनिक ट्रस्ट के रूप में पुनर्गठित करने की मांग की गई है। इसके साथ ही निर्मोही अखाड़े को ट्रस्ट में उचित प्रतिनिधित्व और भूमिका देने, केंद्र सरकार द्वारा ट्रस्टियों की नियुक्ति के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश तय करने और मंदिर में सभी पूजा, सेवा, भोग तथा धार्मिक अनुष्ठान रामानंदी संप्रदाय की परंपरा के अनुसार कराने की मांग की गई है।
इसके अलावा याचिका में श्री रामलला विराजमान की मूल प्रतिमाओं को पुनर्स्थापित करने, 2019 के फैसले के क्रियान्वयन की समीक्षा के लिए एक स्वतंत्र समिति गठित करने और ट्रस्ट के सभी वित्तीय लेन-देन का फोरेंसिक ऑडिट कराने का भी अनुरोध किया गया है।
राम मंदिर आंदोलन में निर्मोही अखाड़े की रही है भूमिका
राम जन्मभूमि आंदोलन और उससे जुड़े लंबे कानूनी विवाद में निर्मोही अखाड़ा प्रमुख पक्षकारों में से एक रहा। अखाड़े का दावा था कि वह भगवान रामलला का पारंपरिक शेबैत (सेवायत एवं प्रबंधक) है और इसलिए विवादित परिसर में पूजा-पाठ तथा मंदिर के प्रबंधन का अधिकार उसी को मिलना चाहिए। वर्ष 1959 में निर्मोही अखाड़े ने फैजाबाद की सिविल अदालत में मुकदमा दायर कर विवादित स्थल के प्रबंधन और कब्जे का अधिकार मांगा था।
हालांकि, 9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में अखाड़े का दावा समय-सीमा के आधार पर खारिज कर दिया, लेकिन यह भी कहा कि मंदिर निर्माण के लिए बनने वाले ट्रस्ट में निर्मोही अखाड़े को उचित प्रतिनिधित्व देने पर केंद्र सरकार विचार कर सकती है। इसके बाद केंद्र सरकार ने श्री रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन किया।
2019 के फैसले में क्या तय हुआ था?
9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या भूमि विवाद पर ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए विवादित भूमि रामलला विराजमान को देने का आदेश दिया था। साथ ही केंद्र सरकार को मंदिर के निर्माण और प्रबंधन के लिए एक ट्रस्ट गठित करने का निर्देश दिया था। इसके बाद फरवरी 2020 में श्री रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन किया गया। अब निर्मोही अखाड़े की नई याचिका में इसी ट्रस्ट की संरचना और 2019 के फैसले के पालन पर सवाल उठाए गए हैं।
