अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के हालिया बयान ने वैश्विक ऊर्जा बाजार और कूटनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। बेसेंट ने स्पष्ट किया है कि अमेरिका अब ईरान और रूस के तेल आयात पर दी गई किसी भी प्रकार की छूट (Waivers) को आगे नहीं बढ़ाएगा। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब ईरान और इजरायल के बीच जारी तनाव के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति पहले से ही संकट में है।
ईरानी तेल पर कोई रियायत नहीं
एसोसिएटेड प्रेस (AP) को दिए एक इंटरव्यू में वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कड़े शब्दों में कहा कि ईरानी तेल के लिए एकमुश्त छूट के नवीनीकरण का सवाल ही नहीं उठता। उन्होंने बताया कि अमेरिकी नाकेबंदी (Blockade) के कारण ईरान से तेल बाहर नहीं निकल पा रहा है। बेसेंट ने अनुमान जताया है कि अगले दो-तीन दिनों में ईरान को अपने उत्पादन कुओं को बंद करना शुरू करना पड़ सकता है, जो उनके तेल क्षेत्रों के लिए तकनीकी और आर्थिक रूप से बेहद नुकसानदेह साबित होगा।
रूसी तेल पर भी अमेरिकी रुख सख्त
रूस के मामले में भी अमेरिका ने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। बेसेंट के अनुसार, समुद्र में मौजूद रूसी तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की खरीद की अनुमति देने वाले वेवर को भी रिन्यू करने की कोई योजना नहीं है। हालांकि, मार्च में वैश्विक ऊर्जा बाजार को स्थिर करने के लिए अमेरिका ने रूसी तेल की बिक्री पर छूट दी थी क्योंकि उस समय कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई थीं, लेकिन अब अमेरिका का मानना है कि रूसी तेल का स्टॉक काफी हद तक खप चुका है और आगे छूट की आवश्यकता नहीं है।
वैश्विक ऊर्जा संकट और हॉर्मुज जलडमरूमध्य का प्रभाव
यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब ईरान और इजरायल के बीच युद्ध जैसे हालात बने हुए हैं। हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के बंद होने से वैश्विक ऊर्जा बाजार पहले से ही बुरी तरह प्रभावित है। बेसेंट ने पिछले सप्ताह विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की बैठकों का जिक्र करते हुए बताया कि कई गरीब और विकासशील देशों ने उनसे मदद की गुहार लगाई थी, जिसके चलते पहले कुछ रियायतें दी गई थीं, लेकिन अब सुरक्षा और कूटनीति के मद्देनजर कड़े प्रतिबंधों की वापसी तय है।
ईरान की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा सीधा असर
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ईरान को अपने तेल उत्पादन कुओं को बंद करना पड़ता है, तो यह उसकी अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा झटका होगा। तेल कुओं को एक बार बंद करने के बाद दोबारा चालू करना न केवल महंगा होता है, बल्कि इससे उत्पादन क्षमता पर भी स्थायी प्रभाव पड़ सकता है। अमेरिका का यह कदम ईरान पर अधिकतम दबाव (Maximum Pressure) बनाने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
