Donald Trump Europe Effect: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत ने न केवल वैश्विक बाजारों को हिलाकर रख दिया है, बल्कि यूरोपीय महाद्वीप के राजनीतिक नक्शे को भी नए सिरे से परिभाषित करना शुरू कर दिया है। कल तक जो यूरोपीय देश प्रवासन, रक्षा बजट, यूक्रेन युद्ध और यूरोपीय संघ (EU) के भविष्य को लेकर आपस में बंटे हुए थे, वे अब वाशिंगटन के साथ आने वाले 'लेन-देन' और अप्रत्याशित रिश्तों से निपटने के लिए एक मंच पर आ रहे हैं।
इस भू-राजनीतिक बदलाव की सबसे बड़ी और चौंकाने वाली तस्वीर फ्रांस और इटली के बीच के रिश्तों में देखने को मिली है, जहां वैचारिक रूप से दो अलग-अलग ध्रुवों पर खड़े नेता अब एक-दूसरे के गले लग रहे हैं।
फ्रेंच रिविएरा में मिट गई दूरियां: 'हमें एक-दूसरे की जरूरत'
इस कूटनीतिक बदलाव का सबसे जीवंत उदाहरण तब देखने को मिला जब फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने एंटीब्स के पिकासो संग्रहालय (French Riviera) में इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी की मेजबानी की। महीनों के तनावपूर्ण संबंधों के बाद, दोनों नेताओं ने न केवल गर्मजोशी से हाथ मिलाए बल्कि रणनीतिक क्षेत्रों जैसे- रक्षा, परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष, यूक्रेन की स्थिति, और प्रवासन पर गहन द्विपक्षीय बातचीत की। मैक्रों ने साफ शब्दों में कहा, 'हमें एक-दूसरे की जरूरत है।'
यह मुलाकात महज एक औपचारिक कूटनीतिक शिष्टाचार नहीं थी। दरअसल, मैक्रों और मेलोनी के बीच लंबे समय से गंभीर मतभेद थे:
-प्रवासन (Migration): मेलोनी की राजनीति सख्त सीमा नियंत्रण पर टिकी है, जबकि फ्रांस एक व्यापक यूरोपीय दृष्टिकोण का पक्षधर था।
-यूराइल और रक्षा नीति: मैक्रों लंबे समय से यूरोप की 'रणनीतिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) यानी अमेरिका पर निर्भरता कम करके खुद की रक्षा प्रणाली बनाने के पक्ष में थे, जबकि इटली हमेशा नाटो और वाशिंगटन को केंद्र में रखना चाहता था।
-विचारधारा: मैक्रों जहां एक प्रो-यूरोपियन मध्यमार्गी नेता हैं, वहीं मेलोनी दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी सरकार का नेतृत्व करती हैं।
लेकिन डोनाल्ड ट्रंप के 'अमेरिका फर्स्ट' दृष्टिकोण ने इन दोनों को एक साथ आने पर मजबूर कर दिया है। यूरोप को समझ आ गया है कि अगर वे आपस में बंटे रहे, तो अमेरिका के सामने सौदेबाजी (Bargaining Power) की उनकी क्षमता बेहद कमजोर हो जाएगी।
यूरोप की नई 'ट्रंप-रणनीति' (ECFR रिपोर्ट):
1. तनाव टालना: अमेरिका से व्यापार युद्ध से बचने के लिए अमेरिकी लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) का आयात बढ़ाना।
2. वाशिंगटन को संदेश: चीनी सोलर इनवर्टर और क्लीन-टेक निर्यात के खिलाफ जांच शुरू करना, ताकि अमेरिका को आर्थिक सुरक्षा का भरोसा मिले।
3. आक्रामक रुख: यदि ट्रंप फिर भी टैरिफ लगाते हैं, तो यूरोपीय देश और बिजनेस मिलकर अमेरिकी अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने वाली जवाबी कार्रवाई करेंगे।
मैक्रों-मेलोनी ही नहीं, पूरा यूरोप हो रहा एकजुट
यह बदलाव केवल फ्रांस और इटली तक सीमित नहीं है। ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री कीर स्टारमर, जर्मनी के नए चांसलर फ्रेडरिक मर्ज, पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयन ने रक्षा निवेश और संयुक्त सैन्य खरीद को लेकर आपसी परामर्श को कई गुना तेज कर दिया है। ट्रंप द्वारा नाटो सहयोगियों को रक्षा खर्च न बढ़ाने पर दी गई चेतावनियों के बाद पूरा महाद्वीप अपनी रक्षा तैयारियों को मजबूत करने में जुट गया है।

मेलोनी और ट्रंप के बीच नहीं है सबकुछ सही
भारत के लिए इसके क्या मायने हैं?
यूरोप के भीतर हो रही इस उथल-पुथल का सीधा और गहरा असर भारत पर पड़ने जा रहा है, क्योंकि यूरोपीय संघ (EU) $136 बिलियन के द्विपक्षीय व्यापार के साथ भारत के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में से एक है।
1. 'मदर ऑफ ऑल डील्स' (India-EU FTA):
भारत और यूरोपीय संघ ने हाल ही में 27 जनवरी 2026 को अपने बहुप्रतीक्षित मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की वार्ताओं को सफलतापूर्वक संपन्न किया है। इस ऐतिहासिक समझौते को वैश्विक व्यापार जगत में 'मदर ऑफ ऑल डील्स' कहा जा रहा है, क्योंकि यह दोनों शक्तियां मिलकर दुनिया के कुल व्यापार का एक-तिहाई हिस्सा और वैश्विक जीडीपी का 25% प्रतिनिधित्व करती हैं।
इस समझौते के तहत EU भारत के करीब 96% निर्यात मूल्य पर से सीमा शुल्क (Duties) को पूरी तरह से समाप्त कर देगा।
बदले में, भारत भी यूरोपीय संघ की लगभग 86% टैरिफ लाइनों पर शुल्क कम करेगा। यह डील सेमीकंडक्टर, डिजिटल टेक्नोलॉजी और क्रिटिकल मिनरल्स के क्षेत्र में भारत की स्थिति को गेम-चेंजर बना देगी।
2. €150 बिलियन के रक्षा फंड (SAFE) में भारत की एंट्री:
यूरोप ने अपनी सैन्य उत्पादन क्षमता को बढ़ाने के लिए एक विशाल कानून पारित किया है, जिसे SAFE (सिक्योरिटी एक्शन फॉर यूरोप) नाम दिया गया है। इसके तहत 150 अरब यूरो का एक विशाल रक्षा फंड तैयार किया गया है। भारत और यूरोप के बीच बढ़ते रणनीतिक संबंधों का ही नतीजा है कि भारत उन चुनिंदा गैर-यूरोपीय देशों (Non-EU Nations) में शामिल हो गया है जो इस फंडिंग ढांचे का लाभ उठाने और रक्षा विनिर्माण (Defense Manufacturing) में भाग लेने के लिए पात्र हैं।
बता दें कि जैसे-जैसे यूरोप वाशिंगटन के दबाव में अपनी 'रणनीतिक स्वायत्तता' और रक्षा उत्पादन को मजबूत करेगा, वैसे-वैसे नई दिल्ली के लिए रक्षा विनिर्माण, इंडो-पैसिफिक सुरक्षा और क्लीन एनर्जी के क्षेत्र में साझेदारी के अभूतपूर्व अवसर पैदा होंगे। ट्रंप के दौर में यूरोप का यह नया रूप भारत की बहु-ध्रुवीय (Multi-polar) विदेश नीति के लिए एक बेहद मजबूत स्तंभ साबित हो सकता है।
