US Iran Conflict: ईरान के साथ जारी सैन्य तनाव और युद्ध जैसी परिस्थितियों के बीच अमेरिका को उसके सबसे भरोसेमंद माने जाने वाले मध्य-पूर्व (मिडिल ईस्ट) के सहयोगियों से बड़ा झटका लगा है। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने पिछले 24 घंटों के भीतर अमेरिका के खिलाफ दो बेहद कड़े फैसले लिए हैं, जिन्हें कूटनीतिक हलकों में 'दुश्मन जैसे कदम' के तौर पर देखा जा रहा है।
इन दोनों देशों ने न केवल अमेरिकी खजाने (ट्रेजरी) से भारी-भरकम रकम वापस निकाल ली है, बल्कि ईरान पर दोबारा सैन्य हमला करने की अमेरिकी योजना पर भी पानी फेर दिया है। आधिकारिक आर्थिक आंकड़ों के मुताबिक, सऊदी अरब और यूएई ने अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड से अपनी जमापूंजी को तेजी से निकालना शुरू कर दिया है और दोनों देशों ने मिलकर कुल 15 अरब डॉलर (करीब 1.25 लाख करोड़ रुपये) की रकम वापस ले ली है।
दोनों देशों ने कितने पैसे अमेरिकी कोष से निकाले
इस निकासी के तहत मार्च महीने में सऊदी अरब ने अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड में अपनी हिस्सेदारी को 10.8 बिलियन डॉलर तक घटा दिया, जिसके बाद अब अमेरिकी कोष में सऊदी का केवल 149.6 बिलियन डॉलर ही शेष बचा है। इसी तर्ज पर यूएई ने भी अमेरिकी ट्रेजरी से 5.8 बिलियन डॉलर की भारी-भरकम पूंजी वापस निकाल ली है, जिससे अमेरिकी कोष में यूएई की कुल जमापूंजी घटकर 114.1 बिलियन डॉलर रह गई है।
डॉलर की मजबूती पर पड़ेगा असर
अमेरिका दुनिया भर के देशों को ट्रेजरी बॉन्ड बेचकर कर्ज जुटाता है, जिसका इस्तेमाल वह अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत रखने और विकास कार्यों के लिए करता है। ऐसे में सऊदी और यूएई द्वारा अचानक पैसा निकालने से वैश्विक बाजार में अमेरिकी अर्थव्यवस्था और डॉलर की मजबूती पर असर पड़ेगा, जिससे अन्य देशों का भी अमेरिकी बाजार पर भरोसा डगमगा सकता है और अमेरिका के लिए कर्ज लेना महंगा हो जाएगा।
पैसे निकालने के आर्थिक झटके के साथ ही दोनों अरब देशों ने अमेरिका को सबसे बड़ा कूटनीतिक और सैन्य झटका दिया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप मंगलवार (19 मई) को ईरान पर एक और बड़ा सैन्य हमला करने की तैयारी में थे और अमेरिकी सेना हमले से महज एक घंटे की दूरी पर थी, लेकिन अंतिम क्षणों में सऊदी अरब और यूएई के कड़े विरोध के चलते उन्हें यह फैसला टालना पड़ा।
दोनों देशों ने क्या दिया तर्क?
जब अमेरिका ने इस हमले को लेकर दोनों देशों से रणनीतिक सहयोग मांगा, तो सऊदी और यूएई ने साफ तौर पर इनकार कर दिया क्योंकि दोनों देशों का तर्क था कि इस युद्ध के बढ़ने से उनके अपने तेल ठिकानों और नागरिक बुनियादी ढांचों को भारी नुकसान पहुंचेगा।
अरब देशों के इस कड़े रुख के बाद अमेरिका बैकफुट पर दिखाई दे रहा है और फिलहाल कतर की मध्यस्थता में ईरान के साथ एक बार फिर परमाणु समझौते को लेकर बातचीत का रास्ता तलाशा जा रहा है।
ईरान का भी कहना है कि यदि शर्तें मानी जाती हैं, तो वह सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण 'होर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) को व्यापार के लिए पूरी तरह बहाल कर सकता है। बहरहाल, सऊदी और यूएई के इस कदम ने यह साफ कर दिया है कि मध्य-पूर्व के देश अब वाशिंगटन के इशारों पर अपनी सुरक्षा को दांव पर लगाने के मूड में बिल्कुल नहीं हैं।
