Ceasefire talks : अमेरिका और ईरान के बीच इस्लामाबाद में साजीफायर पर हुई वार्ता नाकाम होने के पीछे कई वजहें हैं। पहला तो यही है कि अमेरिका और ईरान पहले ही से ही एक तरह से मन बनाकर आए थे कि वे 'कुछ शर्तों' को बिल्कुल ही नहीं मानेंगे। किसी भी सीजफायर वार्ता (Iran US talks) के सफल होने की पहली शर्त भरोसा है। दोनों पक्षों में इस विश्वास, भरोसे का अभाव था। इस वार्ता की मेजबानी में पाकिस्तान की सरकार ने 'गोपनीयता' के नाम पर जिस तरह की 'घोर अपारदर्शिता' रखी, उसे वहीं के पत्रकारों ने बेनकाब कर दिया। करीब दो दिन के इस कार्यक्रम को कवर करने पहुंचे पाकिस्तान के नामी-गिरामी पत्रकारों ने 'अव्यवस्थता एवं अपारदर्शिता' के लिए शहबाज सरकार की पोल खोल दी है।
‘व्हाट्सएप पत्रकारिता’ पर उठाए सवाल
वरिष्ठ पाकिस्तानी पत्रकार मुबाशिर जैदी ने अपने ही पत्रकार समुदाय की आलोचना करते हुए देश में चल रही ‘व्हाट्सएप पत्रकारिता’ पर सवाल उठाए। X पर जैदी ने लिखा, 'अधिकांश पाकिस्तानी पत्रकारों के पास अंतरराष्ट्रीय घटनाओं या कूटनीति का अनुभव नहीं है। लेकिन यह भी ध्यान देने वाली बात है कि अमेरिकी और ईरानी पत्रकारों को उनके राजनयिकों द्वारा जानकारी दी जा रही थी, जबकि हमारे पत्रकारों को कोई जानकारी नहीं दी गई। वे वैसे भी व्हाट्सएप पर निर्भर रहते हैं, लेकिन जब वहां से भी कोई संदेश नहीं आया, तो वे पूरी तरह जानकारी से वंचित रह गए।'

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खबरों को कोई महत्व नहीं दिया जाता-मजहर
इसके बाद अन्य पत्रकार भी इस बहस में शामिल हो गए। खोजी पत्रकार सादिया मजहर ने इसे सरकारी एजेंसियों की विफलता बताया, जिन्होंने पाकिस्तानी मीडिया हाउसों में दखल दिया हुआ है। X पर उन्होंने कहा कि 'हमारा मंत्रालय भी अंतरराष्ट्रीय आयोजनों का अनुभव नहीं रखता जो व्यवस्थाएं उनके लिए आकर्षक थीं, वे बड़े आयोजनों में सामान्य होती हैं, हमारी सरकार ने संस्थानों को पैसे देकर अपने पसंद के लोगों को नियुक्त कर सभी की आवाज दबा दी है, और इस मुद्दे पर खबरों को कोई महत्व नहीं दिया जाता।'
'न्यूज चैनलों की साख गिर गई है'
धीरे-धीरे पाकिस्तानी मीडिया का डिजिटल स्पेस विश्वसनीयता पर बड़ी बहस का केंद्र बन गया। कई वरिष्ठ पत्रकारों के अनुसार, न्यूजरूम में असहमति को प्रभावी रूप से दबा दिया गया है। पत्रकार इमरान मीर ने X पर लिखा, 'अयोग्य लोगों की नियुक्ति से न्यूज चैनलों की साख गिर गई है। रिपोर्टिंग लगभग खत्म हो चुकी है और उसकी जगह व्हाट्सएप ने ले ली है। पेशेवर संपादकों को पसंद नहीं किया गया और उन्हें जबरन हटा दिया गया। अब न्यूज चैनल मुख्य रूप से एंकरों, पूर्व सरकारी अधिकारियों या एडमिन और HR के प्रवक्ताओं के नियंत्रण में हैं।' इसके बाद यह मुद्दा और व्यापक हो गया—यहां तक कि वरिष्ठ पत्रकारों की कार्यशैली और आदतों पर भी सवाल उठने लगे।
झपकी लेते पाए गए कुछ वरिष्ठ पत्रकार
पाकिस्तानी न्यूज प्रोड्यूसर आतिफ खट्टक ने X पर कहा, 'हमारे पत्रकारों को तो गैजेट्स का सही इस्तेमाल तक नहीं आता। वे कैमरामैन और अन्य सहयोगी स्टाफ पर निर्भर रहते हैं और अकेले काम नहीं कर सकते। हमारे पत्रकार जल्दी सो भी जाते हैं, और सूत्रों के अनुसार कुछ वरिष्ठ पत्रकारों को झपकी लेते हुए भी पाया गया है।'
