ईरान में बीते कई दिनों से हालात तेजी से बदल रहे हैं। देश के अलग अलग शहरों में सरकार विरोधी प्रदर्शन जारी हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इतने बड़े स्तर पर जारी विरोध प्रदर्शन ईरान में इस्लामिक क्रांति के बाद बीते 47 सालों में कभी नहीं देखे गए हैं। न सिर्फ ईरान बल्कि अन्य देशों में भी भी इसकी आंच दिख रही है। लंदन में ईरानी दूतावास पर एक प्रदर्शनकारी ने ईरान का इस्लामिक रिपब्लिक के प्रतीक झंडे को उतार फेंका वहीं उसकी जगह शेरो खुर्शीद निशान वाले झंडे को फहराया गया। ऐसे में सवाल यह है कि ईरानी प्रदर्शनकारी इस झंडे को क्यों फहरा रहे हैं। इसकी जड़ें कहां से हैं? क्या पहले यही झंड़ा ईरान का राष्ट्रीय ध्वज था? आज हम इसी बारे में आपको जानकारी देंगे। साथ ही यह भी बताएंगे कि ईरान के वर्तमान झंडे की विशेषताएं क्या हैं। इसे कब राष्ट्रीय ध्वज का दर्जा दिया गया? आइये जानते हैं....
लंदन से तेहरान तक प्रदर्शनकारियों के हाथों में इस समय ईरान का पुराना प्रतीक शेर और सूरज के निशान वाला झंडा है। 1979 की क्रांति के बाद इसे बदल दिया गया था और इसकी जगह इस्लामिक रिपब्लिक वाला झंडा लाया गया। हालांकि शेर और सूर्य वाले झंडे का इस्तेमाल कई ईरानी विपक्षी समूह इस्लामी गणराज्य के विरोध में करते रहे। आज यह ईरान में प्रदर्शनकारियों की पहचान बना हुआ है। ऐसे में सवाल यह है कि ईरानी प्रदर्शनकारी इस झंडे को क्यों फहरा रहे हैं। इसकी जड़ें कहां से हैं? क्या पहले यही झंड़ा ईरान का राष्ट्रीय ध्वज था? आज हम इसी बारे में आपको जानकारी देंगे। साथ ही यह भी बताएंगे कि ईरान के वर्तमान झंडे की विशेषताएं क्या हैं। इसे कब राष्ट्रीय ध्वज का दर्जा दिया गया? आइये जानते हैं....
वर्तमान में ईरान का झंडा हरे, सफेद और लाल रंग वाला है। यह इस्लामिक रिपब्लिक का प्रतीक है। इसमें सफेद रंग की पट्टी के बीच में लाल रंग से 'अल्लाह' लिखा गया है। ये ट्यूलिप फूल के आकार में लिखा गया है। प्रतीक और किनारों पर कुफिक लिपि में 22 बार 'अल्लाहु अकबर' (ईश्वर महान है) लिखा है। ये इस्लामी क्रांति (22 बहमन) को दिखाता है। वहीं, हरा रंग इस्लाम और विकास, सफेद शांति और लाल रंग बहादुरी और शहादत का प्रतीक है, जबकि केंद्रीय प्रतीक अल्लाह का प्रतिनिधित्व करता है ।
ईरानी प्रदर्शनकारी वर्तमान में इस्लामिक रिपब्लिक के झंडे के बजाय शेर और सूरज के निशान वाले शेर-ओ-खुर्शीद झंडे का उपयोग कर रहे हैं। ऐसा वे विरोध और असहमति के प्रतीक के रूप में कर रहे हैं।
शेर और सूरज के प्रतीक का एक साथ प्रयोग पहली बार 12वीं सदी में ईरान में हुआ था। सफाविद और कजार राजवंश के शसन के दौरान इस निशान को आधिकारिक तौर पर राजकीय निशान बनाया गया था। तब सिक्कों और उस समय की कलाकृतियों में इसका प्रयोग किया गया था। तब से इसका प्रयोग होता रहा। फिर जब ईरान में पहलवी वंश का शासन आया तो 1906 में इस निशान को ईरान के राष्ट्रीय ध्वज में जगह दी गई। हालाँकि बाद में इस ध्वज को पहलवी शासन से जोड़कर देखा जाने लगा, लेकिन इसकी जड़ें ईरान के प्राचीन इतिहास और परंपराओं में गहराई से जुड़ी हैं। ऐतिहासिक रूप से, यह प्रतीक पहले शिया इमाम अली के शासन को भी दर्शाता है।
फिर ईरान में ईरानी क्रांति का दौर आया। 1979 इस क्रांति के बाद राजशाही खत्म हुई और सत्ता अयातुल्ला खामेनेई के हाथ में आई। सत्ता हाथ में लेने के बाद उन्होंने शेर-ओ-खुर्शीद के निशान वाले झंडे को राजशाही का प्रतीक बताते हुए इसे बदल दिया।नए झंडे में ट्यूलिप के आकार में 'अल्लाह' शब्द शामिल किया गया, जिसे वर्तमान प्रदर्शनों के दौरान प्रदर्शनकारी फाड़ते हुए देखे जा रहे हैं।
वर्तमान में, ईरान में बढ़ती महंगाई और करेंसी की भारी गिरावट के कारण जनता में भारी गुस्सा है। यह विरोध अब ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामिनेई के शासन को खत्म करने की मांग तक पहुंच चुका है। इसी असंतोष को व्यक्त करने के लिए शेर और सूरज वाला झंडा लहराया जा रहा है।