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पिता के हत्यारे को पकड़ने के लिए पुलिस में शामिल हुई बेटी, 25 साल बाद पूरा हुआ इंतकाम

Brazil Police Officer: ब्राजील में गिराल्डो की फरवरी 1999 में 20 पाउंड के कर्ज के चलते गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। यह घटना तब हुई जब गिराल्डो अपने एक दोस्त के साथ बैठे थे। इसके बाद गिराल्डो की बेटी डेउस ने पुलिस अधिकारी बनने की कसम खाई और अपने पिता के कातिल को सलाखों के पीछे पहुंचाया।

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Brazil police officer

Photo : iStock

Brazil Police Officer: ब्राजील के बाओ विस्टा की रहने वाली गिस्लेने डे डेउस की कहानी आपको फिल्मी लग सकती है, लेकिन उनकी कहानी सच है। दअरसल, डेउस जब 9 साल की थीं, जब उनके पिता की बेहरमी से हत्या कर दी गई थी। पांच बहनों में सबसे बड़ी डेउस पर परिवार की जिम्मेदारी थी, तो पिता के कातिल को सलाखों के पीछे पहुंचाने का इरादा भी। अपने इंतकाम को पूरा करने के लिए उन्होंने पुलिस अधिकारी बनने का सपना देखा और करीब 25 साल बाद कातिल को सलाखों के पीछे पहुंचाकर उन्होंने अपना इंतकाम पूरा किया।

जानकारी के मुताबिक, पुलिस अधिकारी डेउस के पिता गिराल्डो की फरवरी 1999 में 20 पाउंड के कर्ज के चलते गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। यह घटना तब हुई जब गिराल्डो अपने एक दोस्त के साथ बैठे थे। इसी दौरान 20 पाउंड के कर्ज के लिए रेमुंडो गोम्स नाम के एक शख्स के साथ उनकी तीखी नोकझोंक हो गई, जिसके बाद गोम्स ने गिलवाडो की हत्या कर दी।

हत्या के बाद फरार हो गया गोम्स

रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस हत्याकांड के बाद गोम्स पकड़ा गया और उस पर मुकदमा चला। 2013 में उसे 12 साल की सजा सुनाई गई। हालांकि, फैसले के खिलाफ अपील करते हुए उसने कारावास से बचने की कोशिश की। 2016 में उनकी अंतिम अपील खारिज होने के बाद गिरफ्तारी वारंट जारी किया गया, लेकिन गिरफ्तारी से पहले गोम्स फरार हो गया। इसके बाद उसकी तलाश फाइलों में ही सिमटकर रह गई।

पुलिस में भर्ती हुई बेटी

पिता के हत्यारे का पता लगाने के लिए बेटी डेउस ने 18 साल की उम्र में कानून की पढ़ाई शुरू की और बाद में पुलिस बल में शामिल हो गईं। इसके बाद उन्होंने अपने पिता के हत्यारे की तलाश शुरू कर दी। काफी मेहनत के बाद डेउस ने गोम्स का पता लगा लिया और आखिरकार 25 सितंबर को उसे गिरफ्तार कर लिया। 26 सितंबर को उसे अदालत में पेश किया गया, जहां उसकी सजा को बरकरार रखा गया और उसे 12 साल के लिए जेल भेज दिया गया।

Pranjul Srivastava
प्रांजुल श्रीवास्तवauthor

<p>मैं इस वक्त टाइम्स नाउ नवभारत से जुड़ा हुआ हूं। पत्रकारिता के 8 वर्षों के तजुर्बे में मुझे और मेरी भाषाई समझ को गढ़ने और तराशने में कई वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों का योगदान रहा। 2016 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शुरू हुआ यह सफर देश की राजधानी दिल्ली में 'टाइम्स नाउ नवभारत' तक आ पहुंचा है। अखबारों में रिपोर्टिंग करते हुए शहरों की धूल फांकना और डिजिटल पत्रकारिता की बारीकियों को समझते हुए देश-विदेश की खबरों को आप तक पहुंचाने का मेरा ये सफर काफी किस्से-कहानियों से भरा हुआ है। लखनऊ की बाबा भीम राव अंबेडकर सेंट्रल यूनिवर्सिटी के क्लासरूम में प्रोफेसरों से मिले किताबी ज्ञान और पत्रकारीय सिद्धांतों को जमीन पर उतारने का मौका मुझे 2016 में ही मिल गया। पहला ब्रेक टाइम्स ग्रुप के प्रतिष्ठित अखबार 'नवभारत टाइम्स' ने दिया। यहां बतौर इंटर्न मुझे कई सामाजिक संगठनों की रिपोर्टिंग करने का मौका मिला। दिनभर शहर में घूम-घूम कर खबरों को बटोरना और शाम होते ही उन्हें लिखकर डेस्क के हवाले करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा हो गया। इस अनुभव ने मुझे समाज के तौर तरीकों से परिचित कराया तो न्यूजरूम में सीनियर्स से मिली डांट ने पत्रकारिता की बारीकियों और भाषाई मर्यादा को समझने में मदद की। करीब 3 से 4 महीनों की इंटर्नशिप के बाद मुझे 2017 आते-आते गांधी परिवार के गढ़ रायबरेली भेजा गया। यह समय उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव और सत्ता के बदलाव का था। यहां बतौर रिपोर्टर मैं पहली बार राजनीतिक खबरों से रूबरू हुआ। रायबरेली के मिजाज को करीब 8 महीनों तक समझने के बाद नवभारत टाइम्स ने मुझे वापस लखनऊ बुलाया और शहर की रिपोर्टिंग करने का मौका दिया। यहां विज्ञान, पर्यावरण, बाजार, लखनऊ विकास प्राधिकरण, आवास विकास और मेट्रो जैसी बीट पर जमकर काम किया। यह सफर अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले मुरादाबाद तक पहुंच गया था, जहां मुझे दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित अखबार के लिए दो वर्षों तक रिपोर्टिंग करने का अवसर मिला। करीब दो वर्षों की पत्रकारिता के बाद अब मुझे देश की राजधानी की ओर रुख करना था और यह मौका अमर उजाला (डिजिटल) ने दिया। अखबारों की रिपोर्टिंग से निकलकर डिजिटल पत्रकारिता के अनुभव से मैं पहली बार रूबरू हो रहा था। यहां पर मुझे मेन डेस्क पर जिम्मेदारी मिली। जहां सबसे आगे रहते हुए सबसे सटीक खबरें आप तक पहुंचाना चुनौती भरा काम था, लेकिन पत्रकारिता की शुरुआत में मिले अनुभवों ने मेरा काम आसान बना दिया। यहां भी करीब दो वर्षों के बाद 2023 में मुझे टाइम्स ग्रुप से दोबारा जुड़ने का मौका मिला और टाइम्स नाउ नवभारत की मेन डेस्क पर मेरा सफर अब तक जारी है।</p>

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