Boss called employee potato: आयरलैंड की एक महिला को कार्यस्थल पर नस्लीय उत्पीड़न का सामना करने के बाद रोजगार न्यायाधिकरण से लगभग ₹29 लाख का मुआवजा मिला है। यह फैसला तब आया जब अदालत ने पाया कि उसके नियोक्ता ने बार-बार उसे “आलू” कहकर पुकारा और उसकी आयरिश पृष्ठभूमि का मजाक उड़ाया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बर्नाडेट हेस नाम की यह महिला इंजीनियरिंग कंपनी वेस्ट लीड्स सिविल्स में काम करती थीं। उन्होंने आरोप लगाया कि कंपनी के निदेशक मिक एटकिंस अक्सर उनके सामने और दूसरे कर्मचारियों के सामने भी अपमानजनक टिप्पणियां करते थे। हेस के मुताबिक, जैसे ही वह ऑफिस में प्रवेश करती थीं, उनका बॉस जोर से “पोटैटो” यानी “आलू” चिल्लाने लगता था।
हेस ने बताया कि यह सब सिर्फ एक बार नहीं बल्कि कई महीनों तक लगातार होता रहा। कई बार तो वह उनसे बिना कोई बात किए ही यह शब्द बोल देता था। इतना ही नहीं, व्हाट्सएप पर बातचीत के दौरान भी एटकिंस उन्हें “आलू” लिखकर संदेश भेजता था। हेस का कहना है कि इस तरह की टिप्पणियों ने उनके आत्मसम्मान और आत्मविश्वास को बुरी तरह प्रभावित किया। उन्होंने बताया कि लगातार मजाक और तानों की वजह से उन्हें बहुत शर्मिंदगी महसूस होती थी। वह खुद को छोटा और असुरक्षित महसूस करने लगी थीं। धीरे-धीरे स्थिति इतनी खराब हो गई कि उन्हें ऑफिस जाने से डर लगने लगा।
हेस ने किए कई खुलासे
उन्होंने कहा कि उस समय उन्हें कई मानसिक परेशानियों का सामना करना पड़ा। तनाव की वजह से उन्हें पैनिक अटैक आने लगे और रात में नींद भी ठीक से नहीं आती थी। सुबह उठते ही उनके मन में यही डर रहता था कि आज ऑफिस में फिर क्या होगा। कई बार वह ऑफिस की पार्किंग में कार में ही बैठी रहती थीं और खुद को अंदर जाने के लिए हिम्मत जुटाती थीं। हेस ने यह भी बताया कि उनके बॉस ने उनकी आयरिश पहचान को लेकर और भी अपमानजनक बातें कीं। उन्होंने दावा किया कि एटकिंस ने उन्हें “जिप्सी” और “ट्रैवलर” जैसे शब्दों से भी पुकारा। इसके अलावा वह अक्सर मजाक उड़ाते हुए कहते थे कि हेस ऑफिस के बाहर यात्रियों के पीछे घूमती रहती हैं।
अदालत ने अपने फैसले में कही ये अहम बात
हालांकि, सुनवाई के दौरान यह बात भी सामने आई कि एक बार हेस ने खुद भी बातचीत में “आलू” शब्द का इस्तेमाल किया था और एक बार सब्जी का इमोजी भी भेजा था। लेकिन रोजगार न्यायाधीश ने माना कि उन्होंने ऐसा माहौल में फिट होने और स्थिति को हल्का बनाने की कोशिश में किया था।
न्यायाधीश ने यह भी कहा कि हेस ने कई बार अपने बॉस को स्पष्ट रूप से बताया था कि उन्हें इस तरह की बातें बिल्कुल भी मजेदार नहीं लगतीं। इसके बावजूद एटकिंस का व्यवहार नहीं बदला। अदालत ने माना कि यह लगातार होने वाला नस्लीय उत्पीड़न था, जिसने हेस के मानसिक स्वास्थ्य और कामकाजी जीवन पर गंभीर असर डाला।
न्यायाधिकरण ने अपने फैसले में कहा कि इस तरह का व्यवहार किसी भी कर्मचारी के लिए बेहद अपमानजनक और अस्वीकार्य है। इसलिए हेस को कुल £23,526 यानी करीब ₹29 लाख का मुआवजा देने का आदेश दिया गया। इसमें से £13,000 उनकी भावनाओं को ठेस पहुंचने के लिए और £6,014 उनकी आय के नुकसान के लिए शामिल हैं। वहीं, मिक एटकिंस ने इस फैसले को खारिज करते हुए पूरी कार्यवाही को “शुरू से अंत तक बकवास” बताया। हालांकि अदालत ने साफ कहा कि कार्यस्थल पर सम्मानजनक माहौल बनाए रखना हर नियोक्ता की जिम्मेदारी है और किसी भी तरह का नस्लीय मजाक या अपमान बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
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