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Independence Day Travel: इन रास्तों पर चले थे क्रांतिकारी, Uttar Pradesh में यहां आज भी जिंदा हैं बलिदान की कहानियां

Independence Day Travel: इस स्वतंत्रता दिवस परिवार और बच्चों के साथ उत्तर प्रदेश के मेरठ, काकोरी, झांसी, लखनऊ रेजीडेंसी, चौरी-चौरा और शाहजहांपुर जैसे ऐतिहासिक स्थानों की यात्रा करें और आजादी के संघर्ष को करीब से जानें।

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उत्तर प्रदेश में यहां देखें आजादी के संघर्ष की कहानी

Independence Day Travel: हर साल 15 अगस्त को हम तिरंगा फहराते हैं, राष्ट्रगान गाते हैं और स्वतंत्रता सेनानियों को याद करते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिन घटनाओं के बारे में हम किताबों में पढ़ते आए हैं, उन्हें उन्हीं जगहों पर जाकर महसूस किया जाए जहां वे वास्तव में घटी थीं!

उत्तर प्रदेश में ऐसी कई जगहें (Uttar Pradesh Historical Places) हैं, जहां आज भी आजादी के संघर्ष की यादें मौजूद हैं। कहीं पुरानी दीवारों पर गोलियों के निशान दिखाई देते हैं तो कहीं स्मारक उन क्रांतिकारियों की कहानी सुनाते हैं, जिन्होंने देश के लिए अपना जीवन दे दिया। इस स्वतंत्रता दिवस पर यदि आप परिवार के साथ बाहर जाने का मन बना रहे हैं तो किसी सामान्य पिकनिक स्पॉट की जगह इन ऐतिहासिक स्थानों (Freedom Struggle Places in UP) को अपनी सूची में शामिल कर सकते हैं।

मेरठ से करें 1857 की क्रांति को समझने की शुरुआत

आजादी के संघर्ष की यात्रा शुरू करनी हो तो मेरठ सबसे बेहतर जगह रहेगी। 10 मई 1857 को भारतीय सैनिकों ने यहीं अंग्रेजी शासन के खिलाफ विद्रोह कर दिया था। बाद में यह विद्रोह देश के कई हिस्सों में फैल गया।

मेरठ जाएं तो शहीद स्मारक और राजकीय स्वतंत्रता संग्राम संग्रहालय जरूर देखें। यहां चित्रों, प्रतिमाओं और दूसरी ऐतिहासिक वस्तुओं के माध्यम से 1857 की क्रांति की पूरी कहानी समझाई गई है। बच्चों को यहां लाना इसलिए भी अच्छा रहेगा क्योंकि किताब में पढ़ी गई घटनाओं को वे चित्रों और प्रदर्शित वस्तुओं के माध्यम से आसानी से समझ पाएंगे।

इसके बाद औघड़नाथ मंदिर जा सकते हैं, जिसे काली पलटन मंदिर भी कहा जाता है। बताया जाता है कि 1857 के विद्रोह से पहले भारतीय सैनिक यहां आया करते थे। आज यह मंदिर धार्मिक आस्था के साथ स्वतंत्रता संग्राम की यादों को भी अपने भीतर समेटे हुए है।

काकोरी पहुंचकर सुनें क्रांतिकारियों के साहस की कहानी

लखनऊ के आसपास रहते हैं तो स्वतंत्रता दिवस पर काकोरी शहीद स्मारक जाने की योजना बना सकते हैं। इसी जगह पर 9 अगस्त 1925 को क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी सरकार का खजाना ले जा रही ट्रेन को रोका था।

काकोरी ट्रेन एक्शन से राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी और चंद्रशेखर आजाद जैसे क्रांतिकारी जुड़े थे। उनका मकसद किसी यात्री को लूटना या निजी लाभ कमाना नहीं बल्कि अंग्रेजी सरकार का खजाना हासिल करके उसका इस्तेमाल स्वतंत्रता आंदोलन को आगे बढ़ाने का था।

स्मारक पर पहुंचकर जब आप इन क्रांतिकारियों के नाम पढ़ेंगे, तब शायद समझ पाएंगे कि अंग्रेजी सरकार को चुनौती देने के लिए कितने साहस की जरूरत रही होगी। बच्चों को भी बताएं कि देश की आजादी केवल भाषणों से नहीं मिली। इसके लिए अनेक युवाओं ने अपनी पढ़ाई, परिवार और जीवन तक दांव पर लगा दिया था।

लखनऊ रेजीडेंसी की दीवारें आज भी सुनाती हैं 1857 की कहानी

लखनऊ घूमने की बात हो तो आमतौर पर बड़ा इमामबाड़ा, भूलभुलैया और रूमी दरवाजा याद आते हैं। लेकिन स्वतंत्रता दिवस के आसपास यहां जा रहे हैं तो ब्रिटिश रेजीडेंसी को छोड़ना नहीं चाहिए।

रेजीडेंसी परिसर 1857 के संघर्ष का प्रमुख केंद्र रहा था। यहां की टूटी इमारतें और दीवारों पर मौजूद गोलियों के निशान उस दौर की लड़ाई की गंभीरता का अंदाजा देते हैं। परिसर में 1857 मेमोरियल म्यूजियम भी है, जहां चित्रों, पुराने दस्तावेजों, नक्शों और दूसरी ऐतिहासिक वस्तुओं के जरिए उस समय की घटनाओं को समझा जा सकता है।

यहां केवल तेजी से घूमकर बाहर न निकलें। कुछ देर रुककर इमारतों को ध्यान से देखें। बच्चों को बताएं कि जिन निशानों को वे आज दीवारों पर देख रहे हैं, वे किसी फिल्म के सेट पर नहीं बनाए गए। वे वास्तव में उस संघर्ष के गवाह हैं, जिसने अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिला दी थी।

झांसी के किले में महसूस करें रानी लक्ष्मीबाई का साहस

रानी लक्ष्मीबाई की कहानी बचपन से सुनते आए हैं, लेकिन झांसी का किला देखने के बाद उनकी वीरता को एक अलग तरह से महसूस किया जा सकता है। ऊंची पहाड़ी पर बने इस किले से आसपास का बड़ा क्षेत्र दिखाई देता है। ऐसे में यह कल्पना करना आसान हो जाता है कि रानी और उनके सैनिकों ने अंग्रेजी सेना का सामना किस तरह किया होगा।

किले में रानी से जुड़े स्थानों के साथ पुरानी तोपें और दूसरी ऐतिहासिक संरचनाएं देखी जा सकती हैं। झांसी जाएं तो रानी महल और सरकारी संग्रहालय को भी यात्रा में शामिल करें। बच्चों को रानी लक्ष्मीबाई की कहानी सुनाते समय यह जरूर बताएं कि आजादी की लड़ाई में महिलाओं ने भी पुरुषों के साथ खड़े होकर संघर्ष किया था।

चौरी-चौरा में समझें आंदोलन का कठिन मोड़

गोरखपुर जा रहे हैं तो उसके पास स्थित चौरी-चौरा शहीद स्मारक भी देखा जा सकता है। 4 फरवरी 1922 को यहां असहयोग आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच टकराव हुआ था। घटना ने हिंसक रूप ले लिया, जिसके बाद महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस लेने का फैसला किया।

यह घटना हमें बताती है कि स्वतंत्रता आंदोलन की राह में कई कठिन फैसले, असहमतियां और उतार-चढ़ाव आए। चौरी-चौरा स्थित स्मारक और संग्रहालय में जाकर उस घटना और उससे जुड़े लोगों के बारे में अधिक जानकारी हासिल की जा सकती है।

शाहजहांपुर में जानें बिस्मिल और अशफाक की दोस्ती

शाहजहांपुर का नाम राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्ला खां के बिना अधूरा है। दोनों अलग-अलग धार्मिक परिवारों में पैदा हुए थे, लेकिन उनका सपना एक था- भारत की आजादी।

इनकी दोस्ती आज भी हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल मानी जाती है। शाहजहांपुर में उनसे जुड़े स्मृति स्थलों को देखते हुए बच्चों को यह कहानी जरूर सुनाएं। उन्हें बताएं कि अंग्रेजी शासन से लड़ने वाले क्रांतिकारियों के बीच धर्म की दीवार नहीं थी। उनके लिए देश सबसे पहले था।

Medha Chawla
मेधा चावलाauthor

मेधा चावला टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में सीनियर एसोसिएट एडिटर हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन की लीड हैं। लाइफस्टाइल पत्रकारिता में 20 वर्षों का अनुभव रखने वाली मेधा की विशेषज्ञता हेल्थ, वेलनेस, फिटनेस, मेंटल हेल्थ, डेली लाइफ इम्प्रूवमेंट, ह्यूमन-इंटरेस्ट फीचर्स और रिसर्च-बेस्ड स्टोरीज तक फैली है। उनकी लेखन शैली पाठकों को जटिल स्वास्थ्य और जीवनशैली संबंधी विषयों को आसान, समझने योग्य और व्यवहारिक रूप में प्रस्तुत करती है, जिससे उनका कंटेंट व्यापक पाठक समूह से जुड़ता है। अबतक 30,000 से अधिक कंटेंट पीस लिख चुकी मेधा की कई एक्सक्लूसिव स्टोरीज डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ट्रेंड सेट कर चुकी हैं।

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