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अब छत पर लगेगा लैपटॉप जैसा छोटा एंटीना, बड़ी डिश लगाने की जरूरत खत्म

ArrayLink केवल एक कॉन्सेप्ट नहीं है। शोधकर्ताओं ने 27 GHz फ्रीक्वेंसी पर वास्तविक हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर-डिफाइंड रेडियो की मदद से बाहरी टेस्ट भी किए हैं। परीक्षणों के नतीजे कंप्यूटर सिमुलेशन से काफी हद तक मेल खाते हैं।

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अब छत पर लगेगा लैपटॉप जैसा छोटा एंटीना, बड़ी डिश लगाने की जरूरत खत्म/photo- Areli Alvarez, UC San Diego Qualcomm Institute

अक्सर हम लोगों के छत पर गोल डिश एंटीना देखते हैं और आज से नहीं, बल्कि कई वर्षों से देखते आ रहे हैं, लेकिन अब इनके दिन लदने वाले हैं। हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं, क्योंकि अब गोल डिश एंटीना खत्म होने वाले हैं और उनकी जगह लैपटॉप की तरह फ्लैट एंटीना का इस्तेमाल होंगे।

पृथ्वी और अंतरिक्ष के बीच डेटा कनेक्टिविटी के लिए आज भी बड़े और महंगे डिश एंटीना पर निर्भरता बनी हुई है। अब अमेरिका के शोधकर्ताओं ने एक ऐसी नई तकनीक विकसित की है, जो भविष्य में इन विशाल डिशों की जगह छोटे और फ्लैट एंटीना नेटवर्क को ला सकती है।

यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के शोधकर्ताओं ने विकसित किया नया सिस्टम

कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, सैन डिएगो के इंजीनियरों ने "ArrayLink" नामक एक नई तकनीक विकसित की है। इस सिस्टम का उद्देश्य बड़े मैकेनिकल सैटेलाइट डिशों को छोटे-छोटे फ्लैट एंटीना पैनलों के नेटवर्क से बदलना है। इन एंटीना को घरों की छतों, टेलीकॉम टावरों और अन्य इमारतों पर लगाया जा सकता है। शोधकर्ताओं का दावा है कि इससे सैटेलाइट डेटा क्षमता बढ़ेगी और ग्राउंड स्टेशनों की लागत भी कम होगी।

क्यों जरूरी है नई तकनीक?

आज सैटेलाइट संचार केवल इंटरनेट तक सीमित नहीं है। GPS नेविगेशन, बैंकिंग ट्रांजैक्शन, मौसम पूर्वानुमान, सैन्य संचार, आपदा प्रबंधन, विमानन, समुद्री परिवहन और रिमोट हेल्थकेयर जैसी कई महत्वपूर्ण सेवाएं सैटेलाइट नेटवर्क पर निर्भर हैं।

पिछले एक दशक में पृथ्वी की कक्षा में सक्रिय सैटेलाइटों की संख्या हजारों से बढ़कर कई गुना हो चुकी है और आने वाले वर्षों में इसमें और तेजी आने की उम्मीद है। लेकिन जमीन पर मौजूद पारंपरिक डिश सिस्टम इस बढ़ती मांग को संभालने में चुनौती महसूस कर रहे हैं।

बड़े डिश एंटीना बन रहे हैं बाधा

वर्तमान में अधिकांश ग्राउंड स्टेशन 1.8 मीटर या उससे बड़े पैराबोलिक डिश एंटीना का उपयोग करते हैं। ये डिश एक समय में केवल एक सैटेलाइट को ट्रैक कर सकते हैं और लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) सैटेलाइट्स का पीछा करने के लिए लगातार घूमते रहते हैं। समस्या यह है कि एक सैटेलाइट से दूसरे सैटेलाइट पर स्विच होने में कई सेकंड से लेकर लगभग एक मिनट तक का समय लग सकता है। इस दौरान ग्राउंड स्टेशन अस्थायी रूप से काम नहीं कर पाता।

ArrayLink कैसे करता है काम?

शोधकर्ताओं ने एक विशाल फेज्ड-अरे एंटीना बनाने के बजाय कई छोटे फेज्ड-अरे पैनलों को एक साथ जोड़कर काम करने का तरीका विकसित किया है। ArrayLink में लैपटॉप के आकार के लगभग 16 एंटीना पैनल एक किलोमीटर तक के क्षेत्र में अलग-अलग स्थानों पर लगाए जाते हैं। अकेले ये पैनल उतने शक्तिशाली नहीं होते, लेकिन एक साथ मिलकर यह बड़े डिश जैसी क्षमता प्रदान कर सकते हैं।

एक साथ कई डेटा स्ट्रीम संभालने की क्षमता

इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह एक ही सैटेलाइट से एक साथ कई स्वतंत्र डेटा स्ट्रीम प्राप्त कर सकती है। यह तकनीक "Near-Field Line-of-Sight MIMO" सिद्धांत पर आधारित है, जो आधुनिक Wi-Fi राउटर और 5G नेटवर्क में इस्तेमाल होने वाली MIMO तकनीक जैसा ही है। इससे डेटा ट्रांसफर की गति और क्षमता में काफी बढ़ोतरी हो सकती है। शोधकर्ताओं के अनुसार, ArrayLink पारंपरिक सिस्टम की तुलना में तीन गुना तक अधिक डेटा थ्रूपुट प्रदान कर सकता है।

5G टावर भी बन सकते हैं सैटेलाइट ग्राउंड स्टेशन

शोध टीम का मानना है कि भविष्य में इन एंटीना नेटवर्क को सीधे 5G सेल टावरों पर लगाया जा सकता है। चूंकि इन टावरों पर पहले से बिजली, फाइबर कनेक्टिविटी और आवश्यक इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद होता है, इसलिए इन्हें आसानी से सैटेलाइट ग्राउंड स्टेशन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।

Pradeep Pandey
प्रदीप पाण्डेय author

प्रदीप पाण्डेय टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में टेक और ऑटो बीट पर कंटेंट तैयार करते हैं। डिजिटल मीडिया में 10 वर्षों के अनुभव के साथ प्रदीप तकनीक की दुनिय... और देखें

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