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AI बना रहा है दिमाग को ‘आलसी’? नई स्टडी में सामने आई चौंकाने वाली बात

AI Side Effects: नई स्टडी के मुताबिक AI का ज्यादा इस्तेमाल आपकी सोचने की क्षमता और मोटिवेशन को कमजोर कर सकता है। जानिए क्या है पूरा मामला और कैसे बचें इसके असर से।

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AI बना रहा है दिमाग को ‘आलसी’? नई स्टडी में सामने आई चौंकाने वाली बात

आजकल लोग हर छोटे-बड़े सवाल के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का सहारा लेने लगे हैं। इससे काम तेज और आसान हो जाता है, लेकिन एक नई स्टडी में चेतावनी दी गई है कि यह सुविधा धीरे-धीरे हमारी सोचने की क्षमता को कमजोर कर सकती है। शुरुआत में यह बदलाव नजर नहीं आता, लेकिन समय के साथ इसका असर गहरा हो सकता है।

स्टडी में क्या सामने आया?

“AI असिस्टेंट रेड्यूस परसिस्टेंस एंड हर्ट्स इंडिपेंडेंट परफॉरमेंस” नाम की स्टडी में अमेरिका और ब्रिटेन के शोधकर्ताओं ने यह समझने की कोशिश की कि जब लोग कठिन सोच वाले काम (जैसे गणित या पढ़ाई) में AI का इस्तेमाल करते हैं तो क्या होता है। नतीजों में पाया गया कि AI के साथ काम करने पर लोग तेजी से और ज्यादा सही जवाब देते हैं, लेकिन असली समस्या तब सामने आती है, जब AI की मदद हटा दी जाती है।

AI हटते ही गिर गई परफॉर्मेंस

रिसर्च में यह देखा गया कि जो लोग AI की मदद से बेहतर प्रदर्शन कर रहे थे, वही लोग बिना AI के अचानक कमजोर पड़ गए। वे ज्यादा गलतियां करने लगे और कई मामलों में जल्दी हार मानने लगे। हैरानी की बात यह रही कि सिर्फ 10 मिनट तक AI की मदद लेने के बाद ही यह असर दिखने लगा।

अलग-अलग प्रयोगों में मिला एक जैसा नतीजा

एक प्रयोग में करीब 350 लोगों को गणित के सवाल दिए गए, जिनमें कुछ को AI की मदद दी गई और कुछ को नहीं। AI इस्तेमाल करने वाले लोगों ने शुरुआत में बेहतर प्रदर्शन किया, लेकिन जैसे ही AI हटाया गया, उनकी क्षमता में गिरावट साफ दिखी। दूसरे और तीसरे प्रयोग में भी यही पैटर्न देखने को मिला, चाहे वह गणित हो या रीडिंग टेस्ट, AI के बिना लोगों की सोचने और प्रयास करने की क्षमता कम हो गई।

सिर्फ स्किल ही नहीं, मोटिवेशन भी हो रहा प्रभावित

स्टडी के सह-लेखक रचित दुबे के अनुसार, समस्या सिर्फ गलत जवाब देने की नहीं है, बल्कि लोग खुद से सोचने की कोशिश भी कम करने लगे हैं। AI पर ज्यादा निर्भरता लोगों में अधीरता बढ़ा सकती है और धीरे-धीरे एक तरह की आदत या निर्भरता बना सकती है।

‘Cognitive Offloading’ का बढ़ता खतरा

इस स्थिति को वैज्ञानिक Cognitive Offloading कहते हैं, जिसमें इंसान अपनी सोचने की जिम्मेदारी मशीनों को सौंप देता है। अगर यह ट्रेंड बढ़ता है, तो इससे हमारी क्रिएटिविटी, आत्मविश्वास और समस्या सुलझाने की क्षमता पर असर पड़ सकता है।

क्या कहती है स्टडी की सीमाएं?

हालांकि यह स्टडी अभी पीयर-रिव्यू नहीं हुई है, लेकिन यह AI के बढ़ते इस्तेमाल को लेकर एक बड़ी बहस को जन्म देती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि हमें सिर्फ यह नहीं देखना चाहिए कि AI हमारे लिए क्या कर सकता है, बल्कि यह भी समझना जरूरी है कि इसके बदले हम क्या खो रहे हैं।

Pradeep Pandey
प्रदीप पाण्डेयauthor

प्रदीप पाण्डेय टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में टेक और ऑटो बीट पर कंटेंट तैयार करते हैं। डिजिटल मीडिया में 10 वर्षों के अनुभव के साथ प्रदीप तकनीक की दुनिया को समझने और उसे आम पाठकों तक सरल व उपयोगी रूप में पहुंचाने के लिए जाने जाते हैं। प्रदीप अब तक 11,000 से अधिक आर्टिकल्स लिख चुके हैं। वह गैजेट रिव्यू, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, टेक टिप्स और नवीनतम टेक इनोवेशन पर लगातार काम करते हैं। एआई टूल्स पर एक्सपेरिमेंट करना, नए ऐप्स टेस्ट करना और टेक से जुड़े प्रैक्टिकल सॉल्यूशंस खोजने में उनकी खास रुचि है।

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