टेक एंड गैजेट्स

साइबर फ्रॉड का तेजी से बढ़ रहा मायाजाल? इन तरीकों से कीजिए अपना बचाव

इन दिनों साइबर फ्रॉड के जरिए काफी लोगों के साथ धोखाधड़ी बढ़ गई है। इससे बचाव के लिए जागरुक होने और हमेशा सतर्क रहना बेहद जरुरी है। आप कुछ चीजों को हमेशा अपनाकर और सतर्क रहकर साइबर धोखाधड़ी से अपना बचाव कर सकते हैं।

Image

साइबर फ्रॉड से बचाव आखिर कैसें (फोटो - टाइम्स नाउ नवभारत)

मेलबर्न: आपके पास एक ऐसी कॉल आती है, जिस पर दूसरी ओर से बोल रहे व्यक्ति खुद को बैंककर्मी बताते हैं। वे आपका नाम जानते है। यहां तक कि आपका क्रेडिट कार्ड नंबर भी उन्हें पता होता है। वे कहते हैं कि आपके बैंक खाते में कुछ “असामान्य गतिविधि” हुई है और उन्होंने कुछ ही देर पहले आपको एक वन टाइम पासवर्ड (ओटीपी) भेजा है ताकि वे आपकी पहचान सत्यापित करके आपकी मदद कर सकें।

आप कोड बताकर निश्चिंत हो जाते हैं, लेकिन इतने में आपके सारे पैसे खाते से निकाल लिये जाते हैं और बैंक यह कहते हुए भरपाई से इनकार कर देता है कि आपने स्वेच्छा से अपना पासकोड साझा करके गोपनीयता की शर्तों का उल्लंघन किया है। ऐसा केवल आपके साथ नहीं होता। हाल में ऑस्ट्रेलिया और दूसरी जगहों पर ऐसे मामलों की संख्या बढ़ती जा रही है। साइबर अपराधी डिजिटल और वास्तविक दुनिया के हथकंडों का इस तरह इस्तेमाल कर रहे हैं कि आपके साथ कब धोखाधड़ी हो जाए, पता ही नहीं चल पाता।

इस तरह के मामलों की शुरुआत जालसाजी वाले ईमेल या फर्जी ऐप से नहीं होती। इनकी शुरुआत डाटा चुराने से होती है। आप कोई गलती करते हैं और उसी दौरान आपका डाटा चुरा लिया जाता है। क्वांटास की हाल की घटना इसका उदाहरण है, जिसमें 57 लाख ग्राहकों की जानकारी उजागर हो गई।कभी-कभी, व्यक्तिगत डाटा को तीसरे पक्ष के जरिये बेचा जाता है। नाम, फोन नंबर, ईमेल और यहां तक कि कार्ड की जानकारी भी नियमित रूप से लीक करके ऑनलाइन कारोबार किया जाता है।

फोन कॉल के जरिए धोखाधड़ी

एक बार यह जानकारी मिल जाने के बाद, धोखेबाज अपना काम शुरू कर देते हैं। फोन कॉल किसी बैंक कर्मी के साथ वास्तविक बातचीत की तरह होती है, वो भी शायद एक नकली कॉलर आईडी के साथ। पीड़ितों पर तत्काल उनकी पहचान “सत्यापित” करने के लिए दबाव डाला जाता है। लोग अक्सर अपना ओटीपी बता देते हैं, जिससे धोखेबाजों के लिए उनके कार्ड विवरण का उपयोग करके धोखाधड़ी करना आसान हो जाता है।

साइबर धोखाधड़ी के एक शिकार एक व्यक्ति से हमने बात की तो उसने बताया कि उसे लगभग 6,000 ऑस्ट्रेलियाई डॉलर का नुकसान हुआ जब एक धोखेबाज ने बैंककर्मी बनकर फोन पर उससे एक पासकोड बताने को कहा। उस कोड का इस्तेमाल करके पैसे निकाले गए, और बाद में बैंक ने नुकसान की भरपाई करने से इनकार कर दिया।

वन-टाइम पासकोड बिल्कुल साझा नहीं करें

बैंक ने औपचारिक प्रतिक्रिया में कहा कि ग्राहक ने स्वेच्छा से वन-टाइम पासकोड साझा करके ई-पेमेंट नियम का उल्लंघन किया है। इसके परिणामस्वरूप, ग्राहक को उत्तरदायी ठहराया गया और नुकसान की भरपाई करने से इनकार कर दिया। यहां तक कि जब अपराधी धोखाधड़ी के कोई भौतिक निशान छोड़ जाते हैं, तब भी कानूनी कार्रवाई बहुत कम होती है। ऐसे मामलों में शायद ही कभी कानूनी कार्रवाई की जाती हो। हमने जिन मामलों को देखा है, उनमें जानकारी तो ली गई, लेकिन आगे की कार्रवाई नहीं की गई।

अपनी सुरक्षा के लिए क्या कर सकते हैं हम?

  • फोन पर कभी भी वन-टाइम पासकोड या सुरक्षा कोड साझा न करें, भले ही कॉल करने वाला व्यक्ति वैध लगे।
  • यदि संदेह हो, तो फोन काट दें और अपने कार्ड पर दिए गए नंबर का उपयोग करके सीधे बैंक को कॉल करें।
  • अपनी व्यक्तिगत जानकारी कहां और कैसे साझा करते हैं, इस बारे में सावधान रहें, खासकर वेबसाइट या सोशल मीडिया पर। केवल वही जानकारी साझा करें, जिसे सार्वजनिक करने से कोई नुकसान की आशंका न हो।

व्यवस्थागत बदलाव है जरूरी

बैंकों और अन्य संस्थानों को ऐसी मजबूत पहचान सत्यापन प्रणालियां स्थापित करने की जरूरत है जो सिर्फ एसएमएस कोड पर निर्भर न हों। हमें डाटा बेचने वालों के मामले में ज्यादा पारदर्शिता और नियमन की जरूरत है।महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें संभावित साइबर धोखाधड़ी के खिलाफ सक्रिय कानून प्रवर्तन की भी आवश्यकता है, विशेषकर तब जब भौतिक साक्ष्य मौजूद हों। बैंकों को ग्राहकों के साथ संवाद करने के अपने तरीकों और नीतियों का भी पुनर्मूल्यांकन करना चाहिए। (भाषा इनपुट )

Sanjeev Dubey
संजीव कुमार दुबेauthor

पत्रकारिता में मेरे सफर की शुरुआत 20 साल पहले हुई। 2002 अक्टूबर में टीवी की रुपहले दुनिया में दाखिल हुआ। शुरुआत टीवी की दुनिया के उस पहलू से हुई जहां हर खबर को उसके मुताबिक आकार दिया जाता है यानी उसे कसा जाता है। सहारा टीवी में मेरे कामकाज की शुरुआत पैकेजिंग से हुई जहां खबरों को अलग-अलग प्रारूपों में गढ़ने का काम होता है। फिर पीसीआर में आउटपुट एडिटर की भूमिका निभाने का मौका मिला जहां तुरंत निर्णय कर खबरों को ब्रेक करने की चुनौती रहती है। न्यूजरूम की गहमागमी के बीच रनडाउन तैयार करने की जिम्मेदारी भी बखूबी निभाई। यहां ब्रेकिंग, हार्ड कोर की खबरों और फीचर्ड प्रोग्रामिंग ने मेरे अनुभव का दायरा तो बढ़ाया ही उसमें गहराई एवं पैनापन भी दिया। 2011 में टेलिविजन न्यूज की दुनिया को अलविदा कहना पड़ा। अक्टूबर 2011 में Zee News की हिंदी वेबसाइट को अपनी अगवुाई में लॉन्च करने का मौका मिला। डिजिटल की दुनिया और टीवी की दुनिया में खबरें परोसने और खबरों को दिखाने का अंदाज बिल्कुल अलग था। मैं उस दौर में दस्तक दे चुका था जब टीवी भी स्मार्टफोन पर देखा जाने लगा था। डिजिटल पर भी ब्रेकिंग थी। अगर टीवी में प्रोग्रामिंग थी तो यहां भी बतौर फीचर, सॉफ्ट स्टोरीज का विशाल संसार था। एक नया मीडियम जो स्मार्टफोन पर बखूबी देखा और समझा जा सकता था। डिजिटल की इस दुनिया में टीवी और अखबार दोनों समाहित थे। यहां काम करते हुए डिजिटल न्यूज मीडिया की बारीकियां तो सीखी हीं। साथ ही जब जी न्यूज से विदाई ली तो उस समय 33 मिलियन यूजर्स के बीच 84 मिलियन पीवीज देखने की अपार खुशियां हासिल हुईं। जी न्यूज में एक लंबी पारी खेलने के बाद जुलाई 2017 में टाइम्स नाउ नेटवर्क से जुड़ने का अवसर मिला। 2017 में ही टाइम्स नाउ की हिंदी वेबसाइट की शुरुआत हुई। यह पहला मौका था जब टाइम्स नाउ की अगुवाई में कोई हिंदी न्यूज वेबसाइट लॉन्च हुई। यहां एक नई और युवा टीम बनी। यह टीम आक्रामक अंदाज में काम करते हुए कम समय में अपनी पहचान बनाई। डिजिटल की दुनिया के बदलते संसार में अब चुनौती पीवीज की नहीं बल्कि यूजर्स की थी, जिन्हें लाना इतना आसान नहीं थी। लेकिन टीम के जज्बे, हौसले ने असाधारण चुनौतियों को भी अपनी मेहनत एवं लगन से उसे सामान्य बनाया। डिजिटल न्यूज की दुनिया में हर पल चुनौतियों के बीच नया कुछ सीखने-समझने और कुछ कर गुजरने की प्रेरणा मिलती है। यह सिलसिला आज भी अनवरत जारी है-

और पढ़ें
End of Article