उमेश कुमार, नई दिल्ली। एक समय था जब हर्ष सिंह की कॉलर बोन टूट गई थी। और जब भी यह भारतीय जूडो खिलाड़ी मैट पर उतरता तो उसे चोट की याद आ जाती है, जिसने लगभग उनका करियर खत्म ही कर दिया था। लेकिन हर्ष सिंह ने हौसला कभी नहीं हारा। ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स में दर्द पीछे छूट गया और 23 साल के इस खिलाड़ी ने इतिहास रचते हुए भारत के लिए मेंस के जूडो में पहला गोल्ड मेडल जीता।
हर्ष सिंह ने टाइम्स नाउ नवभारत से खास बातचीत करते हुए कहा, उस टाइम मैं तो बच्चा था। तो फाइनल बाउट के दौरान मैं कंधे के बल मैट पर गिर गया था। तो कॉलर बोन टूट गई थी। उस समय मिलने आने वाले रिश्तेदार कहते थे कि इससे अब ज्यादा मत कराओ। बच्चा है, जिंदगी की शुरुआत हुई है। ऐसी चोट लगती रहेगी तो इसके लिए अच्छा नहीं रहेगा। तब मेरा यही कहना था कि गेम छोड़ दूंगा तो क्या करूंगा। चोट का क्या है लगती रहेंगी।
हर्ष वजन किया कम
हर्ष को यह ऐतिहासिक जीत अगस्त 2025 में इंस्पायर इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट (IIS) में ट्रेनिंग के दौरान ACL और मेनिस्कस फटने के एक साल से भी कम समय में मिली। इसके बाद पिछले साल अक्टूबर में बेंगलुरु में सर्जरी हुई और फिर एक साल के रिहैबिलिटेशन के बाद वह कॉम्पिटिशन में वापसी कर पाए।
वापसी के लिए भी हर्ष को मैट के बाहर भी एक और लड़ाई लड़नी पड़ी। कॉम्पिटिशन से दूर रहने के दौरान उनका वजन लगभग 72kg हो गया था। इसलिए अपनी 60kg कैटेगरी में लौटने के लिए उन्हें 12kg से ज्यादा वजन कम करना पड़ा। एक रैंकिंग टूर्नामेंट में गोल्ड और सीनियर नेशनल चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज मेडल जीतकर उन्होंने भारत की CWG टीम में अपनी जगह पक्की की।
ताई-ओतीशी और वाजा-आरी के दम पर जीता मेडल
कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में हर्ष सिंह का अभियान किसी फिल्म की कहानी सी लगती है, पर ये सब रियल में हुआ। उन्होंने शुरुआती मुकाबले में इप्पोन हासिल कर विरोधी खिलाड़ी को हराया। क्वार्टर फाइनल में वानुआतु के एलन मोंथोएल को मात देकर पदक की दौड़ में जगह बनाई। सेमीफाइनल में उनका मुकाबला बेहद कड़ा रहा, लेकिन हर्ष ने वाजा-आरी के दम पर जीत दर्ज कर फाइनल का टिकट हासिल कर लिया। फाइनल में ऑस्ट्रेलिया के जोशुआ कैट्ज को हराया।

पीएम के साथ हर्ष।
इसके बारे में हर्ष ने कहा, सेमीफाइनल में मैंने कातागुरुमा का दांव लगाया था। रेसलिंग में इसे कलाजंग कहते हैं। 50 सेकेंड से भी कम समय बचा था तो मैंने ये दांव खेला। फाइनल में मैंने फाइट के दौरान टाइम बचाकर ताई-ओतीशी दांव लगाया और जीत पक्की की।
साधारण परिवार में हुआ जन्म
एक साधारण परिवार में जन्मे हर्ष सिंह के पिता इलेक्ट्रीशियन का काम करते थे। एक समय ऐसा भी था जब वे बिना जूडो यूनिफॉर्म के ही ट्रेनिंग करते थे। सरकारी योजनाओं और प्राइवेट तौर पर चलाए जा रहे एथलीट ट्रेनिंग सेंटर से मिली मदद ने उनके करियर की दिशा बदल दी। साथ ही साल 2024 में उन्हें सेना में हवलदार की नौकरी मिली तो परिवार की जिंदगी संवर गई।

कॉमनवेल्थ के दौरान हर्ष।
मिशन एशियन गेम्स के लिए तैयार
हर्ष ने भारत के साथ-साथ इंटरनेशनल जूडो फेडरेशन (IJF) वर्ल्ड टूर में लगातार हिस्सा लेना शुरू किया। उन्होंने टोक्यो ग्रैंड स्लैम 2025, ताशकंद ग्रैंड स्लैम 2026 और सीनियर एशियन चैंपियनशिप जैसे बड़े टूर्नामेंटों में भारत का प्रतिनिधित्व किया। कॉमनवेल्थ में गोल्ड जीतने के बाद हर्ष सिंह ने अब एशियन गेम्स पर अपना ध्यान लगा रहे हैं।
उन्होंने कहा, मैं अपनी स्पीड, ग्रिप और ताकत को बेहतर बनाना चाहता हूं। जापानी और कोरियाई खिलाड़ी बहुत तेज होते हैं, इसलिए वहां ट्रेनिंग करने से मदद मिलेगी। मैं अपनी स्पीड और ताकत पर काम कर रहा हूं। नई चीज पर प्रयोग नहीं कर रहा क्योंकि, समय कम है तो मेरे पास जो स्ट्रेथ और टेक्निक हैं उन्हीं पर काम कर रहा हूं।
पीएम मोदी ने किया प्रेरित
कॉमनवेल्थ गेम्स में मेडल जीतकर जब हर्ष सिंह इंडिया आए तो पीएम में सभी चैंपियन एथलीटों को प्रधानमंत्री आवास पर आमंत्रित किया। हर्ष ने बताया कि पीएम ने मुलाकात के दौरान उनसे एशियन गेम्स में भी मेडल जीतने का वादा लिया है। साथ ही पीएम मोदी ने हर्ष को मोटिवेट किया और अच्छे प्रदर्शन की शुभकामनाएं दीं।
