साल के दो महीनों में घोड़े नहीं इस जानवर की सवारी करते हैं सूर्य देव, जानिए क्यों होता है यह परिवर्तन?
- Authored by: Mohit Tiwari
- Updated Dec 26, 2025, 05:30 PM IST
बीते 16 दिसंबर 2025 से खरमास की शुरुआत हो चुकी है। संस्कृत में खर का मतलब गधा होता है। क्या आप जानते हैं कि इस महीने खरमास ही क्यों कहा जाता है, इसका क्या कारण है। अगर नहीं तो आइए जानते हैं कि इस महीने को खरमास क्यों कहा गया है? इसके साथ ही ये भी जानेंगे कि साल में ये कितनी बार आते हैं और 2026 में ये कब से शुरू होंगे?
खरमास क्यों लगते हैं?
खरमास, जिसे धनुर्मास या मलमास के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म में एक विशेष अवधि है जब कई शुभ कार्यों पर रोक लग जाती है। इस साल, 16 दिसंबर 2025 को सूर्य देव के गुरु की राशि धनु में प्रवेश करने के साथ खरमास शुरू हो चुका है और यह 14 जनवरी 2026 को मकर संक्रांति के साथ समाप्त होगा।
इसके बाद साल 2026 में खरमास फिर लगेंगे जब सूर्य दोबारा गुरु की दूसरी राशि मीन में प्रवेश करेंगे। यह समय 15 मार्च से 14 अप्रैल 2026 तक रहेगा। इस समय के दौरान विवाह, गृह प्रवेश जैसे मंगल कार्य वर्जित माने जाते हैं। इन दिनों को अशुभ माना जाता है क्योंकि इस समय पर सूर्य देव की पावर थोड़ी कम हो जाती है। ऐसा इस कारण होता है क्योंकि उनके रथ की रफ्तार कम हो जाती है। आइए जानते हैं कि इस समय पर सूर्य की रफ्तार क्यों कम होती है और इस महीने के आगे खर यानि गधा क्यों लगाया जाता है।
क्यों कहा जाता है खरमास?
मार्कण्डेय पुराण में खरमास से जुड़ी एक प्राचीन कथा का उल्लेख है। इस कथा के अनुसार सूर्य देव के रथ को सात घोड़े चलाते हैं, जिनके नाम हैं गायत्री, बृहती, उष्णिः (उष्निक), जगती, त्रिष्टुभ (त्रिष्टुप), अनुष्टुभ (अनुष्टुप) और पंक्ति है। ये इंद्रधनुष के सात रंगों, सप्ताह के सात दिनों और सूर्य की सात किरणों के प्रतीक माने जाते हैं, जो समय और प्रकाश के विभिन्न पहलुओं को दर्शाते हैं।
कथा के अनुसार, सूर्य देव अपने सात घोड़ों वाले रथ पर सवार होकर निरंतर ब्रह्मांड की परिक्रमा करते रहते हैं। उनका रथ कभी नहीं रुक सकता है। अगर ऐसा हुआ तो सृष्टि पर संकट आ जाएगा। दिन-रात का क्रम बिगड़ जाएगा और पृथ्वी पर अंधकार छा जाएगा। सूर्य देव की यह यात्रा अनंत है, जो जीवन की निरंतरता का प्रतीक है।
सूर्यदेव को घोड़ों पर आई दया
एक बार की बात है, सूर्य देव अपनी परिक्रमा पर निकले हुए थे। उनके सातों घोड़े लगातार दौड़ते-दौड़ते थक चुके थे। उन्हें असहनीय प्यास लगी और वे एक सरोवर के पास पहुंच गए। घोड़ों की यह दयनीय स्थिति देखकर सूर्य देव का हृदय पसीज गया। वे सोचने लगे कि इन वफादार घोड़ों को थोड़ा विश्राम और पानी पिलाना चाहिए, लेकिन तभी उन्हें अपनी जिम्मेदारी का बोध हुआ कि अगर रथ रुका तो ब्रह्मांड का संतुलन बिगड़ जाएगा, और जीव-जंतु से लेकर पेड़-पौधों तक सबका जीवन प्रभावित हो जाएगा।
वे इसी दुविधा में थे कि उनकी दृष्टि सरोवर के किनारे खड़े कुछ गधों पर पड़ी। सूर्य देव ने सोचा कि क्यों न घोड़ों को आराम दिया जाए और अस्थायी रूप से इन गधों को रथ में बांध लिया जाए? ऐसा सोचकर उन्होंने घोड़ों को विश्राम के लिए मुक्त किया और गधों को रथ से बांध लिया। अब रथ फिर से चल पड़ा, लेकिन गधे घोड़ों जितने तेज नहीं थे। उनकी गति धीमी थी, जिससे रथ की रफ्तार कम हो गई। परिणामस्वरूप, सूर्य देव की चमक और तेज भी मंद पड़ गया। यही वह अवधि है जिसे खरमास कहा जाता है। जब सूर्य का रथ गधों से खींचा जा रहा होता है और पृथ्वी पर उनकी ऊर्जा कमजोर महसूस होती है। इस दौरान सूर्य की किरणें उतनी प्रखर नहीं रहती है, जितनी अन्य महीनों में होती हैं और मौसम में ठंडक बढ़ जाती है।
वापस घोड़ों ने खींचा रथ
कथा के अनुसार जैसे ही मकर संक्रांति का दिन आया, सूर्य देव ने गधों को वापस सरोवर के किनारे छोड़ दिया और अपने सातों घोड़ों को फिर से रथ में बांध लिया। रथ की गति तेज हो गई और सूर्य देव का पुराना तेज लौट आया। यही कारण है कि मकर संक्रांति से मौसम में बदलाव आता है और सर्दी कम होने लगती है। जीवन में नई ऊर्जा का संचार होता है।
खरमास में करें ये काम
यह कथा न केवल रोचक है, बल्कि गहरा संदेश देती है। खरमास में सूर्य की मंद गति हमें आत्मचिंतन का अवसर देती है। इस समय को व्यर्थ न गंवाकर, भक्ति, ध्यान और परोपकार में लगाना चाहिए। सूर्य देव की पूजा, सूर्य नमस्कार और दान जैसे कार्य फलदायी होते हैं। इसके साथ ही, इस अवधि में स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि सूर्य की कमजोर ऊर्जा से शरीर में सुस्ती आ सकती है।
डिसक्लेमर: यहां दी गई जानकारी पौराणिक कथाओं पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है। Times Now Navbharat इसकी पुष्टि नहीं करता है।