Vat Amavasya (Badmavas) Ki Katha And Kahani In Hindi: वट सावित्री व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। यह व्रत पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना से रखा जाता है। मान्यता है कि श्रद्धा और विधि-विधान से वट सावित्री व्रत करने पर वैवाहिक जीवन सुखमय बना रहता है। पौराणिक कथा के अनुसार माता सावित्री ने अपने तप, प्रेम और दृढ़ संकल्प से यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे। इसी कारण यह व्रत पतिव्रता धर्म का प्रतीक माना जाता है। कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने भी राजा युधिष्ठिर को इस व्रत की महिमा और कथा सुनाकर इसके महत्व को बताया था। आगे पढ़ें वट-सावित्री व्रत पर सावित्री-सत्यवान की कथा।
Vat Savitri Vrat Katha In Hindi (वट सावित्री व्रत कथा)
भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा में माता सावित्री को आदर्श पतिव्रता नारी का प्रतीक माना जाता है। उनके अटूट प्रेम, समर्पण और दृढ़ संकल्प की कथा आज भी महिलाओं को प्रेरणा देती है। वट सावित्री व्रत की कहानी भी सावित्री और सत्यवान के अमर प्रेम से जुड़ी हुई है। यही कारण है कि सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और सुखी दांपत्य जीवन की कामना के लिए यह व्रत श्रद्धा और भक्ति के साथ रखती हैं।
पौराणिक कथाओं के अनुसार मद्र देश के राजा अश्वपति के कोई संतान नहीं थी। संतान सुख की इच्छा में राजा ने कठोर तपस्या और मां सावित्री की आराधना शुरू की। कहा जाता है कि वे प्रतिदिन मंत्रोच्चारण के साथ एक लाख आहुतियां अर्पित करते थे। उन्होंने पूरे 18 वर्षों तक अत्यंत श्रद्धा और नियमपूर्वक यह साधना की। राजा की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर देवी सावित्री उनके सामने प्रकट हुईं और उन्हें वरदान देते हुए कहा कि जल्द ही उनके घर एक तेजस्वी कन्या का जन्म होगा।
कुछ समय बाद राजा अश्वपति के घर एक सुंदर और तेजस्वी कन्या ने जन्म लिया। देवी के आशीर्वाद से प्राप्त होने के कारण राजा ने उसका नाम सावित्री रखा। बचपन से ही सावित्री अत्यंत बुद्धिमान, गुणवान और तेजस्वी थीं। उनकी सुंदरता और व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली था कि उनके योग्य वर मिलना कठिन हो गया। राजा अश्वपति अपनी पुत्री के विवाह को लेकर चिंतित रहने लगे।
पिता की चिंता दूर करने के लिए सावित्री ने स्वयं अपने लिए योग्य वर की खोज करने का निर्णय लिया। वह तपोवन और विभिन्न आश्रमों में भ्रमण करने लगीं। इसी दौरान उनकी मुलाकात वन में रहने वाले राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान से हुई। सत्यवान बेहद धर्मपरायण, साहसी और गुणी युवक थे। सावित्री ने उन्हें अपने पति के रूप में स्वीकार कर लिया।
जब सावित्री ने अपने पिता को सत्यवान के बारे में बताया, तब उसी समय वहां नारद मुनि उपस्थित थे। नारद मुनि ने सावित्री को बताया कि सत्यवान सभी गुणों से युक्त हैं, लेकिन उनकी आयु बहुत कम है और विवाह के एक वर्ष बाद उनकी मृत्यु निश्चित है। यह सुनकर राजा अश्वपति चिंतित हो गए और उन्होंने सावित्री को निर्णय बदलने के लिए समझाया। लेकिन सावित्री अपने संकल्प पर अडिग रहीं। उन्होंने कहा कि एक बार जिसे पति मान लिया, उसके अलावा किसी और को स्वीकार नहीं करेंगी। अंततः सावित्री और सत्यवान का विवाह हो गया।
विवाह के बाद सावित्री अपने पति और ससुर की सेवा में लग गईं। जैसे-जैसे सत्यवान की मृत्यु का समय निकट आने लगा, सावित्री ने कठोर व्रत और तपस्या शुरू कर दी। जिस दिन सत्यवान की मृत्यु निश्चित थी, उस दिन वे अपने पति के साथ जंगल गईं। लकड़ी काटते समय अचानक सत्यवान के सिर में तेज पीड़ा हुई और वे सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गए। तभी यमराज उनके प्राण लेने वहां पहुंचे।
यमराज जब सत्यवान की आत्मा लेकर जाने लगे, तब सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ीं। यमराज ने उन्हें वापस लौटने के लिए कहा, लेकिन सावित्री ने अपने पतिव्रता धर्म और पति के प्रति प्रेम का हवाला देते हुए उनका पीछा नहीं छोड़ा। सावित्री की निष्ठा, भक्ति और दृढ़ संकल्प से यमराज अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने सावित्री से वरदान मांगने को कहा।
सावित्री ने पहले अपने ससुर का खोया हुआ राज्य और नेत्रज्योति मांगी। फिर अपने पिता के लिए संतान सुख का वरदान मांगा। अंत में उन्होंने स्वयं के लिए सौ पुत्रों की माता बनने का आशीर्वाद मांग लिया। यमराज ने वरदान दे दिया, लेकिन तुरंत उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ, क्योंकि पति के बिना सावित्री मां कैसे बन सकती थीं। तब यमराज ने प्रसन्न होकर सत्यवान को पुनर्जीवन प्रदान कर दिया।
इस प्रकार सावित्री ने अपने प्रेम, तपस्या और अटूट विश्वास से अपने पति को मृत्यु के मुख से वापस ला दिया। यही कारण है कि सावित्री को आदर्श पतिव्रता नारी माना जाता है और वट सावित्री व्रत का विशेष महत्व बताया गया है।
