अध्यात्म

कौन हैं वाग्देवी माता, जिनकी भोजशाला मंदिर में की जाती है पूजा, कैसे लंदन पहुंची मां की प्रतिमा

Kaun Hai Vagdevi Mata : कोर्ट ने भोजशाला को हिंदू धार्मिक स्थल मानने के साथ ही लंदन में रखी वाग्देवी माता की वापस लाने का आदेश पारित किया है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि माता वाग्देवी कौन हैं।

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Kaun Hai Vagdevi Mata माता वाग्देवी कौन हैं

Kaun Hai Vagdevi Mata : मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला एक बार फिर चर्चा में है। हाल ही में भोजशाला मंदिर को लेकर आए कोर्ट के फैसलों से मां वाग्देवी की मूल प्रतिमा को भारत वापस लाने की कवायद शुरू हो रही है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि वाग्देवी माता कौन हैं, भोजशाला से उनका क्या संबंध है और उनकी प्राचीन प्रतिमा लंदन कैसे पहुंच गई? बता दें कि इतिहास, धर्म और संस्कृति से जुड़ी यह कहानी करीब एक हजार साल पुरानी मानी जाती है।

कौन हैं वाग्देवी माता

वाग्देवी माता को देवी सरस्वती का ही दूसरा नाम है। हिंदू धर्म में मां सरस्वती (Mata Saraswati)को ज्ञान, वाणी, बुद्धि, संगीत, कला और शिक्षा की देवी कहा जाता है। ‘वाग्देवी’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है — ‘वाक्’ और ‘देवी’। यहां ‘वाक्’ का अर्थ वाणी या शब्द से है, जबकि ‘देवी’ का अर्थ दिव्य शक्ति माना जाता है। इस तरह वाग्देवी का अर्थ हुआ 'वाणी और ज्ञान की देवी'। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मां वाग्देवी मनुष्य को ज्ञान, अभिव्यक्ति, बुद्धि और रचनात्मक शक्ति प्रदान करती हैं। इस कारण विद्यार्थी, शिक्षक, कलाकार और विद्वान विशेष रूप से उनकी पूजा करते हैं। मां वाग्देवी को सरस्वती, शारदा, भारती और वागीश्वरी नामों से भी जाना जाता है।

राजा भोज ने बनवाई थी भोजशाला

इतिहासकारों के अनुसार परमार वंश के प्रसिद्ध शासक राजा भोज ने 11वीं सदी में धार में एक विशाल शिक्षा केंद्र की स्थापना करवाई थी। इसे 'सरस्वती सदन' या भोजशाला कहा जाता था। यह स्थान उस समय संस्कृत, वेद, दर्शन, साहित्य और व्याकरण की शिक्षा का बड़ा केंद्र माना जाता था। देशभर से विद्वान यहां अध्ययन करने पहुंचते थे। इसी भोजशाला परिसर में राजा भोज ने मां वाग्देवी की एक बेहद सुंदर प्रतिमा स्थापित करवाई थी। माना जाता है कि यहां नियमित रूप से मां सरस्वती की पूजा और विद्या साधना होती थी।

कैसी है मां वाग्देवी की प्रतिमा

मां वाग्देवी की यह प्राचीन प्रतिमा सफेद संगमरमर से बनी हुई है। इसकी ऊंचाई करीब 4 फीट और वजन लगभग 250 किलोग्राम बताया जाता है। प्रतिमा पर बेहद बारीक नक्काशी की गई है, जो उस समय की अद्भुत कला शैली को दर्शाती है। इसके अलावा प्रतिमा पर संस्कृत भाषा में शिलालेख भी अंकित हैं। मूर्ति में मां वाग्देवी का स्वरूप शांत और दिव्य दिखाई देता है। उन्हें श्वेत वस्त्र धारण किए हुए कमल पर विराजमान रूप में दर्शाया गया है, जो ज्ञान और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है।

भोजशाला पर किसने किया था हमला

इतिहास के अनुसार साल 1305 में अलाउद्दीन खिलजी ने धार पर हमला किया। इस दौरान भोजशाला के बड़े हिस्से को नुकसान पहुंचाया गया। इसके बाद में 15वीं सदी के दौरान वहां मस्जिद का निर्माण कराया गया। माना जाता है कि मंदिर के कई खंभों और पत्थरों का इस्तेमाल उसी निर्माण में किया गया। इसी दौरान मां वाग्देवी की मूल प्रतिमा या तो छिपा दी गई या मलबे के नीचे दब गई।

कैसे लंदन पहुंची मां वाग्देवी की प्रतिमा

ब्रिटिश शासन के दौरान साल 1875 में भोजशाला परिसर में खुदाई की गई। खुदाई के दौरान मलबे से मां वाग्देवी की यह दुर्लभ प्रतिमा बाहर निकली। इसके बाद 1880 में ब्रिटिश अधिकारी मेजर किनकेड इस प्रतिमा को अपने साथ इंग्लैंड ले गए। तभी से यह प्रतिमा लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी हुई है। बताया जाता है कि पिछले 100 से अधिक वर्षों से यह प्रतिमा वहीं संरक्षित है।

कैसे हुई प्रतिमा की पहचान

साल 1961 में प्रसिद्ध भारतीय पुरातत्वविद डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर लंदन पहुंचे थे। उन्होंने ब्रिटिश म्यूजियम में रखी प्रतिमा का अध्ययन किया और पुष्टि की कि यह धार भोजशाला की मूल वाग्देवी प्रतिमा ही है। फिलहाल धार की भोजशाला में इसी मूर्ति की प्रतिकृति स्थापित है, जहां पूजा-अर्चना की जाती है।

फिर क्यों बढ़ी चर्चा

हाल ही में भोजशाला को कोर्ट ने हिंदू धार्मिक स्थल माना है। इसके साथ ही मां वाग्देवी की प्रतिमा को भारत वापस लाने की बात कही है। कई हिंदू संगठन और सामाजिक संस्थाएं इस ऐतिहासिक प्रतिमा की 'घर वापसी' की मांग कर रहे हैं।माना जा रहा है कि आने वाले समय में भारत सरकार इस मामले को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उठा सकती है।

वसंत पंचमी पर होती है विशेष पूजा

मां वाग्देवी यानी मां सरस्वती की पूजा विशेष रूप से वसंत पंचमी पर की जाती है। इस दिन विद्यार्थी, शिक्षक और कलाकार मां से ज्ञान और बुद्धि का आशीर्वाद मांगते हैं। भोजशाला में भी वसंत पंचमी के अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना का महत्व माना जाता रहा है। मां वाग्देवी की उपासना में इस मंत्र का विशेष महत्व माना गया है। ‘ॐ ऐं ह्रीं श्रीं वाग्देव्यै सरस्वत्यै नमः’ मान्यता है कि श्रद्धा भाव से इस मंत्र का जाप करने से ज्ञान, वाणी और बुद्धि की प्राप्ति होती है।

Mohit Tiwari
मोहित तिवारीauthor

मोहित तिवारी को पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 साल का अनुभव है। इन्होंने अपने करियर की शुरुआत प्रतिष्ठित न्यूजपेपर में फील्ड रिपोर्टिंग से की थी। मोहित ने प्रिंट, टीवी और डिजिटल तीनों प्लेटफॉर्म पर काम किया है। देश-विदेश, लाइफस्टाइल, धर्म और आध्यात्मिक विषयों में गहरी रुचि रखने वाले मोहित ने ज्योतिष का भी व्यापक अध्ययन किया है। मोहित के आलेख लाइफस्टाइल, हेल्थ, न्यूज, धर्म, ज्योतिष आदि विषयों पर गहरी शोध और प्रामाणिकता पर आधारित होते हैं और इन विषयों पर वह 12,000 से अधिक आर्टिकल लिख चुके हैं।

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