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Shani Jayanti ki Katha: शनि जयंती की कथा, क्या है शनिदेव के जन्म की कहानी, शनि जयंती पर कौन सी कथा पढ़ें

Shani Jayanti ki Katha in Hindi (शनि जयंती की कथा): आज शनि जयंती पर पढ़ें भगवान शनिदेव के जन्म की पौराणिक कथा, जानें शनि देव के जन्म की कहानी, महत्व और शनि जयंती पर कौन सी कथा पढ़नी चाहिए।

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शनि जयंती की कथा, पढ़ें शनिदेव के जन्म की कहानी

Shani Jayanti ki Katha in Hindi (शनि जयंती की कथा): आज 16 मई 2026 को देशभर में शनि जयंती मनाई जा रही है। इस दिन भगवान शनिदेव की विशेष पूजा की जाती है। कई लोग सुबह से ही मंदिरों में जाकर तेल चढ़ा रहे हैं, तो कुछ घरों में व्रत और पाठ कर रहे हैं। मान्यता है कि शनि जयंती पर श्रद्धा से पूजा करने और शनिदेव की कथा सुनने से जीवन की परेशानियां कम होती हैं और शनि दोष से राहत मिल सकती है। यही वजह है कि आज के दिन लोग सबसे ज्यादा शनि जयंती की कथा और शनिदेव के जन्म से जुड़ी कहानियां पढ़ना पसंद करते हैं।

क्यों खास है शनि जयंती

हिंदू धर्म में शनि जयंती का विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ज्येष्ठ अमावस्या के दिन शनिदेव का जन्म हुआ था। इसलिए हर साल इस तिथि पर शनि जयंती मनाई जाती है।

मान्यता है कि आज के दिन शनिदेव की पूजा करने, दान करने और उनकी जन्म कथा पढ़ने से व्यक्ति को अच्छे कर्म करने की प्रेरणा मिलती है। कई लोग इस दिन शनि मंदिर जाकर सरसों का तेल, काला तिल और उड़द भी अर्पित करते हैं।

क्या है शनिदेव के जन्म की कथा

पौराणिक ग्रंथ स्कंदपुराण में शनिदेव के जन्म से जुड़ी कथा का उल्लेख मिलता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शनिदेव के पिता सूर्य देव और माता छाया हैं।

कथा के मुताबिक सूर्य देव का विवाह प्रजापति दक्ष की पुत्री संज्ञा से हुआ था। सूर्य देव का तेज इतना प्रचंड था कि संज्ञा लंबे समय तक उसे सहन नहीं कर पा रही थीं। हालांकि उन्होंने सूर्य देव की तीन संतानों — वैवस्वत मनु, यमराज और यमुना — को जन्म दिया, लेकिन समय बीतने के बाद भी सूर्य देव के तेज में कोई कमी नहीं आई।

बताया जाता है कि एक दिन संज्ञा ने अपने तप के बल से अपने जैसी ही एक स्त्री को उत्पन्न किया, जिसका नाम संवर्णा था। यही आगे चलकर ‘छाया’ के नाम से प्रसिद्ध हुईं। संज्ञा ने छाया को अपनी जगह सूर्य लोक में रहने के लिए कहा और यह राज किसी को न बताने की बात कही। इसके बाद संज्ञा वहां से निकलकर अपने पिता दक्ष के पास चली गईं।

लेकिन दक्ष प्रजापति ने संज्ञा को वापस अपने पति के पास लौटने की सलाह दी। इसके बावजूद संज्ञा सूर्य लोक नहीं गईं और घोड़ी का रूप धारण करके वन में तपस्या करने लगीं।

उधर सूर्य लोक में छाया, सूर्य देव के साथ रहने लगीं। छाया और सूर्य देव से तीन संतानों का जन्म हुआ — शनिदेव, मनु और भद्रा। मान्यता है कि जब शनिदेव अपनी माता छाया के गर्भ में थे, तब छाया भगवान शिव की कठोर तपस्या कर रही थीं। इसी तपस्या के प्रभाव से शनिदेव का रंग श्याम वर्ण का हो गया।

कथा के अनुसार जब शनिदेव का जन्म हुआ और सूर्य देव ने उनका रंग देखा तो वे क्रोधित हो गए। उन्हें विश्वास नहीं हुआ कि उनका पुत्र श्याम वर्ण का हो सकता है। इसी वजह से वे छाया के चरित्र पर संदेह करने लगे।

जब शनिदेव को अपनी माता के अपमान की बात पता चली तो उनके मन में पिता के प्रति नाराजगी और शत्रुता का भाव पैदा हो गया। वहीं, छाया ने भी दुखी होकर सूर्य देव को कुष्ठ रोग होने का श्राप दे दिया।

इसके बाद शनिदेव ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर महादेव ने शनिदेव को ग्रहों में विशेष स्थान दिया और उन्हें न्याय का देवता बनने का आशीर्वाद दिया। तभी से शनिदेव को कर्मों के अनुसार फल देने वाले न्यायप्रिय देवता के रूप में पूजा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि जो व्यक्ति सच्चे मन से शनिदेव की आराधना करता है, उसके जीवन के कष्ट और संकट धीरे-धीरे कम होने लगते हैं।

शनि जयंती पर कौन सी कथा पढ़ी जाती है

अक्सर लोग 'शनि जयंती की कथा' ढूंढते हैं, लेकिन धार्मिक रूप से इस दिन अलग से कोई शनि जयंती कथा नहीं मानी जाती। दरअसल, इस मौके पर मुख्य रूप से शनिदेव की जन्म कथा और उनके न्यायप्रिय स्वभाव से जुड़ी कथाएं पढ़ी जाती हैं। इसके अलावा राजा विक्रमादित्य और शनिदेव की कथा भी काफी प्रसिद्ध है। मान्यता है कि इन कथाओं को सुनने और पढ़ने से व्यक्ति को अपने कर्मों का महत्व समझ आता है।

क्यों कहलाते हैं शनिदेव न्याय के देवता

शनिदेव को कर्मफल दाता कहा जाता है। यानी इंसान जैसा कर्म करता है, उसे वैसा ही फल मिलता है। यही कारण है कि लोग शनिदेव को न्याय का देवता मानते हैं। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक शनिदेव कभी किसी के साथ अन्याय नहीं करते। अच्छे कर्म करने वालों पर उनकी कृपा बनी रहती है, जबकि गलत काम करने वालों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।

आज शनि जयंती पर कैसे करें पूजा

  • सुबह स्नान करके साफ कपड़े पहनें।
  • शनिदेव को सरसों का तेल अर्पित करें।
  • पीपल के पेड़ के नीचे दीपक जलाएं।
  • “ॐ शं शनैश्चराय नमः” मंत्र का जाप करें।
  • जरूरतमंद लोगों को दान देना शुभ माना जाता है।
  • हनुमान चालीसा का पाठ भी लाभकारी माना जाता है।

शनि जयंती का संदेश

शनि जयंती सिर्फ पूजा-पाठ का दिन नहीं है, बल्कि यह हमें कर्म और न्याय का महत्व भी समझाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जो व्यक्ति ईमानदारी और अच्छे कर्मों के रास्ते पर चलता है, उस पर शनिदेव की कृपा बनी रहती है। इसलिए आज के दिन लोग पूजा के साथ-साथ अपने व्यवहार और कर्मों पर भी ध्यान देने की कोशिश करते हैं।

डिसक्लेमर: यहां दी गई जानकारी ज्योतिष शास्त्र पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है। Times Now Navbharat इसकी पुष्टि नहीं करता है।

Vineet
विनीतauthor

विनीत टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में हेल्थ डेस्क के साथ बतौर चीफ कॉपी एडिटर जुड़े हैं। दिल्ली के रहने वाले विनीत को हेल्थ, फिटनेस और न्यूट्रिशन जैसे विषयों पर गहरी समझ है। इन्होंने हेल्थ, फिटनेस, न्यूट्रिशन और सप्लीमेंट के फील्ड में प्रोफेशनल सर्टिफिकेशन भी किए हैं। वे 6 साल से इस फील्ड से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर 7,000 से अधिक लेख लिख चुके हैं। विनीत की खासियत उनकी रिसर्च-बेस्ड लेखन शैली और जनहित को ध्यान में रखते हुए लिखी गई जानकारीपूर्ण स्टोरीज हैं।

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