Sawan Somwar Pradosh Kaal: सावन सोमवार की पूजा का जिक्र आते ही आमतौर पर सुबह मंदिर जाने, शिवलिंग पर जल चढ़ाने और व्रत रखने की बात होती है। लेकिन यदि किसी कारण सुबह जलाभिषेक न हो पाए तो क्या शाम को पूजा की जा सकती है? ज्योतिषाचार्य सुजीत महाराज कहते हैं कि शिव उपासना के लिए सूर्यास्त के आसपास का प्रदोष काल विशेष माना गया है। सावन, सोमवार और प्रदोष काल- ये तीनों भगवान शिव से जुड़े हैं, इसलिए इनका संयोग पूजा को और खास बना देता है।
हालांकि यहां एक बात समझना जरूरी है। हर दिन सूर्यास्त के आसपास प्रदोष काल आता है, जबकि प्रदोष व्रत केवल त्रयोदशी तिथि को रखा जाता है। इसलिए प्रत्येक सावन सोमवार की शाम प्रदोष काल में शिव पूजा की जा सकती है, भले ही उस दिन त्रयोदशी तिथि न हो।
प्रदोष काल क्या होता है
सुजीत महाराज बताते हैं कि ‘प्रदोष’ का सरल अर्थ दिन और रात के मिलने का समय है। सूर्य अस्त हो रहा होता है, लेकिन रात पूरी तरह शुरू नहीं हुई होती। धार्मिक परंपरा में इसे संधि काल माना गया है। मान्यता है कि प्रदोष के समय भगवान शिव प्रसन्न होकर माता पार्वती के साथ कैलाश पर विराजते हैं और देवता उनकी आराधना करते हैं।

प्रदोष काल में भी जलाभिषेक शुभ रहता है
यही कारण है कि इस समय शिवलिंग के सामने दीपक जलाना, जल चढ़ाना, शिव मंत्र का जप करना और शांत मन से कुछ देर बैठना विशेष फलदायी माना गया है।
सावन सोमवार का प्रदोष काल कितने बजे रहेगा
प्रदोष काल का समय हर शहर में एक जैसा नहीं होता, क्योंकि इसकी गणना स्थानीय सूर्यास्त के आधार पर की जाती है। सामान्य रूप से सूर्यास्त से शुरू होने वाला लगभग डेढ़ से दो घंटे का समय प्रदोष पूजा के लिए लिया जाता है। अलग-अलग पंचांग इसकी अवधि में थोड़ा अंतर बता सकते हैं।
उदाहरण के लिए, 3 अगस्त 2026 को दिल्ली में सूर्यास्त लगभग शाम 7:10 बजे होगा। इसलिए यहां सावन सोमवार की प्रदोष पूजा सूर्यास्त के आसपास शुरू करके लगभग रात 9 बजे तक की जा सकती है।
प्रदोष काल की गणना कैसे की जाती है
घर पर प्रदोष काल का सामान्य अनुमान निकालने का सबसे आसान तरीका अपने शहर का सूर्यास्त देखना है। जिस समय सूर्यास्त हो रहा हो, उसके आसपास से शाम के अगले डेढ़ से दो घंटे पूजा के लिए रखे जा सकते हैं।
मान लीजिए आपके शहर में सूर्यास्त शाम 7 बजे है। ऐसे में लगभग 6:45 बजे पूजा की तैयारी शुरू की जा सकती है और सूर्यास्त के बाद 7 बजे से 8:30 या 9 बजे के बीच पूजन किया जा सकता है।
लेकिन यदि उस दिन प्रदोष व्रत यानी त्रयोदशी तिथि भी हो, तो केवल सूर्यास्त देखना पर्याप्त नहीं है। यह देखना भी जरूरी होता है कि प्रदोष काल में त्रयोदशी तिथि मौजूद है या नहीं। ऐसे में स्थानीय पंचांग में दिया गया प्रदोष पूजा मुहूर्त ही मानना बेहतर है।
सावन सोमवार को सुबह या प्रदोष काल- कब करें जलाभिषेक
सावन सोमवार के शुभ मौके पर सुबह और प्रदोष काल - दोनों समय जलाभिषेक किया जा सकता है। सुबह की पूजा सात्विक शुरुआत और व्रत के संकल्प से जुड़ी मानी जाती है, जबकि शाम की पूजा भगवान शिव के प्रिय प्रदोष काल में होती है। इनमें से किसी एक को कम या अधूरा नहीं माना जाना चाहिए।
यदि संभव हो तो सुबह सामान्य जलाभिषेक करें और शाम को प्रदोष काल में दीपक, मंत्र जप और आरती करें। यदि सुबह समय नहीं मिला, तो शाम को स्नान करके प्रदोष काल में जलाभिषेक किया जा सकता है। शिव पूजा में भावना और संयम का महत्व घड़ी की सुई से अधिक है।
क्या प्रदोष काल में घर पर जलाभिषेक कर सकते हैं
प्रदोष काल में घर पर जलाभिषेक किया जा सकता है। घर में शिवलिंग हो तो साफ स्थान पर एक पात्र या थाली में रखकर जलाभिषेक करें, ताकि जल इधर-उधर न फैले। पहले सादा जल अर्पित करें। इच्छा हो तो थोड़े से दूध से अभिषेक करने के बाद दोबारा साफ जल जरूर चढ़ाएं।

इस एक मंत्र में छिपा है शिव पूजा का सार
घर में शिवलिंग नहीं है तो किसी शिव चित्र या महादेव की प्रतिमा के सामने दीपक जलाकर ॐ नमः शिवाय का जप करें। चित्र पर जल न चढ़ाएं। मानसिक रूप से शिवलिंग का ध्यान करके अर्घ्य अर्पित करना भी पूजा का एक सरल रूप है।
घर की पूजा में बहुत अधिक सामग्री जुटाना जरूरी नहीं। एक लोटा जल, बेलपत्र, दीपक और शांत मन पर्याप्त हैं।
मंदिर में प्रदोष काल का जलाभिषेक कैसे करें
मंदिर में जलाभिषेक करना हो तो सूर्यास्त से थोड़ा पहले पहुंचना सुविधाजनक रहेगा। सावन सोमवार को शाम के समय भीड़ हो सकती है, इसलिए मंदिर के नियमों का पालन करें। शिवलिंग पर धीरे-धीरे जल चढ़ाएं। दूध, दही या अन्य सामग्री तभी अर्पित करें, जब मंदिर में इसकी अनुमति हो।
जल चढ़ाते हुए ॐ नमः शिवाय बोलें। इसके बाद बेलपत्र अर्पित करें, दीपक के दर्शन करें और कुछ देर बैठकर शिव चालीसा, महामृत्युंजय मंत्र या शिव मानस पूजा का पाठ कर सकते हैं।
सावन सोमवार की प्रदोष पूजा विधि
- प्रदोष काल शुरू होने से पहले स्नान करके साफ कपड़े पहनें।
- पूजा स्थान को साफ करें और भगवान शिव के सामने घी या तिल के तेल का दीपक जलाएं।
- इसके बाद मन में पूजा का संकल्प लें। शिवलिंग पर पहले सादा जल अर्पित करें।
- इसके बाद दूध, दही, शहद या गंगाजल से अभिषेक कर सकते हैं, लेकिन अंत में फिर से साफ जल जरूर चढ़ाएं।
- अभिषेक के बाद बेलपत्र, सफेद फूल, धतूरा या आक का फूल उपलब्ध हो तो अर्पित करें। चंदन लगाएं और फल या घर में बना सात्विक प्रसाद रखें।
- इसके बाद कम से कम 108 बार ॐ नमः शिवाय का जप करें।
- अंत में शिव आरती करें और अपनी भूलों के लिए क्षमा मांगें।
स्वास्थ्य संबंधी प्रार्थना के लिए महामृत्युंजय मंत्र का जप किया जा सकता है।
प्रदोष काल में क्या करें
- सूर्यास्त से पहले पूजा की सामग्री तैयार कर लें।
- संभव हो तो पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके पूजा करें।
- सादा जल और बेलपत्र को पूजा में प्रमुखता दें।
- दीपक जलाकर कुछ देर मौन बैठें।
- शिव मंत्र का जप करें और आरती के बाद प्रसाद बांटें।
- व्रत रखा है तो अपनी परंपरा और स्वास्थ्य के अनुसार पूजा के बाद फलाहार करें।
- बेलपत्र अर्पित करने से पहले देख लें कि वह साफ और टूटा हुआ न हो।
प्रदोष पूजा में क्या नहीं करना चाहिए
शिवलिंग पर हल्दी, कुमकुम, तुलसी दल या केतकी का फूल सामान्यतः अर्पित नहीं किया जाता। बेलपत्र की डंडी वाला मोटा भाग शिवलिंग की ओर रखने के बजाय पत्तों का चिकना भाग नीचे की ओर रखा जाता है।
पूजा में अनावश्यक रूप से बहुत अधिक दूध बहाने से बचें। थोड़ी मात्रा में दूध अर्पित करके जल से अभिषेक करना पर्याप्त है। पैकेट सहित सामग्री, प्लास्टिक या कचरा मंदिर में न छोड़ें। शिवलिंग पर चढ़े जल और सामग्री पर पैर न रखें।
इसके अलावा, प्रदोष काल की पूजा को डर, दिखावे या कठिन नियमों का विषय न बनाएं। अगर पूजा न कर पाएं तो अपराधबोध न रखें। शाम को हाथ-मुंह धोकर भी श्रद्धा से दीपक जला सकते हैं। याद रखें कि शिव की उपासना में सहजता ही उसकी सबसे बड़ी सुंदरता है।
