Ahoi Ashtami (1 Nov 2026) Star Time Today in Punjab (अहोई अष्टमी पर तारे कितने बजे निकलेंगे): आज 1 नवंबर 2026, रविवार को अहोई अष्टमी का व्रत रखा जा रहा है। पंजाब में भी माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और खुशहाल भविष्य की कामना के साथ यह व्रत रख रही हैं। सुबह से उपवास करने के बाद शाम को अहोई माता की पूजा और व्रत कथा सुनने की परंपरा है। इसके बाद आसमान में तारे दिखाई देने पर उन्हें अर्घ्य देकर व्रत खोला जाता है। ऐसे में लुधियाना, अमृतसर, जालंधर, पटियाला और बठिंडा समेत पंजाब के अलग-अलग शहरों में रहने वाली महिलाएं जानना चाहती हैं कि आज तारे कितने बजे दिखाई देंगे।
पंजाब के प्रमुख शहरों में तारा दर्शन का समय अलग-अलग है। लुधियाना में शाम 6:03 बजे, अमृतसर में 6:07 बजे, जालंधर में करीब 6:04 बजे, पटियाला में 6:03 बजे और बठिंडा में करीब 6:09 बजे तारों के दर्शन का अनुमान है। वहीं, फाजिल्का और श्री मुक्तसर साहिब जैसे पश्चिमी इलाकों में तारे कुछ देर बाद दिखाई दे सकते हैं। पंजाब में अहोई अष्टमी का व्रत रखने वाली ज्यादातर महिलाएं तारों को अर्घ्य देकर व्रत खोलती हैं। कुछ परिवारों में चंद्रमा को देखकर व्रत खोलने की परंपरा भी है। हालांकि, चंद्रमा देर रात निकलेगा। आइए जानते हैं पंजाब के सभी 23 जिलों में तारे कितने बजे दिखेंगे और चंद्रमा का उदय कब होगा।
पंजाब में आज अहोई अष्टमी पर तारे कितने बजे निकलेंगे
अहोई अष्टमी पर शाम के समय अहोई माता की पूजा की जाती है। महिलाएं संतान की लंबी उम्र और अच्छी सेहत की कामना करते हुए व्रत कथा सुनती हैं। इसके बाद आसमान में तारे दिखाई देने पर उन्हें जल से अर्घ्य देती हैं।पंजाब में तारा दर्शन का समय हर शहर में एक जैसा नहीं है। इसका कारण अलग-अलग शहरों की लोकेशन, सूर्यास्त और शाम के समय आसमान में रोशनी कम होने का समय है। लुधियाना में सूर्यास्त शाम करीब 5:38 बजे है और तारों के दर्शन का पंचांग समय 6:03 बजे है। अमृतसर में सूर्यास्त 5:41 बजे और तारा दर्शन का समय 6:07 बजे है। इसी तरह बठिंडा में सूर्यास्त करीब 5:43 बजे होने के कारण तारों को देखने के लिए करीब 6:09 बजे का समय है।
पंजाब के सभी 23 जिलों में तारा दर्शन का समय
पंजाब में कुल 23 जिले हैं। नीचे सभी जिला मुख्यालयों और प्रमुख शहरों में 1 नवंबर 2026 को अहोई अष्टमी पर तारे दिखाई देने का अनुमानित समय दिया गया है।
पंजाब के 23 जिलों में आज तारों को देखने का समय
- अमृतसर: शाम 6:07 बजे।
- बरनाला: शाम 6:06 बजे।
- बठिंडा: शाम 6:09 बजे।
- फरीदकोट: शाम 6:09 बजे।
- फतेहगढ़ साहिब: शाम 6:02 बजे।
- फाजिल्का: शाम 6:12 बजे।
- फिरोजपुर: शाम 6:09 बजे।
- गुरदासपुर: शाम 6:05 बजे।
- होशियारपुर: शाम 6:03 बजे।
- जालंधर: शाम 6:04 से 6:05 बजे के बीच।
- कपूरथला: शाम 6:06 बजे।
- लुधियाना: शाम 6:03 बजे।
- मलेरकोटला: शाम 6:05 बजे।
- मानसा: शाम 6:07 बजे।
- मोगा: शाम 6:07 बजे।
- पठानकोट: शाम 6:04 बजे।
- पटियाला: शाम 6:03 बजे।
- रूपनगर (रोपड़): शाम 6:02 बजे।
- एसएएस नगर (मोहाली): शाम 6:01 बजे।
- संगरूर: शाम 6:05 बजे।
- शहीद भगत सिंह नगर (नवांशहर): शाम 6:03 बजे।
- श्री मुक्तसर साहिब: शाम 6:10 बजे।
- तरनतारन: शाम 6:07 बजे।
पंजाब में अहोई अष्टमी पर चंद्र दर्शन कितने बजे होगा
अहोई अष्टमी पर मुख्य रूप से तारों को देखकर व्रत खोलने की परंपरा है। हालांकि, कुछ परिवार चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोलते हैं। ऐसे में चंद्रोदय का समय जानना भी जरूरी है। पंजाब के प्रमुख शहरों में चंद्रमा के निकलने का अनुमानित समय इस प्रकार है।
- लुधियाना: रात 11:41 बजे।
- अमृतसर: रात 11:44 बजे।
- जालंधर: रात 11:37 बजे।
- पटियाला: रात 11:40 बजे।
- बठिंडा: रात करीब 11:43 से 11:47 बजे के बीच।
पंजाब में अहोई अष्टमी 2026 की पूजा का शुभ मुहूर्त
अहोई अष्टमी पर शाम के समय अहोई माता की पूजा की जाती है। महिलाएं अहोई माता की तस्वीर या दीवार पर बनी आकृति के सामने दीपक जलाकर पूजा करती हैं। इसके बाद रोली, अक्षत, फूल और मिठाई अर्पित करके व्रत कथा सुनती हैं। लुधियाना में अहोई अष्टमी की पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5:38 बजे से 6:57 बजे तक है। अमृतसर में शाम 5:41 बजे से 7:00 बजे तक पूजा का समय है। दूसरे शहरों में सूर्यास्त और स्थानीय पंचांग के अनुसार पूजा के समय में कुछ मिनटों का अंतर हो सकता है। इसलिए अपने शहर के मुहूर्त के अनुसार पूजा करें।
अहोई अष्टमी पर तारों को अर्घ्य कैसे दें
अहोई माता की पूजा और व्रत कथा पूरी करने के बाद आसमान में तारे दिखाई देने का इंतजार करें। तारे नजर आने पर एक साफ लोटे में जल भरें। अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार इसमें थोड़े अक्षत और फूल डाल सकते हैं। इसके बाद खुले आसमान के नीचे जाकर तारों की ओर देखकर जल अर्पित करें। इस दौरान अहोई माता का ध्यान करें और अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और खुशहाल जीवन की प्रार्थना करें। इसके बाद अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार प्रसाद ग्रहण करके व्रत खोलें। कुछ परिवारों में बच्चे के हाथ से जल ग्रहण करने की रस्म भी निभाई जाती है।
