अध्यात्म

फुलेरा दूज व्रत कथा, इस पौराणिक कहानी से जानें क्यों खास है ये दिन

Phulera Dooj Ki Katha (फुलेरा दूज व्रत कथा): फाल्गुन शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को फुलेरा दूज का त्योहार मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन जो कोई भी शादी के बंधन में बंध जाता है उस पर राधा-कृष्ण की विशेष कृपा रहती है। फुलेरा दूज के दिन यहां दिए व्रत कथा का पाठ करने से उनकी विशेष कृपा होती है।

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फुलेरा दूज व्रत कथा (AI Generated)

Phulera Dooj Ki Katha (फुलेरा दूज व्रत कथा): फुलेरा दूज की पौराणिक कथा के अनुसार एक समय श्री कृष्ण किसी कारणवश कई दिनों तक वृंदावन नहीं आ सके और राधा रानी से उनका मिलन नहीं हो पाया। उनके वियोग में राधा रानी अत्यंत व्याकुल हो गईं। ग्वाले और गोपियां भी उदास होने लगे। कहा जाता है कि ब्रज की प्रकृति भी शोक में डूब गई थी, पेड़-पौधे मुरझाने लगे, लताएं सूख गईं और यमुना का जल भी कम होने लगा।

उसी समय देवर्षि नारद द्वारका पहुंचे और उन्होंने कृष्ण को ब्रजवासियों की व्यथा सुनाई। देवर्षि नारद ने कहा, 'कन्हैया आपके के बिना ब्रज की रौनक समाप्त हो गई है, प्रकृति भी शुष्क होने लगी है।' यह सुनकर भगवान का हृदय द्रवित हो उठा और उन्होंने ब्रज लौटने का निश्चय किया। जब उनके ब्रज आगमन का समाचार मिला तो पूरा क्षेत्र आनंद से भर गया। माता यशोदा दौड़कर आईं और उन्होंने कृष्ण को हृदय से लगा लिया। भगवान श्री कृष्ण से मिलने की इच्छा में राधा रानी और गोपिकाएं तड़प रही थीं और श्री कृष्ण को देखते ही राधा रानी प्रसन्न हो गईं। सभी पेड़-पौधे सभी पेड़-पौधे पहले की तरह हरे-भरे हो गए। उसी समय श्रीकृष्ण ने प्रसन्न होकर राधा रानी पर फूलों की वर्षा की। कहा जाता है कि जिस स्थान पर यह मिलन हुआ, वह स्थान आज भी श्रद्धा का केंद्र माना जाता है।

ऐसी मान्यता है कि उस दिन फाल्गुन शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि थी और श्री कृष्ण ने जब राधा रानी पर फूलों की वर्षा की तब से ब्रज में फूलों की होली मनाई जाने लगी और फुलेरा दूज के दिन से ही ब्रज में होली की शुरुआत हो जाती है। उसी समय से हर साल ब्रज में फूलों की होली खेलने की परंपरा भी शुरू हो गई।

फुलेरा दूज का महत्व-

फुलेरा दूज को इसे वसंत ऋतु के फूलों का त्यौहार भी कहा जाता है। किसान, बागवानी करने वाले और गृहस्थ परिवार इस दिन अपने खेतों और बागों में नए पौधे लगाकर फल-फूल की वृद्धि की कामना करते हैं। ये दिन फाल्गुन महीने का एक पवित्र दिन है। इसे भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी को प्रसन्न करने का दिन भी माना जाता है। इस पावन अवसर पर व्रत कथा का पाठ करना विशेष रूप से फलदायी होता है। इस दिन श्री राधा-कृष्ण की पूजा के साथ ही फुलेरा दूज व्रत कथा का पाठ करने से साधक पर हमेशा राधा-कृष्ण की कृपा बनी रहती है। हर साल मथुरा वृंदावन में इसी दिन फूलों की होली खेली जाती है।

Srishti
सृष्टिauthor

सृष्टि टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल की फीचर डेस्क से जुड़ी कंटेंट राइटर हैं, जो मुख्य रूप से धर्म और लाइफस्टाइल सेक्शन के लिए लिखती हैं। सृष्टि को आध्यात्म, भारतीय संस्कृति और साहित्य में गहरी रुचि है। यही वजह है कि उनके लेखों में परंपरा, आस्था और जीवनशैली की सहज समझ खूबसूरती से दिखाई देती है। वह धार्मिक कथाओं, ग्रंथों से जुड़े विषयों, आध्यात्मिक ट्रेंड्स और समकालीन जीवनशैली पर 5,000 से अधिक लेख लिख चुकी हैं। मॉडर्न लाइफस्टाइल और पारंपरिक मूल्यों के बीच संतुलन बनाते हुए वह ऐसे कंटेंट गढ़ती हैं, जो प्रेरक होने के साथ-साथ जानकारीपूर्ण भी होता है।

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