अध्यात्म

Narasimha Dwadashi Vrat Katha: नरसिंह द्वादशी व्रत कथा, यहां पढ़ें भक्त प्रह्लाद और हिरण्यकशिपु की कहानी

Narasimha Dwadashi Vrat Katha (नरसिंह द्वादशी की कथा): शास्त्रों के अनुसार फाल्गुन शुक्ल पक्ष की द्वादशी को नरसिंह द्वादशी के नाम से जाना जाता है। इस साल ये खास दिन आज यानी 28 फरवरू को ही है। यहां आप नरसिंह द्वादशी की व्रत कथा पढ़ सकते हैं और आज की पूजा का फल पा सकते हैं।

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नरसिंह द्वादशी व्रत कथा (pc: pinterest)

Narasimha Dwadashi Vrat Katha (नरसिंह द्वादशी की कथा): नरसिंह द्वादशी की पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में कश्यप नाम के ऋषि रहा करते थे। जिनकी पत्नी का नाम दिति था और उनके दो पुत्र थे पहला हिरण्याक्ष और दूसरा हिरण्यकश्यप। बताया जाता है कि, यह दोनों ऋषि के पुत्र थे इसके बाद भी इनकी प्रवृत्ति असुर वाली हो गई थी। दोनों भाइयों ने चारों और हाहाकार मचा दिया था। ऐसे में भगवान विष्णु ने वराह रूप में पृथ्वी की रक्षा करने के लिए हिरण्याक्ष का वध कर दिया था। अपने भाई की मृत्यु से हिरण्यकश्यप को बेहद दुख हुआ और उसी दिन से वह भगवान विष्णु को अपना शत्रु मानने लगा। इसके बाद हिरण्यकश्यप अपने प्रतिशोध का बदला लेने के लिए कठोर तपस्या करने लगा जिससे प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी से उसने मनचाहा वरदान प्राप्त किया।

इसके बाद उसने स्वर्ग पर आक्रमण कर देवताओं को पराजित कर दिया। इस तरह वह तीनों लोकों का स्वामी बन गया। इस प्रकार उसे अपनी शक्ति पर काफी अहंकार हो गया कि वह खुद को ही देवता समझने लगा। अहंकार मे डूबे हिरण्यकश्यप का अत्याचार बढ़ता जा रहा है। कुछ समय में उसकी पत्नी कयाधु ने प्रहलाद नाम के पुत्र को जन्म दिया। जो भगवान विष्णु का परम भक्त था। प्रहलाद जब थोड़ा बड़ा हुआ तो हिरण्यकश्यप ने उससे खुद की पूजा करने के लिए कहा लेकिन प्रहलाद का मन तो सिर्फ विष्णु भगवान की ही भक्ति में लगा रहता था इसलिए उसके ऊपर पिता की किसी बात का प्रभाव नहीं पड़ा।

अपने बेटे को भगवान विष्णु की भक्ति से लगे देखकर हिरण्यकश्यप के क्रोध का ठिकाना न रहा उसने प्रहलाद का मन भगवान विष्णु की भक्ति से हटाने के लिए ढेरों प्रयास किए। लेकिन किसी प्रयासों में सफलता न मिलने के बाद उसने अत में अपनी बहन होलिका के साथ मिलकर उसे अग्नि में जलाने का प्रयत्न किया। क्योंकि होलिका को वरदान था कि उसे अग्नि जला नहीं पाएगी। लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से प्रहलाद बज गया और होलिका जलकर भस्म हो गई।

ऐसे में भगवान की इस अद्भुत कृपा को देखते हुए हिरण कश्यप की प्रजा भी प्रभु विष्णु की भक्ति करने लगी। जिस पर हिरण कश्यप को बहुत क्रोध आया और उसने भरी सभा में अपने पुत्र को मृत्यु दंड देने का निर्णय किया। तब उसने प्रहलाद को अपने दरबार में एक खंभे से बांधकर कहा कि, ‘तू कहता है कि तेरे कण-कण में भगवान हैं। तो तू अपने भगवान को बुला ले कि वह इस खंभे से निकल कर तुझे बचाएं।’ये कहते हुए हिरण कश्यप ने खंभे पर गदा से प्रहार किया। ठीक उसी समय वहां नरसिंह प्रकट हुए और उन्होंने हिरणकश्यप को अपनी जांघों पर रखकर उसकी छाती को अपने नाखूनों से फाड़कर उसे मृत्युदंड दिया।

Srishti
सृष्टिauthor

सृष्टि टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल की फीचर डेस्क से जुड़ी कंटेंट राइटर हैं, जो मुख्य रूप से धर्म और लाइफस्टाइल सेक्शन के लिए लिखती हैं। सृष्टि को आध्यात्म, भारतीय संस्कृति और साहित्य में गहरी रुचि है। यही वजह है कि उनके लेखों में परंपरा, आस्था और जीवनशैली की सहज समझ खूबसूरती से दिखाई देती है। वह धार्मिक कथाओं, ग्रंथों से जुड़े विषयों, आध्यात्मिक ट्रेंड्स और समकालीन जीवनशैली पर 5,000 से अधिक लेख लिख चुकी हैं। मॉडर्न लाइफस्टाइल और पारंपरिक मूल्यों के बीच संतुलन बनाते हुए वह ऐसे कंटेंट गढ़ती हैं, जो प्रेरक होने के साथ-साथ जानकारीपूर्ण भी होता है।

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