भारतीय परंपराओं में कई ऐसे पर्व और व्रत हैं जिनके पीछे गहरी पौराणिक कथाएं जुड़ी हुई हैं। वट सावित्री व्रत भी उन्हीं में से एक माना जाता है। यह व्रत शादीशुदा महिलाएं पति की लंबी आयु और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के लिए रखा जाता है। हर साल ज्येष्ठ मास में आने वाला यह पर्व केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रेम, निष्ठा और अटूट विश्वास का प्रतीक भी माना जाता है।
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इस व्रत का नाम माता सावित्री के नाम पर रखा गया है। जिन्हें भारतीय पौराणिक कथाओं में आदर्श पत्नी का दर्जा दिया गया है। उनकी कहानी आज भी लोगों को रिश्तों में धैर्य, साहस और समर्पण का महत्व सिखाती है। मान्यता है कि सावित्री ने अपने प्रेम और बुद्धिमानी के बल पर यमराज से अपने पति सत्यवान का जीवन वापस पा लिया था। यही कारण है कि आज भी किसी समर्पित पत्नी की तुलना सावित्री से की जाती है।
कौन थीं माता सावित्री
पौराणिक कथाओं के अनुसार सावित्री राजा अश्वपति की बहुत तेजस्वी और साहसी पुत्री थीं। विवाह योग्य होने पर उन्होंने स्वयं सत्यवान को अपना जीवनसाथी चुना। हालांकि ऋषियों ने पहले ही यह भविष्यवाणी कर दी थी कि सत्यवान की आयु बहुत कम है, लेकिन सावित्री अपने निर्णय से पीछे नहीं हटीं।
सत्यवान और सावित्री की कथा
विवाह के बाद एक तय समय आने पर सत्यवान जंगल में लकड़ी काटते समय बेहोश होकर गिर पड़े। तभी यमराज उनके प्राण लेने पहुंचे। सावित्री ने हार नहीं मानी और यमराज के पीछे-पीछे चल पड़ीं। रास्ते भर उन्होंने अपनी बुद्धिमानी और विनम्रता से यमराज से निवेदन किया। आखिरकार यमराज ने उन्हें वरदान मांगने का अवसर दिया। सावित्री ने चतुराई से ऐसा वरदान मांगा जिससे सत्यवान को दोबारा जीवन मिल गया।

Vat Savitri Vrat
क्यों दी जाती है सावित्री की मिसाल
सावित्री को भारतीय संस्कृति में अटूट प्रेम और नारी शक्ति की प्रतीक माना जाता है। उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य नहीं खोया और अपने साहस से असंभव को संभव कर दिखाया। यही वजह है कि आज भी उनके नाम की मिसाल दी जाती है।
कैसे पड़ा वट सावित्री व्रत नाम
मान्यता है कि वट यानी बरगद के पेड़ के नीचे सत्यवान को नया जीवन मिला था। उसी कारण इस व्रत का नाम वट सावित्री व्रत पड़ा। बरगद के वृक्ष को लंबी आयु और स्थिरता का प्रतीक माना जाता है, इसलिए महिलाएं इस दिन वट वृक्ष की पूजा करती हैं।
