अध्यात्म

माघ मास में इन 4 स्थानों पर स्नान का है विशेष महत्व

  • Authored by: टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल
  • Updated Jan 24, 2023, 12:21 AM IST

माघ मास का पवित्र माह चल रहा है। हर 12 वर्ष में भारत के चार प्रमुख शहरों में लगता है कुंभ मेला। प्रतिवर्ष चारों स्थानों में माघ मास के दौरान कल्पवास एवं पवित्र स्नान का है विशेष महत्व। आइये आपको बताते हैं कि प्रयागराज, नासिक, उज्जैन और हरिद्वार क्यों हैं इतने विशेष।

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माघ मास में स्नान का है विशेष महत्व

KEY HIGHLIGHTS
  • माघ मास में कुंभ स्नान का है विशेष महत्व
  • समुद्र मंथन में जहां अमृत गिरा वो होता है कुंभ पर्व
  • प्रयागराज, नासिक, हरिद्वार और उज्जैन हैं पवित्र स्थान


Magh Maas: परम पवित्र माह माघ चल रहा है। भगवान सूर्य नारायण को समर्पित इस माह की महिमा अनेक पुराणाें में बतायी गयी है। वहीं इस माह में चार प्रमुख पवित्र स्नान का विशेष फल भी अथर्ववेद में बताया गया है। माघ मास में कुंभ पर्व का कारण बताते हुए अथर्ववेद में कहा गया है− पूर्णः कुम्भाेधिकाल आहितस्तं वै पश्यामो बहुधा नु सन्तः। स इमा विश्वा भुवनानि प्रत्यडंकाल तमाहुं परमे व्योमन्।। अर्थात समुद्र मंथन के समय जहां−जहां अमृत से भरा कुंभ स्थापित किया था, वहां−वहां वह कुंभ पर्व होते हुए देखते हैं। यह कुंभ पर्व समस्त चौदह भुवनों में समय−समय पर संपन्न होता है। कुंभ पर्व काल को सर्वोत्कृष्ट बैकुंठ के तुल्य पवित्र कहा जाता है। यह पवित्र पर्व माघ मास में ही संपन्न होता है।

पौराणिक महत्व

समुद्र मंथन के समय जब अमृत से भरा घट प्रकट हुआ तो उसे पाने के लिए देव दानव उस पर टूट पड़े। श्री विष्णु के संकेत पर देवगुरु बृहस्पति के नेतृत्व में इंद्रपुत्र जयंत ने उस अमृत कुंभ को उठा लिया। घट फूट न जाए, इसलिए सूर्य को उसकी रक्षा का भार सौंपा गया। अमृत सूख न जाए इसके लिए हिमांशु चंद्रमा को नियत किया गया। ये सभी देवता अमृत कुंभ को छिपाने के लिए तीनों लोकों में घूमे परंतु दानवों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। भूलोक में दिव्य बारह दिनों तक भ्रमण करते हुए उक्त अमृत कुंभ को चार बार भूमि पर रखने का अवसर आया। कुंभ को रखते और उठाते समय कुछ अमृतकण इन स्थानों में बिखर गए। जहां− जहां वह कुंभ रखा गया था, वे स्थान हैं

  1. हरिद्वार
  2. प्रयाग
  3. नासिक
  4. उज्जैन

दिव्य बारह दिन बारह मानव वर्षाें के बराबर माने जाते हैं इन स्थानों पर स्नान करना। अतः सूर्य, चंद्र और बृहस्पति के योगायोग से बारह वर्षाें में चारों स्थानों पर चार कुंभ पर्वों का योग बनता है।

मान्यता है कि पृथ्वी की भांति चार कुंभ देवलोक और चार ही कुंभ पाताललोक में भी होते हैं। जब बृहस्पति मारक ग्रह की राशि में प्रविष्ट होकर जीवन संहारक तत्वों का अवरोध कर देता है तो उस समय जीवनवर्धक तत्व अतीव आप्यायित हो जाते हैं। पृथ्वी के जिस केंद्र बिंदु पर उसका प्रभाव अधिक मात्रा में पड़ता है, उस क्षेत्र को उस समय जीवनवर्धक अमृतकणों से व्याप्त बताकर उस वातावरण के संपर्क में आने का संकेत ही कुंभ पर्व की वैज्ञानिक आधार भूमिका है।

(डिस्क्लेमर : यह पाठ्य सामग्री आम धारणाओं और इंटरनेट पर मौजूद सामग्री के आधार पर लिखी गई है। टाइम्स नाउ नवभारत इसकी पुष्टि नहीं करता है।)

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